प्रश्न की मुख्य माँग
- सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला में भारत को वैश्विक अग्रणी बनाने के लिए प्रमुख चुनौतियाँ।
- इन चुनौतियों से निपटने के उपाय लिखिये।
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उत्तर
सेमीकंडक्टर, जो डिजिटल अर्थव्यवस्था के केंद्र में हैं, आज आर्थिक के साथ-साथ भू-राजनीतिक प्राथमिकता भी बन चुके हैं। वैश्विक चिप संकट ने आपूर्ति शृंखला की संवेदनशीलता को उजागर किया, जिसके परिणामस्वरूप भारत ने वर्ष 2021 में सेमीकंडक्टर मिशन की शुरुआत की। इस मिशन की नीतियों का उद्देश्य आयात पर निर्भरता घटाना और घरेलू क्षमता का निर्माण करना है किन्तु प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, कुशल जनशक्ति और गहरे औद्योगिक पारितंत्र जैसी चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं।
सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला में भारत को वैश्विक नेतृत्वकर्ता बनाने के लिए प्रमुख चुनौतियाँ
- विनिर्माण में विलम्ब: लंबे समय तक यह कहा जाता रहा कि भारत सेमीकंडक्टर क्षेत्र में बहुत पीछे छूट चुका है। वर्तमान में चिप निर्माण कुछ चुनिंदा क्षेत्रों तक सीमित है, जिससे भारत के लिए प्रतिस्पर्धा में बने रहना एवं वैश्विक स्तर पर टिके रहना कठिन हो जाता है।
- उच्च पूँजी गहनता: सेमीकंडक्टर फैब्स (Fabs) की स्थापना हेतु 10 से 20 अरब डॉलर तक का निवेश आवश्यक होता है। इसमें लंबी अवधि लगती है और लाभ की अनिश्चितता बनी रहती है, जिससे भारत में निवेशकों का भरोसा कम हो सकता है।
- ऊर्जा और जल आवश्यकताएँ: चिप फैब्स को निरंतर विद्युत आपूर्ति और अत्यधिक मात्रा में अल्ट्रा–शुद्ध जल की आवश्यकता होती है। भारत के कई राज्य पहले से ही ऊर्जा और जल की कमी से जूझ रहे हैं।
- उदाहरण के लिए: ताइवान के चिप उद्योग को सूखे के दौरान भीषण जल संकट का सामना करना पड़ा था, जिसे ध्यान में रखते हुए भारत को सतत संसाधन योजना अपनानी होगी।
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की सुभेद्यतायें: सेमीकंडक्टर उत्पादन अत्यधिक व्यवधान–संवेदनशील है। विदेशों में किसी दुर्घटना, संकट या संयंत्र ठप होने से भारत की औद्योगिक गतिविधियों और सुरक्षा पर गहरा असर पड़ सकता है।
- उदाहरण के लिए: कोविड-19 के दौरान वैश्विक चिप संकट ने भारत के ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र को धीमा कर दिया, जिससे आयात पर निर्भरता की वास्तविकता उजागर हुई।
- महत्त्वपूर्ण संसाधनों पर निर्भरता: चिप निर्माण दुर्लभ धातुओं और अत्याधुनिक मशीनरी पर निर्भर करता है, जिनका नियंत्रण कुछ चुनिंदा देशों के पास है। यह भारत की आत्मनिर्भरता के लिए बड़ी चुनौती है।
- उदाहरण के लिए: जिस प्रकार रेअर अर्थ मैगनेट (Rare Earth Magnets) पर नियंत्रण ने वैश्विक शक्ति–संतुलन को प्रभावित किया है, उसी तरह सेमीकंडक्टर भी डिजिटल युग की शक्ति–परिभाषा तय करते हैं।
इन चुनौतियों से निपटने के उपाय
- त्वरित घरेलू विनिर्माण: इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तहत 10 संयंत्रों को मंजूरी दी गई है। इस वर्ष भारत का पहला “मेड इन इंडिया” चिप तैयार होने की संभावना है, जो भारत की उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्र में ऐतिहासिक प्रवेश का संकेत है।
- उदाहरण: साणंद में एक पायलट लाइन पहले ही शुरू हो चुकी है, तथा एक वर्ष के भीतर चार और इकाइयों में उत्पादन शुरू हो जाएगा।
- एक मजबूत टैलेंट पाइपलाइन (Talent pipeline) का निर्माण: सरकार–प्रेरित प्रशिक्षण कार्यक्रमों और वैश्विक साझेदारियों के माध्यम से भारतीय इंजीनियरों को चिप डिजाइन और विनिर्माण की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए तैयार किया जा रहा है।
- उदाहरण के लिए: लैम रिसर्च 60,000 इंजीनियरों को प्रशिक्षित करेगी, जबकि वर्ष 2025 में 60,000 से अधिक छात्रों ने इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन (EDA) उपकरणों पर 1.2 करोड़ घंटे तक अभ्यास किया।
- स्टार्ट-अप के माध्यम से पारिस्थितिकी तंत्र का विकास: डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) जैसी योजनाएँ नवाचार–आधारित चिप स्टार्ट–अप्स को प्रोत्साहन दे रही हैं।
- उदाहरण के लिए: माइंडग्रोव टेक्नोलॉजीज IIT मद्रास के SHAKTI प्रोसेसर का उपयोग कर IoT चिप्स डिजाइन कर रही है, जबकि नेट्रासेमी ने वेंचर कैपिटल से ₹107 करोड़ की फंडिंग जुटाई।
- वैश्विक सहयोग और निवेश: अग्रणी वैश्विक कंपनियों के साथ साझेदारियाँ भारत के फैब और R&D पारितंत्र को मजबूत कर रही हैं तथा अत्याधुनिक तकनीक तक भारत की पहुँच सुनिश्चित कर रही हैं।
- उदाहरण के लिए: अप्लाइड मैटेरियल्स, AMD और माइक्रोचिप भारत में R&D में 1.1 अरब डॉलर का निवेश कर रही हैं, साथ ही IISc और IITs जैसे संस्थानों के साथ भी गहन सहयोग कर रही हैं।
- एकीकृत राष्ट्रीय दृष्टिकोण: सेमीकंडक्टर निर्माण प्रधानमंत्री मोदी के “डिजिटल इंडिया टू प्रोडक्ट नेशन” के दृष्टिकोण में भी अंतर्निहित हैं जिसमें आधारभूत ढाँचे, डिजिटल पहुँच और औद्योगिक इलेक्ट्रॉनिक्स को समाहित किया गया है।
- उदाहरण के लिए: UPI और आधार जैसे प्लेटफार्मों ने एक डिजिटल आधार प्रदान किया, जबकि सेमीकॉन इंडिया समिट 2025 ने 48 देशों के 500 नेताओं को आकर्षित किया, जिससे भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा बढ़ी।
सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भारत का प्रवेश आयात पर निर्भरता कम करने और आत्मनिर्भरता स्थापित करने की एक रणनीतिक पहल को दर्शाता है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत तकनीकी बाधाओं को किस प्रकार दूर करता है, कुशल जनशक्ति का विस्तार करता है और सुदृढ़ औद्योगिक परिवेश का निर्माण करता है। एक सुदृढ़ वैश्विक सहयोग और सशक्त सरकारी समर्थन के साथ भारत के पास यह अवसर है कि वह सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला में एक विश्वसनीय और अग्रणी केंद्र के रूप में उभरे।