Q. सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की ब्रिटिश नीतियों की सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा देने में भूमिका पर चर्चा कीजिए, जिसके कारण अंततः भारत का विभाजन हुआ। (10 अंक, 150 शब्द)

November 14, 2025

GS Paper IModern History

प्रश्न की मुख्य माँग

  • सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की ब्रिटिश नीतियों के संचालन के तरीके
  • सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा देने में इन नीतियों की भूमिका

उत्तर

ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों ने भारत की विविध जनसंख्या को शासित करने के लिए सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की अवधारणा को प्रस्तुत किया। प्रारम्भ में इसे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के उपाय के रूप में दिखाया गया, परंतु धीरे-धीरे इन नीतियों ने धार्मिक और सामाजिक पहचान को राजनीति में संस्थागत रूप दे दिया।

ब्रिटिश सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की नीतियाँ कैसे कार्य करती थीं

  • पृथक निर्वाचक मंडल:  मॉर्ले–मिंटो सुधार (वर्ष 1909) के तहत मुसलमानों को अलग निर्वाचक मंडल दिया गया, जिससे वे अपने प्रतिनिधि स्वयं चुन सकें।
  • मॉन्टेग्यू–चेम्सफोर्ड सुधार (वर्ष 1919) के तहत विस्तार:  यह व्यवस्था सिखों, भारतीय ईसाइयों और एंग्लो-इंडियन्स तक बढ़ाई गई। इससे यह विचार सामान्य हो गया कि प्रत्येक समुदाय को अपना अलग राजनीतिक प्रतिनिधित्व चाहिए, जिससे राष्ट्रीय एकता की अवधारणा कमजोर हुई।
    • उदाहरण: समुदायों ने साझा हितों की बजाय अपनी पृथक पहचान के आधार पर राजनीतिक माँगें उठानी प्रारंभ कर दीं।
  • सांप्रदायिक पुरस्कार 1932: दलितों और अन्य अल्पसंख्यकों को अलग निर्वाचक मंडल दिया गया। इससे सांप्रदायिकता का सिद्धांत धर्म से आगे बढ़कर जाति तक फैल गया और विखंडन और बढ़ा
  • अलग-अलग समुदायों से पृथक वार्ता:  ब्रिटिश अक्सर एकीकृत राष्ट्रीय मंच की जगह धार्मिक समुदायों से अलग-अलग बातचीत करते थे। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि प्रत्येक समुदाय के राजनीतिक हित अलग और असंगत हैं।
    • उदाहरण: वर्ष 1940 के दशक में मुस्लिम लीग को मुसलमानों का प्रतिनिधि मानकर मान्यता दी गई, जिससे कांग्रेस का “सभी भारतीयों का प्रतिनिधित्व” करने का दावा कमजोर पड़ा।

इन नीतियों ने सांप्रदायिक विभाजन को कैसे बढ़ावा दिया

  • राजनीतिक विखंडन को प्रोत्साहन: इन नीतियों ने भारतीय राजनीति को सांप्रदायिक आधार पर बाँट दिया। इससे समुदायों के बीच संयुक्त राजनीतिक कार्रवाई कठिन हो गई और प्रत्येक समूह ने राष्ट्रीय उद्देश्यों की बजाय अपने सामुदायिक हितों को प्राथमिकता दी।
  • एकीकृत राष्ट्रवाद को कमजोर किया: समुदाय आधारित प्रतिनिधित्व ने कांग्रेस के समावेशी भारतीय पहचान के दृष्टिकोण का विरोध किया। राजनीति में धार्मिक पहचान का बढ़ता प्रभाव धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी आंदोलन को कमजोर करता गया।
  • द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को वैधता दी: अलग निर्वाचक मंडल ने यह विचार मजबूत किया कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं। यही आगे चलकर मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की माँग का वैचारिक आधार बना।
  • उदाहरण: वर्ष 1946 के चुनाव, जो अलग निर्वाचक मंडल के तहत हुए, में मुस्लिम लीग को मुस्लिम मतदाताओं का भारी समर्थन मिला।
  • सांप्रदायिक तनावों को गहरा किया:  धार्मिक समुदायों को अलग-अलग राजनीतिक इकाइयों के रूप में मानकर ब्रिटिश शासन ने उनके बीच अविश्वास और प्रतिस्पर्धा को बढ़ाया। इससे सांप्रदायिक सीमाएँ कठोर बनीं और समझौते की संभावना कम हुई।
    • उदाहरण: प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस (वर्ष 1946) तथा अन्य दंगों के दौरान जो हिंसा हुई, वह इन गहरे विभाजनों का परिणाम थी।

निष्कर्ष

अलग निर्वाचक मंडलों और सांप्रदायिक पुरस्कार जैसी ब्रिटिश नीतियों ने धार्मिक एवं जातीय समूहों को अलग राजनीतिक समुदाय मानकर राजनीतिक विभाजन को संस्थागत रूप दिया। यद्यपि राष्ट्रवादी नेताओं ने निरंतर ऐसे विभाजन का विरोध कर एकीकृत राष्ट्रीय पहचान को बढ़ावा देने का प्रयास किया, परंतु इन नीतियों के दीर्घकालिक प्रभावों ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को गहराया, जिसने अंततः वर्ष 1947 में भारत के विभाजन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

Discuss the role of British policies of communal representation in fostering communal divisions that ultimately led to the Partition of India. in hindi

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