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Q. G20 को बढ़ती भू-राजनीतिक समस्याओं और इसकी प्रासंगिकता के बारे में उठते सवालों का सामना करना पड़ रहा है। इस संदर्भ में, वर्तमान में G20 के समक्ष आने वाली प्रमुख चुनौतियों की चर्चा कीजिये। यह भी विश्लेषण कीजिये कि भारत ने समूह के भीतर ग्लोबल साउथ की एक प्रमुख आवाज के रूप में स्वयं को कैसे स्थापित किया है। (15 अंक, 250 शब्द)

November 25, 2025

GS Paper IIInternational Relations

प्रश्न की मुख्य माँग

  • वर्तमान में G20 के सामने प्रमुख चुनौतियाँ।
  • भारत ने ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधि के रूप में अपनी स्थिति कैसे बनाई है।
  • एक प्रमुख प्रतिनिधि के रूप में भारत की स्थिति की सीमाएँ/विफलताएँ।

उत्तर

संघर्षों, असमानता और यहाँ तक कि जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन के अमेरिकी बहिष्कार में दिखाई देने वाले भू-राजनीतिक तनाव ने G-20 की प्रासंगिकता पर बुनियादी संदेह उत्पन्न कर दिया है। ये तनाव मंच की कमजोर होती एकजुटता को उजागर करते हैं और दुनिया के प्रमुख आर्थिक समन्वयक के रूप में इसकी भूमिका निभाने की क्षमता को जटिल बनाते हैं।

आज G-20 के सामने प्रमुख चुनौतियाँ

  • गहराते भू-राजनीतिक विभाजन: क्षेत्रों में संघर्ष आम सहमति निर्माण को कम करते हैं और सामूहिक कार्रवाई को खंडित करते हैं।
    • उदाहरण: जोहान्सबर्ग घोषणा-पत्र में केवल सूडान, कांगो गणराज्य, फिलिस्तीन और यूक्रेन में ‘न्यायसंगत और स्थायी शांति’ का आह्वान किया गया था।
  • नेतृत्व प्रतिबद्धता का कमजोर होना: प्रमुख शक्तियों की अनुपस्थिति वैधता और निर्णय लेने की क्षमता को कमजोर करती है।
    • उदाहरण: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शिखर सम्मेलन का पूर्ण बहिष्कार किया, जो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था द्वारा किया गया पहला ऐसा बहिष्कार था।
  • सीमित एकजुटता और निष्क्रियता: विघटनकारी कार्रवाइयों की एकीकृत आलोचना का अभाव मंच की विश्वसनीयता को कमजोर करता है।
    • उदाहरण: अमेरिकी बहिष्कार के महत्त्व के बावजूद, उसकी कोई सामूहिक आलोचना नहीं हुई।
  • सतत् आर्थिक असमानता: वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और असमान विकास एजेंडा सहयोग पर दबाव डालते हैं।
  • उबंटू भावना का क्षरण: शक्तिशाली सदस्यों के बीच बढ़ता स्वार्थ, G-20 के साझा उत्तरदायित्व के सिद्धांत के विपरीत है।
    • उदाहरण: जिन्हें “मैं हूँ क्योंकि हम हैं” का सिद्धांत अपनाना चाहिए, वे समूह को दरकिनार कर रहे हैं।

भारत ने स्वयं को ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधि के रूप में कैसे स्थापित किया है

  • ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं का समर्थन: भारत ने दक्षिण की असमानता, संघर्ष समाधान और विकास संबंधी आवश्यकताओं को प्रमुखता से उठाया।
    • उदाहरण: भारत ने वर्ष 2023 में अफ्रीकी संघ की स्थायी G20 सदस्यता सुनिश्चित की, जिससे दक्षिणी प्रतिनिधित्व का विस्तार हुआ।
  • विकासोन्मुखी पहलों की पेशकश: भारत ने स्वास्थ्य, कौशल और डेटा संबंधी कमियों को दूर करने वाली व्यावहारिक, मापनीय पहलों का प्रस्ताव रखा।
    • उदाहरण: पारंपरिक ज्ञान भंडार, G20-अफ्रीका कौशल गुणक (10 लाख अफ्रीकियों को प्रशिक्षण)।
  • दक्षिण-दक्षिण सहयोग को बढ़ावा देना: भारत ग्लोबल साउथ की जरूरतों के अनुरूप तकनीक, क्षमता निर्माण और विशेषज्ञता साझा करता है।
    • उदाहरण: कृषि, मत्स्यपालन और आपदा प्रबंधन के लिए “ओपन सैटेलाइट डेटा पार्टनरशिप” का प्रस्ताव।
  • विकासशील देशों की सुरक्षा चिंताओं की वकालत: भारत ने नशीली दवाओं और आतंकवाद के बीच गठजोड़ का मुद्दा उठाया और मजबूत वैश्विक सहयोग की माँग की।
  • वैश्विक शासन में समावेशिता को शामिल करना: भारत ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए प्रासंगिक वैकल्पिक विकास मानदंडों पर जोर दिया।

एक प्रमुख आवाज़ के रूप में भारत की स्थिति की सीमाएँ/विफलताएँ

  • अंतिम घोषणा पर सीमित प्रभाव: भारत की प्राथमिकताओं ने शिखर सम्मेलन के परिणामों को पूरी तरह से आकार नहीं दिया।
    • उदाहरण: वर्ष 2023 के नई दिल्ली घोषणा-पत्र की तुलना में आतंकवाद की न्यूनतम निंदा से भारत “निराश” था।
  • महाशक्तियों के अलगाव को रोकने में असमर्थता: अपनी नेतृत्वकारी भूमिका के बावजूद, भारत अमेरिकी बहिष्कार को टाल नहीं सका।
  • भू-राजनीतिक मुद्दों पर तनावपूर्ण प्रभाव: भारत के शांति आह्वान को सीमित सामूहिक समर्थन मिला।
    • उदाहरण: घोषणा-पत्र की सामान्य शांति अपीलों ने संघर्ष कूटनीति पर भारत के सीमित प्रभाव को उजागर किया।
  • वैश्विक नेतृत्व के प्रतिस्पर्द्धी आख्यान: आंतरिक विभाजन सामूहिक ग्लोबल साउथ एजेंडे को आगे बढ़ाने की भारत की क्षमता को कम करते हैं।
  • भारत की विकास पहलों का मामूली स्वागत: सदस्य प्राथमिकताओं के कारण प्रस्तावों को सर्वसम्मति से उत्साह नहीं मिला।
    • उदाहरण: महत्त्वपूर्ण खनिज परिसंचरण और स्वास्थ्य सेवा प्रतिक्रिया दल जैसी पहल आकांक्षा पूर्ण रहीं।

निष्कर्ष

विश्वास बहाल करने, सार्वभौमिक भागीदारी सुनिश्चित करने और “उबंटू” की सहयोगात्मक भावना को पुनर्जीवित करने के लिए G-20 में सुधार आवश्यक है। मजबूत समावेशिता, स्पष्ट विकास प्राथमिकताएँ और प्रमुख शक्तियों की नई प्रतिबद्धता इस समूह की विश्वसनीयता को फिर से स्थापित कर सकती है और इसे वैश्विक आर्थिक तथा राजनीतिक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करने में सक्षम बना सकती है।

The G20 faces growing geopolitical fractures and rising questions about its relevance. In this context, discuss the major challenges confronting the G20 today. Also analyse how India has positioned itself as a key voice of the Global South within the grouping. in hindi

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