Q. भारत के वर्ष 1991 के बाद के आर्थिक मॉडल के बाद उच्च जीडीपी वृद्धि तो हुई है, लेकिन पर्याप्त रोजगार सृजन या संतुलित क्षेत्रीय विकास संभव नहीं हुआ है। इस विकास मॉडल की संरचनात्मक सीमाओं का विश्लेषण कीजिए और वर्ष 2047 में भारत की स्वतंत्रता की शताब्दी के निकट आने पर एक नए आर्थिक मॉडल की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • वर्ष 1991 के बाद के मॉडल की संरचनात्मक सीमाएँ
  • नए आर्थिक मॉडल की आवश्यकता (विकासित भरत 2047)।

उत्तर

वर्ष 1991 के उदारीकरण–निजीकरण–वैश्वीकरण सुधारों के बाद भारत का सकल घरेलू उत्पाद लगभग 270 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2024–25 में 3.9 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया। तथापि, यह “विकास-प्रथम” प्रतिमान “रोजगार-विहीन विकास” और शहरी सेवा केंद्रों तथा ग्रामीण क्षेत्रों के बीच समृद्धि का अंतर बढ़ रहा है, जिसके कारण विजन 2047 की ओर पुनर्संतुलन की आवश्यकता है।

वर्ष 1991 के बाद के मॉडल की संरचनात्मक सीमाएँ

  • सेवा-आधारित असंतुलन: विकास मुख्यतः उच्च-कौशल सेवा क्षेत्रों (सूचना प्रौद्योगिकी/वित्त) द्वारा संचालित रहा, जो सकल घरेलू उत्पाद में बड़ा योगदान देते हैं, परंतु कार्यबल के केवल एक छोटे हिस्से को ही रोजगार प्रदान करते हैं।
    • उदाहरण: सेवा क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद में 50% से अधिक का योगदान देता है, जबकि कुल श्रमबल के 30% से कम को रोजगार देता है।
  • मध्य वर्ग का अभाव (विनिर्माण): इस मॉडल ने पारंपरिक बड़े पैमाने के विनिर्माण को नजरअंदाज कर दिया, जिससे अर्द्ध-कुशल आबादी का एक विशाल हिस्सा कम उत्पादकता वाली कृषि में फँसा रह गया।
    • उदाहरण: GDP में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी दशकों से लगभग 14-17% पर स्थिर बनी हुई है।
  • क्षेत्रीय विकास का संकेंद्रण: उदारीकरण ने उन राज्यों को लाभ पहुँचाया, जिनके पास पहले से ही तटीय लाभ या औद्योगिक आधार थे, जिससे दक्षिण/पश्चिम और उत्तर/पूर्व के बीच “बड़ा विभाजन” और गहरा गया।
    • उदाहरण: भारत की GDP में पाँच राज्यों (महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, गुजरात, उत्तर प्रदेश) का योगदान लगभग आधा है, जबकि बिहार की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत के 50% से भी कम है।
  • रोजगार विहीन विकास पथ: पूँजी-प्रधान औद्योगीकरण और स्वचालन प्रक्रिया ने यह सुनिश्चित किया है कि उद्योग के विकास के बावजूद, रोजगार की लोच कमजोर बनी रहती है।
  • अनौपचारिकता और असुरक्षा: सुधारों ने निजी क्षेत्र का विस्तार किया, लेकिन इसके परिणामस्वरूप “औपचारिक व्यवस्था का अनौपचारिकीकरण” हुआ, जहाँ अधिकांश नई नौकरियों में सामाजिक सुरक्षा या दीर्घकालिक अनुबंधों का अभाव है।
    • उदाहरण: भारत के लगभग 90% कार्यबल अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं, जिनमें महामारी जैसे समय के दौरान आवश्यक सामाजिक  सुरक्षा का अभाव है।
  • पारिस्थितिकी बाह्यताएँ: पश्चिमी उपभोग-आधारित मॉडल भारत की विशिष्ट संसाधन सीमाओं की उपेक्षा करता है, जिससे भूमि क्षरण और जल-तनाव तीव्र हुआ है।

नए आर्थिक मॉडल की आवश्यकता (विकसित भारत 2047)

  • श्रम-प्रधान औद्योगिकीकरण: अर्द्ध-कुशल युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित करने के लिए लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) और “प्लग-एंड-प्ले” औद्योगिक पार्कों पर ध्यान केंद्रित करना।
    • उदाहरण: उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन योजना को 14 क्षेत्रों में लागू कर वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में एकीकरण के साथ 6 मिलियन रोजगार सृजन का लक्ष्य।
  • ग्रामीण-केंद्रित विकास: संकटग्रस्त शहरी प्रवासन को रोकने हेतु ग्रामीण अर्थव्यवस्था को “आजीविका-आधारित कृषि” से “कृषि-व्यवसाय केंद्रों” में रूपांतरित करना।
  • संतुलित क्षेत्रीय सत्ता हस्तांतरण: पिछड़े क्षेत्रों में लक्षित अवसंरचना के माध्यम से “ट्रिकल-डाउन” सिद्धांत से आगे बढ़कर “बॉटम-अप” विकास की ओर बढ़ना।
    • उदाहरण: प्रधानमंत्री गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान अंतर्देशीय क्षेत्रों में लॉजिस्टिक्स अवसंरचना का समन्वय कर क्षेत्रीय विषमता घटाने का लक्ष्य रखता है।
  • मानव पूँजी में निवेश: प्राथमिक स्वास्थ्य और व्यावसायिक शिक्षा में क्रांति लाकर “कम लागत वाले श्रम” से “उच्च मूल्य वाली प्रतिभा” की ओर बदलाव लाना।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 “रोजगार योग्यता अंतर” को दूर करने के लिए कौशल-आधारित शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करती है।
  • स्थिरता-संबद्ध अर्थव्यवस्था: “चक्रीय अर्थव्यवस्था” मॉडल को अपनाना, जो विकास को संसाधन क्षरण से अलग करता है, ताकि नेट जीरो लक्ष्यों को पूरा किया जा सके।
    • उदाहरण: हरित हाइड्रोजन मिशन ऊर्जा आत्मनिर्भरता और हरित रोजगार सृजन की दिशा में रणनीतिक परिवर्तन का प्रतीक है।
  • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI): भारत के “टेक्नोलॉजी स्टैक” का लाभ उठाकर अर्थव्यवस्था को औपचारिक रूप देना और सेवाओं की व्यापक उपलब्धता के माध्यम से प्रत्यक्ष सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना।

निष्कर्ष

भारत को वर्ष 2047 की ओर अपनी यात्रा में “किसी भी कीमत पर विकास” की मानसिकता से हटकर “समावेशी और लचीली समृद्धि” की ओर बढ़ना होगा। तकनीकी नवाचार को ग्रामीण-केंद्रित और संसाधन-संवेदनशील दृष्टिकोण के साथ मिलाकर, भारत एक अद्वितीय “स्वदेशी मॉडल” तैयार कर सकता है, जो यह सुनिश्चित करेगा कि जनसांख्यिकीय लाभांश रोजगारहीन विकास में परिवर्तित न हो जाए, बल्कि विकसित भारत के लिए इसका महत्वपूर्ण योगदान रहे।

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