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Q. आज के डिजिटल युग में, जहाँ बदलाव और चयनात्मक संचार व्यापक रूप से प्रचलित है, गांधी के सत्य दर्शन के नैतिक निहितार्थों पर चर्चा कीजिए। एक बहुलवादी समाज में विविध दृष्टिकोणों से जुड़ने की आवश्यकता के साथ संचार के नैतिक आयामों को हम कैसे संतुलित कर सकते हैं? (150 शब्द, 10 अंक)

January 6, 2026

GS Paper IVEthics, Integrity and Aptitude

प्रश्न की मुख्य माँग

  • एक दोषपूर्ण डिजिटल परिदृश्य में नैतिक निहितार्थ
  • बहुलतावादी दृष्टिकोणों के साथ नैतिक आयामों का सामंजस्य स्थापित करना।

उत्तर

गांधी जी के लिए सत्य का अर्थ है अपने विचारों, शब्दों और कार्यों को सामंजस्य में रखते हुए सत्यपूर्ण जीवन जीना। आज के फर्जी खबरों और हेर-फेर के डिजिटल युग में, सत्य के संबंध में उनका विचार हमें असीमित जानकारी ग्रहण करने के बजाय आलोचनात्मक रूप से सोचने और जिम्मेदारी से कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।

एक दोषपूर्ण  डिजिटल परिदृश्य में गांधी के दर्शन के नैतिक निहितार्थ

  • भ्रामक  सूचना का प्रतिकार: गांधी जी सत्य को “पूजा का सर्वोच्च रूप” मानते थे, और उनका मानना ​​था कि अपुष्ट समाचारों को आगे भेजना नैतिक विफलता है।
    • उदाहरण: वर्ष 2024 की वैश्विक जोखिम रिपोर्ट ने गलत सूचना को एक प्रमुख खतरे के रूप में पहचाना, जहाँ गांधीवादी नैतिकता के अनुसार साझा करने से पहले व्यक्तिगत सत्यापन अनिवार्य है।
  • पारदर्शिता प्रतिरोध का माध्यम: संचार में पूर्ण पारदर्शिता ही डिजिटल ‘धोखाधड़ी’ या दुष्प्रचार से लड़ने का एकमात्र तरीका है।
    • उदाहरण: गांधी जी का हिंद स्वराज सिद्धांत यह मानता है कि छल के माध्यम से वैध स्वतंत्रता प्राप्त नहीं की जा सकती है, जो वर्तमान के दुर्भावनापूर्ण तौर-तरीकों और गुप्त सामाजिक इंजीनियरिंग को चुनौती देता है।
  • उद्देश्य की सत्यनिष्ठा: सत्य केवल सटीकता के बारे में नहीं है, बल्कि संचार के पीछे ‘उद्देश्य की सत्यनिष्ठा’ के बारे में भी है।
    • उदाहरण के लिए: गांधीवादी दृष्टिकोण के अनुसार, जो किसी भी सूचना के वायरल होने की गति की तुलना में मानवीय गरिमा को महत्त्व देता है (नैतिकतावादी दृष्टिकोण), ऐसी एल्गोरिदम जो ईमानदारी की तुलना में सहभागिता को प्राथमिकता देती हैं, नैतिक रूप से दोषपूर्ण हैं।
  • गुमनामी के लिए जवाबदेही: हालाँकि इंटरनेट गुमनामी प्रदान करता है, गांधी जी का “अंतरात्मा” पर जोर इस बात की माँग करता है कि डिजिटल नागरिक अपने आभासी मुखौटे के लिए जिम्मेदारी लें।
  • आत्म-संयम का अनुशासन: डिजिटल सत्याग्रह में भावनात्मक रूप से आवेशित सामग्री पर आवेगी प्रतिक्रिया देने की प्रवृत्ति का विरोध करने का दैनिक अनुशासन शामिल है।
    • उदाहरण: ऑनलाइन नफरत भरे भाषण का जवाब देने से पहले “डिजिटल विराम” का अभ्यास करना, संचार में गांधी की अहिंसा (अहिंसा) का प्रतीक है।

बहुलतावादी दृष्टिकोणों के साथ नैतिक आयामों का सामंजस्य

  • अंतरात्मा की बहुलता: गांधी जी का मानना ​​था कि चूँकि मानवीय ज्ञान “अस्थायी और आंशिक” है, इसलिए हमें दूसरों की “अंतरात्मा की पवित्रता” का सम्मान करना चाहिए।
  • ‘आत्म एकीकरण’ का दृष्टिकोण: संचार का लक्ष्य “आत्म एकीकरण” होना चाहिए, जिसमें सभी दृष्टिकोणों की समानता को समझते हुए अपने मूल्यों पर अडिग रहना शामिल है।
  • अहिंसक अनुनय: विभिन्न विचारों से जुड़ना “अहिंसक अनुनय की कला” है, जिसका उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी की नैतिक चेतना को जागृत करना है।
    • उदाहरण: विरोधियों से जुड़ने के लिए सहानुभूति का उपयोग करना ध्रुवीकृत डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र में पुल बनाने में मदद करता है।
  • ब्रह्मांडीय संचार: यह मानता है कि सभी मनुष्य आपस में जुड़े हुए हैं, जिससे प्रतिध्वनि कक्षों द्वारा प्रचारित “हम बनाम वे” की धारणाओं से दूर जाने में मदद मिलती है।
    • उदाहरण: डिजिटल डिजाइन में सर्वोदय (सभी का कल्याण) को एकीकृत करने से यह सुनिश्चित होता है कि प्लेटफॉर्म पूर्वाग्रहों को बढ़ावा देने के बजाय हाशिए पर पड़े लोगों की सेवा करें।
  • बहस की जगह संवाद: नैतिकता और बहुलवाद का सामंजस्य स्थापित करने का अर्थ है “बहस” (दूसरे को परास्त करना) की जगह “संवाद” (साझा समस्या समाधान) को चुनना।
    • उदाहरण: वर्ष 2025 में नागरिक समाज समूहों ने ऐसे अंतरसांस्कृतिक संवाद ढाँचों का आग्रह किया है, जो सनसनीखेज खबरों की बजाय पारस्परिक शिक्षा को प्राथमिकता देते हैं।

निष्कर्ष

गांधी के सत्य को डिजिटल युग के साथ सामंजस्य स्थापित करने के लिए ‘सूचना साक्षरता’ से ‘नैतिक साक्षरता’ की ओर बदलाव आवश्यक है।  सत्य को दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बनाकर “डिजिटल सत्याग्रह” को अपनाकर हम इंटरनेट को छल-कपट के संघर्ष से वास्तविक मानवीय जुड़ाव के स्थान में परिवर्तित कर सकते हैं। अंततः, जैसा कि गांधी जी ने सिखाया था, हमारे घर की खिड़कियाँ सभी संस्कृतियों के लिए खुली होनी चाहिए, लेकिन हमें झूठ के प्रवाह में बह जाने से बचना चाहिए।

Discuss the ethical implications of Gandhi’s philosophy of truth in today’s digital era, where manipulation and selective communication are prevalent. How can we reconcile the moral dimensions of communication with the need to engage with diverse viewpoints in a pluralistic society? in hindi

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