Q. उभयलिंगी व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 में प्रस्तावित प्रमुख परिवर्तनों पर चर्चा कीजिए। समावेशन और कल्याण पर इनके क्या प्रभाव हैं? (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • प्रस्तावित प्रमुख परिवर्तनों की चर्चा कीजिए।
  • समावेशन और कल्याण पर प्रभावों की चर्चा कीजिए।
  • आगे की राह सुझाइए।

उत्तर

उभयलिंगी व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 ने वर्ष 2019 के कानून की पुनः समीक्षा करते हुए पहचान की मान्यता और पात्रता मानदंडों में परिवर्तन प्रस्तावित किए हैं। हालाँकि इसका उद्देश्य कल्याण योजनाओं के लक्षित क्रियान्वयन को सुव्यवस्थित करना है, लेकिन यह समावेशन, अधिकारों और गरिमा से जुड़ी गंभीर चिंताएँ भी उत्पन्न करता है।

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प्रस्तावित प्रमुख परिवर्तन

  • उभयलिंगी व्यक्तियों की संकीर्ण परिभाषा: नई परिभाषा को सीमित कर कुछ सामाजिक-सांस्कृतिक समूहों और जन्मजात जैविक स्थितियों तक ही मान्यता दी गई है।
    • उदाहरण: जेंडरक्वियर और नॉन-बाइनरी पहचान को बाहर कर दिया गया है, जिन्हें वर्ष 2019 के कानून में शामिल किया गया था।
  • स्व-पहचान के अधिकार का हटाया जाना: व्यक्तियों को अपने लिंग की स्वयं पहचान करने का अधिकार समाप्त कर दिया गया है।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ के निर्णय को पलटते हुए अब स्व-घोषणा के स्थान पर चिकित्सीय प्रमाणन अनिवार्य किया गया है।
  • चिकित्सीय बोर्ड द्वारा प्रमाणन: पहचान प्रमाण-पत्र जारी करने से पूर्व चिकित्सीय जाँच को अनिवार्य बनाया गया है।
    • उदाहरण: मुख्य चिकित्सा अधिकारी के नेतृत्व में एक बोर्ड प्रमाणन की सिफारिश करेगा।
  • दंडात्मक प्रावधानों को सुदृढ़ करना: उभयलिंगी व्यक्तियों के विरुद्ध अपराधों के लिए कठोर दंड का प्रावधान किया गया है।
    • उदाहरण: किसी बच्चे को जबरन उभयलिंगी पहचान में धकेलने पर आजीवन कारावास।

समावेशन और कल्याण पर प्रभाव

  • विविध पहचानों का बहिष्करण: संकीर्ण परिभाषा के कारण कई वास्तविक उभयलिंगी व्यक्तियों को कानूनी मान्यता नहीं मिल पाएगी, विशेषकर नॉन-बाइनरी जैसे समूह।
  • स्वायत्तता और गरिमा का हनन: स्व-पहचान के अधिकार को हटाने से व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा प्रभावित होती है।
  • कल्याण योजनाओं तक पहुँच में बाधाएँ: चिकित्सीय प्रमाणन की अनिवार्यता से प्रक्रियात्मक जटिलताएँ बढ़ सकती हैं।
    • उदाहरण: वर्तमान में 32,000 से अधिक पहचान-पत्र धारकों को सरल प्रशासनिक प्रक्रिया का लाभ मिला है।
  • कलंक और भेदभाव में वृद्धि: अत्यधिक चिकित्सीय दृष्टिकोण सामाजिक पूर्वाग्रहों को और मजबूत कर सकता है।
    • उदाहरण: कार्यकर्ताओं के अनुसार, स्वास्थ्य प्रणाली में पहले से मौजूद ट्रांसफोबिया के कारण चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं।
  • शोषण के विरुद्ध बेहतर सुरक्षा: कठोर दंडात्मक प्रावधान जबरदस्ती और शोषण को रोकने में सहायक हो सकते हैं।
    • उदाहरण: जबरन भिक्षावृत्ति या बंधुआ मजदूरी के मामलों में कठोर सजा।

आगे की राह

  • स्व-पहचान के सिद्धांत को पुनर्स्थापित करना: संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप व्यक्तिगत स्वायत्तता को बनाए रखते हुए स्व-पहचान के अधिकार को बहाल किया जाना चाहिए।
  • समावेशी परिभाषा अपनाना: केवल जैविक मानदंडों तक सीमित न रहकर विविध लैंगिक पहचानों को मान्यता दी जाए।
    • उदाहरण: संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार मानकों के अनुरूप परिभाषा तैयार करना।
  • प्रमाणन प्रक्रिया को सरल बनाना: अत्यधिक चिकित्सीय हस्तक्षेप से बचते हुए प्रक्रिया को सरल किया जाए।
    • उदाहरण: वर्ष 2019 अधिनियम के तहत जिलाधिकारी आधारित प्रशासनिक व्यवस्था को जारी रखना।
  • कल्याण योजनाओं को सुदृढ़ करना: शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से संबंधित योजनाओं तक पहुँच का विस्तार किया जाए।
    • उदाहरण: उभयलिंगी पहचान-पत्रों के माध्यम से लक्षित लाभ प्रदान करना।
  • संवेदनशीलता और संस्थागत सुधार: सामाजिक और संस्थागत भेदभाव को कम करने के लिए जागरूकता और प्रशिक्षण आवश्यक है।
    • उदाहरण: स्वास्थ्यकर्मियों और प्रशासनिक अधिकारियों को समावेशी सेवा प्रदान करने हेतु प्रशिक्षित करना।

निष्कर्ष 

यद्यपि यह संशोधन स्पष्टता और सुरक्षा प्रदान करने का प्रयास करता है, इसके संकीर्ण दृष्टिकोण के कारण बहिष्करण और अधिकारों के ह्रास का जोखिम उत्पन्न होता है। एक संतुलित ढाँचा, जो गरिमा, समावेशन और सुलभ कल्याण सुनिश्चित करे, उभयलिंगी व्यक्तियों के लिए वास्तविक समानता प्राप्त करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

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