प्रश्न की मुख्य माँग
- लड़कियों के स्कूल छोड़ने के कारण
- शिक्षा के सार्वभौमीकरण के निहितार्थ
- नकारात्मक प्रभावों को दूर करने के उपाय।
|
उत्तर
अनुच्छेद-21A और शिक्षा का अधिकार अधिनियम के बावजूद, माध्यमिक स्तर पर बालिकाओं की विद्यालय छोड़ने की दर में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जाती है। यह लैंगिक अपवर्जन गहरे सामाजिक-सांस्कृतिक मानदंडों, आर्थिक बाधाओं और अवसंरचनात्मक कमियों के जटिल अंतःक्रिया से उत्पन्न होता है, जो बालिकाओं को उनकी पूर्ण शैक्षणिक क्षमता प्राप्त करने से वंचित करता है।
बालिकाओं के विद्यालय छोड़ने में योगदान देने वाले कारक
- अवसंरचनात्मक कमियाँ: कार्यशील, पृथक शौचालयों तथा मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन सुविधाओं का अभाव किशोरावस्था प्राप्त करने के बाद बालिकाओं को घर पर रहने के लिए विवश करता है।
- सुरक्षा संबंधी चिंताएँ: माध्यमिक विद्यालयों की अधिक दूरी और सुरक्षित परिवहन के अभाव से लैंगिक हिंसा का जोखिम बढ़ता है, जिससे अभिभावक बेटियों को विद्यालय भेजने से हिचकते हैं।
- उदाहरण: राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों में विद्यालय की दूरी बालिकाओं के उच्च ड्रॉपआउट का प्रमुख कारण है।
- घरेलू दायित्व: जड़ें जमाए पितृसत्तात्मक भूमिकाएँ प्रायः बालिकाओं की औपचारिक शिक्षा की तुलना में घरेलू कार्यों और भाई-बहनों की देखभाल को प्राथमिकता देती हैं।
- बाल विवाह: कानूनी निषेधों के बावजूद, बालिकाओं की “मर्यादा की रक्षा” के नाम पर शीघ्र विवाह उन्हें विद्यालय से बाहर करने का एक प्रमुख कारण बना हुआ है।
- उदाहरण: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार, बिना शिक्षा वाली 58% बालिकाओं का विवाह 18 वर्ष से पहले हो गया, जबकि उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली बालिकाओं में यह अनुपात केवल 4% था।
शिक्षा के सार्वभौमीकरण पर प्रभाव
- लैंगिक अंतर में वृद्धि: उच्च ड्रॉपआउट दर साक्षरता प्रोफाइल को असंतुलित करती है, जिससे सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के सतत् विकास लक्ष्य-4 की प्राप्ति बाधित होती है।
- पीढ़ीगत गरीबी: कम शिक्षित माताएँ बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा को प्राथमिकता देने में कम सक्षम होती हैं, जिससे भविष्य की पीढ़ियाँ गरीबी के दुष्चक्र में फँसी रहती हैं।
- आर्थिक उत्पादकता में हानि: निम्न शिक्षा स्तर के कारण औपचारिक कार्यबल से महिलाओं का बहिष्करण भारत की सकल घरेलू उत्पाद को भारी क्षति पहुँचाता है।
- उदाहरण: यदि लगभग 50% महिलाएँ कार्यबल में शामिल हो सकें, तो भारत की वार्षिक वृद्धि दर 1.5 प्रतिशत अंक बढ़कर 9 प्रतिशत तक पहुँच सकती है।
- सामाजिक सशक्तीकरण का क्षरण: शिक्षा के अभाव में बालिकाएँ अपने स्वास्थ्य, वित्त और लोकतांत्रिक भागीदारी से संबंधित सूचित निर्णय लेने की क्षमता खो देती हैं।
नकारात्मक प्रभावों को दूर करने के उपाय
- सशर्त नकद अंतरण: विद्यालय उपस्थिति और माध्यमिक शिक्षा पूर्ण करने से जुड़ी वित्तीय प्रोत्साहन योजनाएँ शिक्षा की अवसर लागत को कम कर सकती हैं।
- उदाहरण: पश्चिम बंगाल की कन्याश्री प्रकल्प योजना को ड्रॉपआउट और बाल विवाह में कमी के लिए वैश्विक मान्यता मिली है।
- अवसंरचनात्मक उन्नयन: पृथक शौचालयों की पूर्ण उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा सुरक्षित आवागमन के लिए साइकिल या “पिंक बस” उपलब्ध कराना।
- उदाहरण: छत्तीसगढ़ की सरस्वती साइकिल योजना ने प्राथमिक से माध्यमिक स्तर पर बालिकाओं के संक्रमण दर में उल्लेखनीय सुधार किया।
- सामुदायिक संवेदनशीलता: स्थानीय नेताओं और “विद्यालय प्रबंधन समितियों” के माध्यम से बालिकाओं की शिक्षा के मूल्य पर दृष्टिकोण बदलना अत्यंत आवश्यक है।
- उदाहरण: बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान जमीनी स्तर पर प्रतिगामी सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देने हेतु स्थानीय प्रेरकों का उपयोग करता है।
- डिजिटल एकीकरण: किफायती उपकरणों की उपलब्धता और लैंगिक-संवेदनशील डिजिटल साक्षरता दूरस्थ क्षेत्रों या संकट काल में शिक्षा की निरंतरता सुनिश्चित कर सकती है।
- उदाहरण: दीक्षा प्लेटफॉर्म का उपयोग विद्यालय से बाहर बालिकाओं के लिए विशेष सेतु पाठ्यक्रम प्रदान करने में किया गया है।
निष्कर्ष
बालिकाओं के विद्यालय छोड़ने की समस्या का समाधान केवल शैक्षिक लक्ष्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास की अनिवार्य शर्त है। लक्षित नीतिगत हस्तक्षेपों और सामाजिक लामबंदी के माध्यम से बालिकाओं की विशिष्ट संवेदनशीलताओं का समाधान कर भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि “शिक्षा का अधिकार” देश की प्रत्येक बेटी के लिए एक जीवंत वास्तविकता बने।
To get PDF version, Please click on "Print PDF" button.
Latest Comments