प्रश्न की मुख्य माँग
- राज्य वित्त पर प्रभाव
- राजकोषीय संघवाद पर प्रभाव
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उत्तर
सोलहवें वित्त आयोग (FC-16) ने भारत के राजकोषीय संघीय ढाँचे में बड़े ‘सुधार’ के बजाय ‘निरंतरता’ को चुना है। GST व्यवस्था में घटते राजस्व और बढ़ती व्यय जिम्मेदारियों के बीच, आयोग ने स्थिरता और क्रमिक सुधारों के संतुलन पर जोर दिया है। ये सिफारिशें केंद्र एवं राज्यों के बीच राजकोषीय संबंधों में उभरते तनावों पर सावधानीपूर्वक प्रतिक्रिया देते हुए, राजकोषीय विवेक को बनाए रखने का एक प्रयास दर्शाती हैं।
राज्य के वित्त पर प्रभाव
- सीमित राजकोषीय स्थान : राज्यों द्वारा 50% वित्त की माँग के बावजूद ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण को 41% पर बनाए रखना, राज्यों की बढ़ती व्यय जिम्मेदारियों और सुनिश्चित राजस्व के बीच की खाई को पाटने में विफल रहता है, खासकर GST व्यवस्था के तहत।
- उधार-आधारित समायोजन: FC-16 ने स्वीकार किया है कि राज्य राजकोषीय तनाव को प्रबंधित करने के लिए बाजार ऋण पर अत्यधिक निर्भर हैं। यह दीर्घकालिक ऋण स्थिरता के बारे में चिंताएँ उत्पन्न करता है।
- क्षैतिज पुनर्गणना से सीमित लाभ: “कर प्रयास” मानदंड को “GDP में योगदान” (10% भार) से बदलना उत्पादक राज्यों को मामूली रूप से पुरस्कृत करता है। हालाँकि, यह क्रमिक दृष्टिकोण इसके पुनर्वितरण प्रभाव को कम करता है।
- केंद्रीय नियंत्रण की निरंतरता: बढ़े हुए हस्तांतरण का एक महत्त्वपूर्ण भाग केंद्र प्रायोजित योजनाओं के माध्यम से आता है। यह राज्यों की भूमिका को स्वायत्त राजकोषीय कर्ताओं के बजाय केवल नीतियों के कार्यान्वयनकर्ता के रूप में सुदृढ़ करता है।
राजकोषीय संघवाद के लिए निहितार्थ
- यथास्थितिवादी संघवाद: विभाजन योग्य पूल का विस्तार करने या उपकर (Cesses) और अधिभार (Surcharges) को इसमें शामिल करने से इनकार करना वास्तविक राजस्व-साझाकरण को सीमित करता है, जिससे सहकारी संघवाद कमजोर होता है।
- उपेक्षित संरचनात्मक सुधार: यद्यपि जनसांख्यिकीय प्रदर्शन के भार को उचित रूप से कम किया गया है, किंतु बेहतर ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण के लिए रोडमैप का अभाव संवैधानिक संतुलन के बजाय ‘सावधानी’ का संकेत देता है।
- असममित प्रोत्साहन : GDP में योगदान के लिए उच्च भारांश के बावजूद, उत्पादक राज्यों को केवल मामूली लाभ होता है, जो दक्षता-आधारित राजकोषीय प्रोत्साहनों की शक्ति को कमजोर करता है।
- सशर्त हस्तांतरण के माध्यम से केंद्रीकरण: यह ‘ऊपर से नीचे’ (Top-down) राजकोषीय ढाँचे को मजबूत करता है। यह राज्यों की विवेकाधीन खर्च करने की शक्ति को कम करता है और सहकारी तथा प्रतिस्पर्द्धी संघवाद की भावना को कमजोर करता है।
- राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता का क्षरण: बिना शर्त कर हस्तांतरण में सीमित विस्तार और ऋण पर बढ़ती निर्भरता के कारण, राज्यों की राजकोषीय निर्णय लेने की स्वायत्तता बाधित होती है। यह संवैधानिक संघवाद के तहत परिकल्पित केंद्र-राज्य संतुलन को बदल देता है।
निष्कर्ष
हालाँकि सोलहवाँ वित्त आयोग राज्यों के वित्त पर बढ़ते दबावों को स्वीकार करता है, किंतु इसका संतुलित दृष्टिकोण संरचनात्मक पुनर्संतुलन के बजाय स्थिरता को प्राथमिकता देता है। राजकोषीय तनाव को दूर करने और राजकोषीय संघवाद को मजबूत करने के लिए बिना शर्त कर हस्तांतरण का विस्तार करना, सशर्त हस्तांतरणों पर निर्भरता कम करना और राज्यों की संवैधानिक रूप से परिकल्पित राजकोषीय स्वायत्तता को बहाल करना आवश्यक होगा।
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