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Q. भारत में अवैध डिजिटल ऋण (Illegal Digital Lending) से निपटने में मौजूदा नियामक ढाँचे की सीमाओं पर चर्चा कीजिए। उपभोक्ता संरक्षण और वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए किन सुधारों की आवश्यकता है? (10 अंक, 150 शब्द)

April 16, 2026

GS Paper IIIIndian Economy

प्रश्न की मुख्य माँग

  • नियामक ढाँचे की सीमाओं को स्पष्ट कीजिए।
  • आवश्यक सुधार सुझाइए।

उत्तर

भारत में डिजिटल ऋण ऐप्स के तेजी से बढ़ते प्रसार ने ऐसे नियामक कमजोर बिंदुओं को उजागर किया है, जहाँ प्रौद्योगिकी वित्तीय निगरानी से आगे निकल गई है। इन अंतरालों को दूर करना कमजोर उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा और एक तेजी से विकसित हो रहे डिजिटल ऋण पारिस्थितिकी तंत्र में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

नियामक ढाँचे की सीमाएँ

  • नियामक अंतर: RBI मुख्यतः NBFCs को नियंत्रित करता है, जबकि शोषण अक्सर ऐप और डेटा स्तर पर होता है।
    • उदाहरण: RBI डिजिटल ऋण दिशा-निर्देशों के बावजूद ऐप्स डिजिटल इंटरफेस के माध्यम से नियमों से बच निकलते हैं।
  • अनियमित संस्थाएँ: कई ऐप्स बिना अधिकृत हुए NBFC साझेदारी का झूठा दावा करते हैं।
    • उदाहरण: फर्जी NBFCs लिंक और बिना नियामक दर्जे के ऋण वितरण।
  • डेटा का दुरुपयोग: अत्यधिक डेटा एक्सेस और दुरुपयोग पर कड़ा नियंत्रण नहीं है।
    • उदाहरण: ऐप्स द्वारा संपर्क सूची, फोटो, GPS डेटा निकालकर उत्पीड़न के लिए उपयोग।
  • कमजोर प्रवर्तन: क्षेत्राधिकार संबंधी समस्याएँ सीमा-पार संचालन के खिलाफ कार्रवाई को सीमित करती हैं।
    • उदाहरण: कॉल सेंटर अन्य राज्यों या विदेशों में होने के कारण स्थानीय पुलिस की पहुँच से बाहर।
  • कमजोर उपभोक्ता सुरक्षा: शिकायत निवारण तंत्र और ऋण शर्तों में पारदर्शिता का अभाव।
    • उदाहरण: केरल के मामलों में छिपे हुए शुल्क और शिकायत व्यवस्था की कमी सामने आई।

आवश्यक सुधार

  • प्रौद्योगिकी स्तर नियंत्रण: वित्तीय ऐप्स के लिए ऑपरेटिंग सिस्टम के स्तर पर डेटा तक पहुँच को सीमित किया जाए।
  • सशक्त कानून : अवैध डिजिटल ऋण प्रथाओं के विरुद्ध कड़े दंडात्मक कानून बनाए जाएँ।
  • सत्यापित ऐप पारिस्थितिकी: RBI-नियंत्रित संस्थाओं से जुड़ी प्रमाणन प्रणाली अनिवार्य की जाए।
    • उदाहरण: क्रिप्टोग्राफिक प्रमाण-पत्र और ऐप स्टोर के लिए RBI व्हाइटलिस्ट।
  • पारदर्शिता मानदंड: ब्याज दरों और शुल्कों का स्पष्ट खुलासा सुनिश्चित किया जाए।
    • उदाहरण: प्रभावी ब्याज दर और सभी शुल्कों की अनिवार्य जानकारी।
  • सुदृढ़ प्रवर्तन: केवाईसी मानकों को कठोर करना और उच्च जोखिम लेन-देन की निगरानी सुनिश्चित करना।
    • उदाहरण: UPI IDs पर जोखिम संकेत और पेमेंट एग्रीगेटर्स के लिए सख्त केवाईसी।

निष्कर्ष

अवैध डिजिटल ऋण प्रथाओं से निपटने के लिए वित्तीय विनियमन और प्रौद्योगिकी निगरानी के बीच समन्वय आवश्यक है। कानूनी ढाँचे को सुदृढ़ करना, पारदर्शिता सुनिश्चित करना और डिजिटल अवसंरचना स्तर पर सुरक्षा उपायों को शामिल करना उपभोक्ता विश्वास और प्रणालीगत अखंडता बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

Discuss the limitations of existing regulatory frameworks in tackling illegal digital lending in India. What reforms are needed to ensure consumer protection and financial accountability? in hindi

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