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Q. समकालीन भारत में डॉ. बी. आर. अंबेडकर के सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण की प्रासंगिकता पर चर्चा कीजिए। इसे सशक्त बनाने के उपाय सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)

April 15, 2026

GS Paper IModern History

प्रश्न की मुख्य माँग

  • अंबेडकर के सामाजिक न्याय पर दृष्टिकोण की चर्चा कीजिए। 
  • समकालीन प्रासंगिकता का वर्णन कीजिए।
  • सुदृढ़ीकरण के उपाय सुझाइए।

उत्तर

जातिगत असमानताओं और सामाजिक बहिष्कार के मध्य, डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने सामाजिक न्याय को भारतीय लोकतंत्र की नैतिक नींव के रूप में परिकल्पित किया। उनका संवैधानिक दृष्टिकोण समकालीन भारत में समानता, गरिमा और समावेशी विकास प्राप्त करने के लिए महत्त्वपूर्ण बना हुआ है।

अंबेडकर की सामाजिक न्याय की दृष्टि 

  • सामाजिक समानता: कानूनी और सामाजिक सुधारों के माध्यम से जाति-आधारित भेदभाव और अस्पृश्यता का उन्मूलन।
    • उदाहरण: अनुच्छेद-17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है; नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 इसके पालन को दंडनीय बनाता है।
  • कानूनी न्याय: सभी नागरिकों के अधिकारों और संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए संवैधानिक प्रावधानों का उपयोग।
    • उदाहरण: मौलिक अधिकार (अनुच्छेद-14–17) कानून के समक्ष समानता और भेदभाव निषेध की गारंटी देते हैं।
  • समावेशी लोकतंत्र: वंचित वर्गों की शासन में राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करना।
    • उदाहरण: संसद और राज्य विधानसभाओं में SC/ST के लिए आरक्षण (अनुच्छेद-330–332)।
  • गरिमा पर बल: मानव गरिमा को अधिकारों और स्वतंत्रताओं का मूल आधार मानना।
    • उदाहरण: अनुच्छेद-21 को सर्वोच्च न्यायालय ने गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार के रूप में व्याख्यायित किया है।
  • सुधारवादी दृष्टिकोण: संवैधानिक उपायों और जनजागरूकता के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन लाना।
    • उदाहरण: जाति-आधारित हिंसा को रोकने और सामाजिक परिवर्तन को बढ़ावा देने हेतु SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989।

समकालीन प्रासंगिकता

  • स्थायी असमानता: कानूनी सुरक्षा के बावजूद जातिगत भेदभाव प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में जारी है।
  • आर्थिक अंतर: वंचित समुदाय अभी भी आय और आजीविका में असमानताओं का सामना कर रहे हैं।
    • उदाहरण: SECC डेटा के अनुसार, SC/ST परिवारों में गरीबी का स्तर अधिक है।
  • सामाजिक बहिष्करण: शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार तक असमान पहुँच बनी हुई है।
  • लोकतांत्रिक समावेशन: राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ा है, लेकिन प्रभावी भागीदारी सीमित है।
    • उदाहरण: 73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन स्थानीय निकायों में आरक्षण सुनिश्चित करते हैं, फिर भी निर्णय-निर्माण में बाधाएँ बनी रहती हैं।
  • अधिकारों के प्रति जागरूकता: सीमित जागरूकता के कारण संवैधानिक प्रावधानों का पूर्ण लाभ नहीं मिल पाता है।
    • उदाहरण: विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 लोक अदालतों और जागरूकता अभियानों के माध्यम से कानूनी साक्षरता को बढ़ावा देता है।

सुदृढ़ीकरण के उपाय

  • प्रभावी क्रियान्वयन: सामाजिक न्याय से संबंधित कानूनों के प्रवर्तन और जवाबदेही तंत्र को मजबूत करना।
    • उदाहरण: SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत त्वरित न्याय के लिए विशेष न्यायालय।
  • शिक्षा तक पहुँच: वंचित वर्गों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक समान पहुँच का विस्तार।
    • उदाहरण: भारत सरकार की पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना (SC/ST छात्रों के लिए)।
  • आर्थिक सशक्तीकरण: उद्यमिता, ऋण सुविधा और आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देना।
    • उदाहरण: स्टैंड-अप इंडिया योजना SC/ST उद्यमियों को बैंक ऋण उपलब्ध कराती है।
  • सामाजिक जागरूकता: जातिगत पूर्वाग्रहों को दूर करने के लिए निरंतर जागरूकता और व्यवहार परिवर्तन पहल।
    • उदाहरण: अंबेडकर जयंती अभियान और सामाजिक न्याय कार्यक्रम।
  • संस्थागत सुदृढ़ीकरण: संवैधानिक और वैधानिक संस्थाओं की क्षमता और प्रभावशीलता बढ़ाना।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) सुरक्षा उपायों की निगरानी और शिकायतों का समाधान करता है।

निष्कर्ष

बढ़ती असमानताओं और नए प्रकार के बहिष्करण के इस दौर में डॉ. बी. आर. अंबेडकर की दृष्टि अत्यंत प्रासंगिक बनी हुई है। न्याय, गरिमा और बंधुत्व को साकार करने के लिए आज के भारत में मजबूत संस्थागत प्रयास तथा सामाजिक परिवर्तन दोनों आवश्यक हैं।

Discuss the relevance of Dr. B. R. Ambedkar’s vision of social justice in contemporary India. Suggest measures to strengthen it. in hindi

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