Q. पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने के पीछे के सामाजिक-आर्थिक कारणों पर चर्चा कीजिए। कौन सी एकीकृत रणनीतियाँ उत्तरी भारत में कृषि आवश्यकताओं और वायु गुणवत्ता प्रबंधन के बीच सामंजस्य स्थापित कर सकती हैं? (10 अंक, 150 शब्द)

October 11, 2025

GS Paper IIIIndian Economy

प्रश्न की मुख्य माँग

  • पराली जलाने के पीछे सामाजिक-आर्थिक कारण।
  • कृषि आवश्यकताओं और वायु गुणवत्ता में सामंजस्य स्थापित करने के लिए एकीकृत रणनीतियाँ।

उत्तर

पंजाब और हरियाणा में पराली जलाना वर्तमान में एक गंभीर पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संकट बन चुका है, जो दिल्ली में शीतकाल के दौरान प्रदूषण के लिए PM2.5 जिम्मेदार है जो कुल प्रदूषण का लगभग 50% हिस्सा गठित करता है (SAFAR, 2023)। कानूनी प्रतिबंधों के बावजूद यह समस्या इसलिए बनी हुई है क्योंकि इसके पीछे कृषि संरचना, नीतिगत विकृतियाँ और किसानों की आजीविका से जुड़ी व्यावहारिक चुनौतियाँ गहराई से जुड़ी हैं।

पराली जलाने के सामाजिक–आर्थिक कारण

  • नीतिगत विकृतियों के कारण सीमित बुवाई अंतराल: ‘पंजाब उप-जल संरक्षण अधिनियम, 2009’ के तहत धान की रोपाई देर से करने का निर्देश दिया गया ताकि भूजल का संरक्षण हो सके। इससे धान कटाई और गेहूँ बुवाई के बीच केवल 10–20 दिनों का अंतराल रह जाता है, जिससे किसानों के पास फसल अवशेष प्रबंधन का समय नहीं बचता है।
  • अवशेष प्रबंधन की उच्च लागत:  पराली हटाने या बेलिंग की मशीनरी महंगी है जो मध्यम स्तरीय कृषकों की पहुँच से दूर है।
    • उदाहरण: हैप्पी सीडर का किराया ₹2,000–₹3,000 प्रति एकड़ है, जो छोटे किसानों के लिए बिना निरंतर सब्सिडी के वहन करना कठिन है।
  • धान की पराली का कम आर्थिक मूल्य:  गैर-बासमती धान की पराली में सिलिका की मात्रा अधिक होती है, जिससे यह पशु चारे या जैव ईंधन के रूप में अनुपयोगी होती है।
    • उदाहरण: पूर्वी भारत के विपरीत, पंजाब की पराली का पशु-चारे के रूप में सीमित उपयोग है, जिससे किसानों को इसका बाजार मूल्य नहीं मिलता है।
  • कृषि जोत का विखंडन और श्रम की कमी:  औसतन 3  हेक्टेयर से कम भूमि वाले किसानों के पास पर्याप्त संसाधन नहीं होते हैं और ग्रामीण पलायन के कारण श्रमिकों की कमी रहती है।
  • खरीदी तंत्र का अभाव:  कागज मिलों और बायोमास संयंत्रों से पराली की निरंतर माँग न होने के कारण किसान इसे इकट्ठा नहीं करते हैं।
    • उदाहरण: NTPC बायोमास को-फायरिंग पहल (2020) आपूर्ति शृंखला की बाधाओं के कारण सीमित स्तर पर ही सफल रही है।
  • सामाजिक और व्यावहारिक कारण:  पराली जलाना किसानों में तेज और पारंपरिक समाधान के रूप में देखा जाता है। कानूनी प्रवर्तन कमजोर है और फसल कटाई के मौसम में राजनीतिक दबाव के कारण कार्रवाई सीमित रहती है।
    • उदाहरण: वर्ष 2023 में पंजाब में 60,000  से अधिक घटनाएँ दर्ज की गईं, जबकि जुर्माना और ड्रोन निगरानी दोनों लागू थे।

कृषि आवश्यकताओं और वायु गुणवत्ता में संतुलन हेतु एकीकृत रणनीतियाँ

  • फसल विविधीकरण और MSP सुधार:  धान क्षेत्र को घटाने के लिए दालों, मक्का और तिलहन फसलों को निश्चित खरीद तथा बीमा के माध्यम से प्रोत्साहन देना चाहिए।
    • उदाहरण: हरियाणा की ‘भावांतर भरपाई योजना’ किसानों को विविधीकृत फसलों पर मूल्य अंतर की भरपाई करती है।
  • यंत्रीकरण और साझा अवसंरचना:  हैप्पी सीडर, सुपर-स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम और बेलर मशीनों की सब्सिडी आधारित उपलब्धता हेतु कस्टम हायरिंग सेंटरों का विस्तार किया जाना चाहिए।
    • उदाहरण: केंद्रीय फसल अवशेष प्रबंधन योजना (2023) के तहत 1.3  लाख से अधिक मशीनें पंजाब और हरियाणा में वितरित की गईं।
  • बायोमास उपयोग हेतु मूल्य शृंखला विकास:  पराली को बायोएनर्जी, एथेनॉल, पेपर और पैकेजिंग उद्योगों के लिए कच्चे माल के रूप में उपयोग में लाया जाए।
    • उदाहरण: IOCL की पानीपत बायो-रिफाइनरी प्रतिवर्ष 2 लाख  टन पराली से एथेनॉल उत्पादन करती है।
  • कृषि-पर्यावरणीय शेड्यूलिंग और परिशुद्ध कृषि:  लघु-अवधि वाली धान किस्में और लचीली फसल अवधि को अपनाकर बुवाई के बीच का अंतर बढ़ाया जा सकता है।
    • उदाहरण: PR 126 और DRR धान 44 किस्में 10-12 दिन कम समय में तैयार होती हैं।
  • व्यावहारिक परिवर्तन और सामुदायिक प्रोत्साहन:  ग्राम-स्तरीय पुरस्कार, जन-जागरूकता और साझा उत्तरदायित्व के माध्यम से किसानों को पराली न जलाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
    • उदाहरण: पुसा डीकंपोजर पहल के तहत दिल्ली और पंजाब सरकारों ने ‘जीरो-बर्न विलेज’ को पुरस्कृत किया।

निष्कर्ष

पराली जलाने की समस्या का समाधान केवल प्रतिबंधों से नहीं, बल्कि किसानों के कल्याण और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच संतुलन से संभव है। फसल विविधीकरण, यंत्रीकरण समर्थन और पराली के मूल्य-शृंखला विकास के माध्यम से ऐसा मॉडल बनाया जा सकता है, जिसमें स्वच्छ वायु और सुरक्षित कृषि आजीविका दोनों सुनिश्चित हों, यही मॉडल भारत की टिकाऊ कृषि नीति का मार्गदर्शक सिद्धांत होना चाहिए।

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