प्रश्न की मुख्य माँग
- बताइए कि मल्टी-ब्रांड रिटेल में FDI के प्रति भारत के सतर्क दृष्टिकोण का क्या औचित्य है।
- समझाइए कि क्या संरक्षणवाद ने छोटे खुदरा व्यापारियों को सशक्त किया है।
- वर्णन कीजिए कि क्या इससे प्रतिस्पर्धात्मकता और वैश्विक एकीकरण सीमित हुआ है।
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उत्तर
मल्टी-ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के संबंध में भारत की नीति सामाजिक-आर्थिक चिंताओं एवं राजनीतिक संवेदनशीलताओं के कारण जानबूझकर सतर्क रही है। यद्यपि इसका उद्देश्य करोड़ों छोटे दुकानदारों एवं सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) की रक्षा करना है, तथापि यह प्रश्न भी उठता है कि क्या इस नीति ने क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता एवं वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में गहन एकीकरण को सीमित किया है।
मल्टी-ब्रांड रिटेल में FDI के प्रति भारत के सतर्क दृष्टिकोण का औचित्य
- छोटे खुदरा व्यापारियों की सुरक्षा: भारत में लगभग 1.2 करोड़ छोटी दुकानें हैं, जो 4 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करती हैं; अनियंत्रित FDI से उनके विस्थापन की आशंका है।
उदा: वैश्विक रिटेल शृंखलाओं के प्रभुत्व से स्थानीय किराना नेटवर्क प्रभावित हो सकता है।
- शोषणकारी मूल्य निर्धारण की रोकथाम: बड़ी वैश्विक कंपनियाँ बाजार हिस्सेदारी प्राप्त करने हेतु अत्यधिक कम मूल्य निर्धारण (predatory pricing) अपना सकती हैं।
- खाद्य सुरक्षा का संरक्षण: बड़े रिटेल समूह सार्वजनिक वितरण प्रणाली एवं आवश्यक खाद्य आपूर्ति तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं।
उदा: आवश्यक वस्तुओं की खरीद पर सरकार नियामकीय नियंत्रण बनाए रखती है।
- स्थानीय स्रोतों एवं रोजगार को प्रोत्साहन: FDI नियमों में बैक-एंड अवसंरचना निवेश एवं घरेलू स्रोतों से खरीद की शर्तें निर्धारित हैं।
उदा: 100 मिलियन डॉलर के FDI का 50% कोल्ड चेन जैसी अवसंरचना में निवेश अनिवार्य है।
- राजनीतिक एवं सांस्कृतिक संवेदनशीलता: खुदरा क्षेत्र स्थानीय विश्वास से जुड़ा है; तीव्र उदारीकरण जन-आक्रोश को जन्म दे सकता है।
क्या संरक्षणवाद ने छोटे खुदरा व्यापारियों को सशक्त किया है?
- सीमित विदेशी प्रवेश: विदेशी मल्टी-ब्रांड रिटेल पर प्रतिबंधों से स्थानीय किराना दुकानों की बाजार हिस्सेदारी सुरक्षित रही।
उदा: शहरी बाजारों एवं कस्बों में घरेलू खुदरा का प्रभुत्व बना हुआ है।
- रोजगार संरक्षण: छोटे दुकानदार रोजगार के महत्वपूर्ण स्रोत बने रहे, जबकि वैश्विक शृंखलाएँ स्वचालन पर अधिक निर्भर हो सकती थीं।
- वैश्विक झटकों के प्रति लचीलापन: कोविड-19 जैसे व्यवधानों के दौरान स्थानीय खुदरा नेटवर्क सक्रिय रहे, जब बड़ी शृंखलाएँ बाधित रहीं।
- स्वामित्व एवं नियंत्रण: भारतीय कंपनियाँ मूल्य निर्धारण एवं खरीद में स्वायत्तता बनाए रखती हैं।
- MSMEs को संरक्षण: संरक्षणवादी नीति सूक्ष्म एवं लघु उत्पादकों को प्रतिस्पर्धी दबाव से आंशिक सुरक्षा प्रदान करती है।
उदा: स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं के समर्थन की अनिवार्यता।
क्या इससे प्रतिस्पर्धात्मकता एवं वैश्विक एकीकरण सीमित हुआ है?
- आपूर्ति शृंखला आधुनिकीकरण में मंदी: वैश्विक खुदरा विक्रेता रसद, प्रौद्योगिकी और पैमाने के लाभ लाते हैं।
उदा: वॉलमार्ट या कैरेफोर मॉडल फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम कर सकते हैं।
- विदेशी निवेश प्रवाह में कमी: कड़े प्रतिबंधों से भारत अन्य देशों की तुलना में वैश्विक रिटेल निवेशकों के लिए कम आकर्षक हो सकता है।
- वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में सीमित भागीदारी: सीमाओं के कारण निर्यात-उन्मुख एकीकरण एवं मूल्य संवर्धन अपेक्षाकृत कम रहा है।
उदा: भारत का वैश्विक मूल्य संवर्धन अनुपात अभी भी अपेक्षाकृत निम्न है।
- उपभोक्ता विकल्पों की सीमा: सतर्क नीति के कारण वैश्विक ब्रांडों एवं विविध गुणवत्ता तक पहुँच में विलंब होता है।
- उत्पादकता एवं मूल्य दक्षता: बड़े खुदरा विक्रेता पैमाने के माध्यम से अर्थव्यवस्था से लागत घटाकर प्रतिस्पर्धी मूल्य प्रदान कर सकते हैं।
निष्कर्ष
मल्टी-ब्रांड रिटेल में FDI के प्रति भारत की सतर्क नीति ने पारंपरिक खुदरा पारिस्थितिकी तंत्र एवं छोटे व्यापारियों की रक्षा की है, किंतु इससे प्रतिस्पर्धात्मकता एवं वैश्विक एकीकरण पर कुछ सीमाएँ भी उत्पन्न हुई हैं। चरणबद्ध उदारीकरण, सुदृढ़ घरेलू सुरक्षा उपायों, कौशल विकास एवं अवसंरचना निवेश के संयोजन से खुदरा क्षेत्र का आधुनिकीकरण करते हुए स्थानीय आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।