Q.
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया है कि उसका संवैधानिक कर्तव्य है कि वह सुनिश्चित करे कि केवल नागरिकों को ही मतदाता के रूप में पंजीकृत किया जाए और किसी भी विदेशी को शामिल न किया जाए। ECI के संवैधानिक दायित्वों और चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ चुनावी निष्पक्षता बनाए रखने के कर्तव्य में संतुलन स्थापित करने में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
January 8, 2026
GS Paper IIIndian Polity
प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत निर्वाचन आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारियाँ।
- अखंडता बनाए रखने बनाम अधिकारों की रक्षा करने में चुनौतियाँ।
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उत्तर
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के पास यह संवैधानिक अधिदेश है कि वह यह सुनिश्चित करे कि केवल नागरिकों को ही मतदाता के रूप में नामांकित किया जाए जैसा कि उसने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट में दोहराया है। वर्तमान में जारी विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) मतदाता सूची को सत्यापित करने के लिए एक महत्वपूर्ण अभ्यास है, जो यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी विदेशी को मतदाता सूची में शामिल नहीं किया जाए और साथ ही प्रत्येक वैध भारतीय नागरिक के मतदान अधिकारों की रक्षा की जाए।
भारत निर्वाचन आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारियाँ
- अधीक्षण और नियंत्रण: अनुच्छेद 324 के तहत, निर्वाचन आयोग को संसद और राज्य विधानसभाओं के सभी चुनावों के लिए मतदाता सूची की तैयारी के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति प्राप्त है।
- सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार सुनिश्चित करना: अनुच्छेद 326 को क्रियान्वित करने की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग की है, यह अनुच्छेद यह गारंटी देता है कि प्रत्येक नागरिक जो अन्यथा अयोग्य नहीं है, उसे मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का अधिकार है।
- उदाहरण: मतदाता सेवा पोर्टल जैसी पहलों के माध्यम से, निर्वाचन आयोग नागरिक भागीदारी को अधिकतम करने के लिए पंजीकरण प्रक्रिया को सरल बनाता है।
- पात्रता का निर्णय: निर्वाचन आयोग लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 द्वारा निर्देशित, मतदाता सूची में शामिल होने के लिए व्यक्तियों की पात्रता निर्धारित करने के लिए प्राथमिक प्राधिकारी के रूप में कार्य करता है।
- चुनावी अखंडता बनाए रखना: यह पहचान संबंधी धोखाधड़ी और बूथ कैप्चरिंग को रोकने के लिए संदिग्ध मतदाताओं और मृत प्रविष्टियों को हटाने के लिए समय-समय पर संशोधन के लिए जिम्मेदार है।
- उदाहरण: निर्वाचन आयोग द्वारा आधार-मतदाता पहचान पत्र लिंकिंग (स्वैच्छिक) के उपयोग का उद्देश्य डेटाबेस से डुप्लिकेट और गैर-नागरिक प्रविष्टियों को समाप्त करना है।
अखंडता बनाए रखने बनाम अधिकारों की रक्षा करने में चुनौतियाँ
- दस्तावेजी बाधाएँ: सीमावर्ती क्षेत्रों में कई वैध नागरिकों के पास “अचूक” विरासती दस्तावेजों का अभाव है, जिसके कारण गहन परिमार्जन अभियान के दौरान उनका आकस्मिक बहिष्कार हो जाता है।
- ‘संदेह की संरचना’: गहन पुनरीक्षण कभी-कभी ऐसा माहौल बना सकते हैं जहाँ सबूत का बोझ पूरी तरह से कमजोर आबादी पर स्थानांतरित कर दिया जाता है, जो संभावित रूप से ‘समावेश की भावना’ का उल्लंघन करता है।
- सत्यापन में देरी: ‘संदिग्ध’ मामलों के लिए आवश्यक मैन्युअल सत्यापन अक्सर लंबे समय तक लंबित रहता है, जिसके दौरान नागरिक वोट देने के अपने प्राथमिक लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित हो जाते हैं।
- डिजिटल विभाजन अक्षमताएँ: हालाँकि निर्वाचन आयोग डिजिटल पुनरीक्षण की ओर बढ़ रहा है, ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट साक्षरता की कमी कई लोगों को अपने बहिष्कार का विरोध करने या अपने रिकॉर्ड को अद्यतन करने से रोकती है।
निष्कर्ष
निर्वाचन आयोग को मात्र एक प्रहरी से अधिकारों के सुविधा प्रदाता के रूप में विकसित होना चाहिए। भविष्य की ओर उन्मुख होते हुए इसमें स्थानीयकृत, सहानुभूतिपूर्ण पहुँच के साथ डिजिटल उपकरणों को एकीकृत करते हुए “मानव-केंद्रित” सत्यापन मॉडल को अपनाना शामिल होना चाहिए। यह सुनिश्चित करके कि “विशेष गहन पुनरीक्षण” पारदर्शी है और अपील के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करता है, निर्वाचन आयोग भारत के विविध नागरिकों के मौलिक अधिकारों से समझौता किए बिना विदेशी-मुक्त मतदाता सूची बनाए रखने के अपने संवैधानिक अधिदेश को पूरा कर सकता है।