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Q. चिकित्सा चिकित्सकों के सामने आने वाली नैतिक दुविधाओं पर चर्चा कीजिए जब कानूनी आदेश जीवन रक्षक उनके प्राथमिक कर्तव्य से टकराते हैं। व्यवहार्य भ्रूणों वाली गर्भावस्थाओं के देर से चिकित्सकीय समापन से संबंधित मामलों के विशिष्ट संदर्भ के साथ अपने उत्तर को स्पष्ट कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

June 1, 2026

GS Paper IIGovernance

प्रश्न की मुख्य माँग

  • चिकित्सकों द्वारा सामना की जाने वाली नैतिक दुविधाएँ।
  • जीवित भ्रूणों के देर से गर्भपात के मामलों में नैतिक चुनौतियाँ।
  • कानून, नैतिकता और चिकित्सीय कर्तव्य में संतुलन बनाने के लिए आगे की राह। 

उत्तर

परिचय

प्रजनन अधिकारों में हुई प्रगति और न्यायिक हस्तक्षेपों ने “लेट-टर्म प्रेग्नेंसी” से जुड़ी नैतिक दुविधाओं को और अधिक जटिल बना दिया है। जब न्यायालय जीवित भ्रूणों के गर्भपात की अनुमति देते हैं, तब चिकित्सकों को कानूनी आदेशों, भ्रूण के हितों तथा जीवन की रक्षा करने के अपने पेशेवर दायित्व के मध्य संतुलन स्थापित करना पड़ता है।

चिकित्सकों द्वारा सामना की जाने वाली नैतिक दुविधाएँ

  • माता बनाम भ्रूण: चिकित्सकों को गर्भवती महिला की स्वायत्तता और स्वास्थ्य तथा जीवित भ्रूण के जीवन की संभावनाओं के मध्य संतुलन स्थापित करना पड़ता है।
    • उदाहरण: हाल के सर्वोच्च न्यायालय के एक मामले में 28 सप्ताह के गर्भपात  का प्रश्न था, जहाँ भ्रूण जीवित था और जन्म लेने में सक्षम था, जिससे माँ और शिशु दोनों के प्रति प्रतिस्पर्द्धी दायित्व उत्पन्न हुए।
  • कानून बनाम चिकित्सकीय निर्णय: चिकित्सक अपने नैदानिक मूल्यांकन के आधार पर न्यायिक या कानूनी निर्देशों से असहमति रख सकते हैं।
  • स्वायत्तता बनाम देखभाल: मरीज की सूचित सहमति और निर्णय का सम्मान करना कभी-कभी चिकित्सक के उस दायित्व से टकरा सकता है, जिसके तहत उसे मरीज और भ्रूण के सर्वोत्तम हित में कार्य करना चाहिए।
    • उदाहरण: गर्भ का चिकित्‍सकीय समापन (संशोधन) विधेयक, 2021  मातृ निर्णय-निर्माण को मान्यता देता है, फिर भी कुछ चिकित्सक मान सकते हैं कि गर्भ जारी रखना जीवन की रक्षा के लिए बेहतर होगा।
  • जीवन बनाम पीड़ा: भ्रूण के जीवन को संरक्षित रखने से गंभीर दिव्यांगता और दीर्घकालिक पीड़ा की संभावना हो सकती है, जिससे जीवन की गुणवत्ता से जुड़े नैतिक प्रश्न उत्पन्न होते हैं।
    • उदाहरण: AIIMS ने न्यायालय को बताया कि 28 सप्ताह पर जन्म लेने वाले शिशु को गंभीर चिकित्सीय जटिलताओं, तथा अन्य रोगों एवं दिव्यांगताओं का सामना करना पड़ सकता है।
  • नैतिक अखंडता बनाम कर्तव्य: चिकित्सकों की व्यक्तिगत नैतिक मान्यताएँ कभी-कभी संस्थागत और न्यायिक दायित्वों से टकरा सकती हैं।

गर्भावस्था के अंतिम चरण में जीवित रहने योग्य भ्रूण के मामलों में विशिष्ट नैतिक मुद्दे” 

  • जीवन का प्रश्न: एक जीवित भ्रूण के स्वतंत्र रूप से जीवित रहने की संभावना होती है, जिससे गर्भसमापन का निर्णय नैतिक रूप से जटिल हो जाता है।
    • उदाहरण: चिकित्सकीय साहित्य के अनुसार, नवजात चिकित्सा सहायता के साथ 24–28 सप्ताह से अधिक आयु के भ्रूणों के जीवित रहने की संभावना मानी जाती है।
  • नवजात देखभाल का बोझ: चिकित्सकों को यह निर्णय लेना पड़ता है कि जीवन को बचाने का प्रयास संभावित आजीवन चिकित्सीय पीड़ा और जटिलताओं को उचित ठहराता है या नहीं।
  • रोगी की पहचान: यह प्रश्न नैतिक विवाद का विषय बन जाता है कि प्राथमिक रोगी माँ है, भ्रूण है या दोनों।
    • उदाहरण: अहिंसा के सिद्धांत के अनुसार, यह प्रश्न उठता है कि हानि को माँ के लिए, भ्रूण के लिए या दोनों के लिए न्यूनतम किया जाना चाहिए।
  • संसाधनों की नैतिकता: अत्यधिक समय-पूर्व जन्मे शिशुओं के जीवन को बचाने के लिए पर्याप्त चिकित्सा संसाधनों की आवश्यकता होती है।
    • उदाहरण: समय-पूर्व जन्मे शिशुओं के लिए नवजात गहन चिकित्सा में सरकारी तृतीयक अस्पतालों में लंबे समय तक उपचार की आवश्यकता पड़ सकती है।
  • न्यायिक उदाहरणों का प्रभाव: असाधारण मामलों में न्यायालयों द्वारा दिए गए निर्णय भविष्य के चिकित्सकीय निर्णयों और नैतिक मानकों को प्रभावित कर सकते हैं।

आगे की राह

  • नैतिकता संबंधी पैनल: जीवित भ्रूणों से जुड़े जटिल मामलों में चिकित्सकों की सहायता के लिए संस्थागत नैतिकता समितियों की भूमिका को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
  • स्पष्ट प्रोटोकॉल: जीवित भ्रूणों से संबंधित लेट-टर्म प्रेग्नेंसी के मामलों के लिए एक समान राष्ट्रीय दिशा-निर्देश विकसित किए जाने चाहिए।
    • उदाहरण: चिकित्सा गर्भपात अधिनियम, 1976 (वर्ष 2021 में संशोधित) के अंतर्गत विस्तृत प्रोटोकॉल तैयार किए जा सकते हैं।
  • मेडिकल बोर्ड का सुदृढ़ीकरण: मेडिकल बोर्डों को समयबद्ध और साक्ष्य-आधारित सिफारिशें प्रदान करनी चाहिए।
    • उदाहरण: MTP प्रावधानों के तहत राज्य स्तरीय मेडिकल बोर्ड पहले से ही जटिल गर्भसमापन अनुरोधों का मूल्यांकन करते हैं।
  • साझा निर्णय-निर्माण: निर्णय प्रक्रिया में न्यायपालिका, चिकित्सा विशेषज्ञों और मरीज—तीनों के दृष्टिकोणों का समावेश होना चाहिए।
  • बाल सहायता व्यवस्था: जहाँ शिशुओं का जन्म होता है, वहाँ मजबूत नवजात देखभाल और दिव्यांगता सहायता प्रणालियाँ उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) तथा सरकारी दिव्यांगजन कल्याण योजनाओं के माध्यम से सहायता प्रदान की जा सकती है।

निष्कर्ष

जीवित भ्रूणों से संबंधित लेट-टर्म गर्भपात के मामले गहन नैतिक चुनौतियाँ प्रस्तुत करते हैं, जिनका कोई सरल समाधान नहीं है। ऐसे मामलों में मातृ स्वायत्तता, चिकित्सकीय विशेषज्ञता, न्यायिक संवेदनशीलता तथा जीवन संरक्षण सिद्धांतों के मध्य संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, ताकि नैतिक रूप से उचित और न्यायसंगत परिणाम सुनिश्चित किए जा सकें।

Discuss the ethical dilemmas faced by medical practitioners when legal mandates come into conflict with their primary duty to preserve life. Illustrate your answer with specific reference to cases involving late-term medical termination of pregnancies involving viable foetuses. in hindi

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