प्रश्न की मुख्य माँग
- बायो-फोर्टिफिकेशन की भूमिका
- बहुक्षेत्रीय पहलों की भूमिका
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उत्तर
परिचय
भारत वर्तमान में एक दोहरी पोषणीय चुनौती से जूझ रहा है, जहाँ एक ओर अल्पपोषण की समस्या बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर मोटापा (Obesity) तथा गैर-संचारी रोगों (NCDs) में तीव्र वृद्धि देखी जा रही है। इसने केवल कैलोरी-केंद्रित ‘ऊर्जा सुरक्षा’ (Energy Security) के दृष्टिकोण की सीमाओं को उजागर कर दिया है, और पोषक तत्त्वों से भरपूर कृषि तथा एकीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेपों के माध्यम से ‘पोषण सुरक्षा’ की ओर एक व्यापक बदलाव की आवश्यकता को रेखांकित किया है।
बायो-फोर्टिफिकेशन की भूमिका
- पोषक तत्त्वों का संवर्द्धन : बायो-फोर्टिफिकेशन फसलों में सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की सघनता बढ़ाकर देश में व्यापक ‘सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की अल्पता’ (Micronutrient Deficiency) की चुनौती से निपटने का एक स्थायी समाधान है।
- उदाहरण: भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) ने जिंक-समृद्ध गेहूँ, आयरन (लौह)-समृद्ध बाजरा और विटामिन ए-समृद्ध गाजर विकसित की है।
- किफायती पहुंच : यह महँगे प्रसंस्कृत फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों पर निर्भरता के बिना, नियमित खाद्य फसलों के माध्यम से पोषण प्रदान करता है।
- उदाहरण: बायो-फोर्टिफिकेशन उन बाजार मूल्य निर्धारण और उत्पादन संबंधी बाधाओं से सुरक्षा प्रदान करता है, जो सामान्य खाद्य फोर्टिफिकेशन को प्रभावित करते हैं।
- संतुलित पोषण : बायो-फोर्टिफिकेशन फसलें किसी पृथक पोषक तत्त्व सप्लीमेंट (Isolated nutrient supplementation) के बजाय प्राकृतिक रूप से एक साथ कई पोषक तत्त्व प्रदान करती हैं।
- आहार विविधता: पोषक तत्त्वों से भरपूर किस्मों के माध्यम से फसल विविधीकरण स्वस्थ और अधिक विविध आहार का समर्थन करता है।
- जलवायु सुदृढ़ता: भविष्य की खाद्य प्रणालियों को सुरक्षित करने के लिए अनुसंधान में पोषक तत्त्वों से भरपूर फसलों को जलवायु सुदृढ़ता के साथ जोड़ा जा रहा है।
बहु-क्षेत्रीय पहलों की भूमिका
- एकीकृत कृषि: सेहत’ (SEHAT) पहल बहु-आयामी पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कृषि, पशुपालन, मत्स्यपालन और बागवानी के मध्य अभिसरित दृष्टिकोण अपनाते हुए एकीकृत कृषि प्रणाली को सुदृढ़ करती है।
- स्वास्थ्य संबद्धता: यह पहल कृषि को सीधे पोषण-जनित गैर-संचारी रोगों की रोकथाम के साथ एकीकृत करती है।
- वैज्ञानिक सत्यापन: यह बायो-फोर्टिफिकेशन फसलों से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों का साक्ष्य-आधारित मूल्यांकन निर्मित करता है।
- उदाहरण: भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) ने बाजरा जैसी फसलों के स्वास्थ्य लाभों का वैज्ञानिक रूप से आकलन करने के लिए भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के साथ साझेदारी की है।
- वन हेल्थ दृष्टिकोण : ‘यह कार्यक्रम ‘वन हेल्थ’ (One Health) दृष्टिकोण के अनुरूप क्रियान्वित है, जो मानव स्वास्थ्य, पर्यावरणीय संधारणीयता और कृषि कल्याण की पारस्परिक निर्भरता को एक एकीकृत नीतिगत ढाँचे में समाहित करता है।
- निवारक स्वास्थ्य देखभाल : यह पहल गैर-संचारी रोगों के विरुद्ध प्रारंभिक पहचान और निरंतर देखभाल के माध्यम से निवारक स्वास्थ्य देखभाल का समर्थन करती है।
आगे की राह
- पोषण नीतियाँ: सार्वजनिक नीति के केंद्र बिंदु को ‘कैलोरी की पर्याप्तता’ (Calorie sufficiency) से परिवर्तित कर ‘संतुलित पोषण संबंधी परिणामों’ (Balanced nutritional outcomes) की ओर स्थानांतरित करना।
- अनुसंधान का विस्तार: साक्ष्य-चालित पोषण हस्तक्षेपों के लिए कृषि और चिकित्सा अनुसंधान के मध्य सहयोग को सुदृढ़ करना।
- उदाहरण: ‘सेहत’ (SEHAT) पहल के अंतर्गत भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की भागीदारी अंतर-विषयी समन्वय का एक अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत करती है।
- कृषक सहायता: न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के प्रोत्साहनों, कृषि विस्तार सेवाओं और बीज वितरण के माध्यम से बायो-फोर्टिफिकेशन फसलों को बढ़ावा देना।
- उदाहरण: सरकारी सहायता के माध्यम से आयरन (लौह)-समृद्ध बाजरा जैसी पोषक तत्त्वों से भरपूर किस्मों के उत्पादन को बड़े पैमाने पर (Scale) बढ़ाया जा सकता है।
- जन जागरूकता: पोषण शिक्षा और निवारक स्वास्थ्य देखभाल अभियानों के माध्यम से स्वस्थ आहार संबंधी व्यवहार (Dietary behaviour) को प्रोत्साहित करना।
- खाद्य विविधता: सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और स्कूली पोषण योजनाओं (जैसे- मध्याह्न भोजन/पीएम पोषण) के माध्यम से मोटे अनाज (श्री अन्न/), दालों, फलों और सब्जियों के उपभोग को सुदृढ़ करना।
- उदाहरण: ‘पोषण अभियान’ विविधीकृत और पोषण-संवेदी खाद्य प्रथाओं को बढ़ावा देता है।
निष्कर्ष
भारत में में तीव्र हो रहे पोषणीय परिवर्तन की स्थिति, कुपोषण और गैर-संचारी रोगों जैसी समानांतर चुनौतियों से निपटने के लिए कृषि क्षेत्र, स्वास्थ्य सेवाओं और विज्ञान-आधारित नवाचारों के एकीकरण की आवश्यकता को रेखांकित करती है। इस दिशा में बायो-फोर्टिफिकेशन और ‘सेहत’ (SEHAT) जैसी पहलें पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ कर सकती हैं, सार्वजनिक स्वास्थ्य के परिणामों में सुधार ला सकती हैं, तथा एक स्वस्थ ‘विकसित भारत’ के विजन को साकार करने में संबल प्रदान कर सकती हैं।