Q. ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों पर चर्चा कीजिए। भारत को जैव विविधता संरक्षण और रणनीतिक अवसंरचना विकास के बीच संतुलन कैसे स्थापित करना चाहिए? (10 अंक, 150 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों की चर्चा कीजिए।
  • जैव-विविधता संरक्षण और सामरिक अवसंरचना के बीच संतुलन का उल्लेख कीजिए।

उत्तर

प्रस्तावित ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना भारत की सबसे महत्त्वाकांक्षी सामरिक अवसंरचना पहलों में से एक है। किंतु एक नाजुक द्वीपीय पारिस्थितिकी तंत्र में स्थित होने के कारण यह जैव-विविधता ह्रास, जनजातीय अधिकारों तथा दीर्घकालिक पारिस्थितिकीय स्थिरता से संबंधित गंभीर चिंताएँ उत्पन्न करती है। अतः सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं और संरक्षण के मध्य सावधानीपूर्वक संतुलन स्थापित करना अनिवार्य है।

ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव

  • वृहद स्तर पर वनों की कटाई: लगभग 130 वर्ग किमी. के अछूते उष्णकटिबंधीय वन क्षेत्र में करीब 9 लाख पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है, जिससे आवास विनाश की अपूरणीय क्षति हो सकती है।
    • उदाहरण: ग्रेट निकोबार की विशिष्ट एवं स्थानिक वनस्पतियों और जीव-जंतुओं का संभावित विलोपन संभव है।
  • समुद्री जैव-विविधता पर खतरा: बंदरगाह निर्माण और तटीय अवसंरचना विकास से प्रवाल भित्तियों तथा नाजुक समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को क्षति पहुँच सकती है।
    • उदाहरण: निकोबार तटों पर लेदर बैक कछुओं के अंडे देने वाले स्थलों में व्यवधान।
  • जनजातीय पारिस्थितिकी पर प्रभाव: वन क्षेत्र के विचलन से स्वदेशी समुदायों की पारंपरिक, आवास-आधारित जीवन शैली प्रभावित हो सकती है।
    • उदाहरण:  शोंपेन (Shompen) और निकोबारी (Nicobarese) समुदायों की आजीविका पर भूमि विचलन को लेकर चिंताएँ।
  • द्वीपीय पारिस्थितिकी तंत्र की संवेदनशील: द्वीपों की पुनर्जीवन क्षमता सीमित होती है तथा वे जलवायु और मानवीय दबावों के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं।
    • उदाहरण: अस्थिर खनन के कारण बनाबा (Banaba) द्वीप का ऐतिहासिक विनाश।
  • स्वतंत्र मूल्यांकन की कमजोरी: कार्यपालिका-आधारित आकलन पर अत्यधिक निर्भरता से संचयी पर्यावरणीय लागतों की अनदेखी का जोखिम रहता है।

जैव-विविधता संरक्षण और सामरिक अवसंरचना के बीच संतुलन

  • कठोर एवं स्वतंत्र पर्यावरणीय मूल्यांकन: केवल औपचारिक अनुपालन तक सीमित न रहकर पारदर्शी और विज्ञान-आधारित आकलन सुनिश्चित किया जाए।
    • उदाहरण: समुद्री जीवविज्ञानियों और जनजातीय विशेषज्ञों को शामिल करते हुए बहु-विषयी समीक्षा पैनल का गठन।
  • चरणबद्ध और न्यूनतम विकास मॉडल: आवश्यकता-आधारित तथा संतुलित अवसंरचना विस्तार के माध्यम से पारिस्थितिकी पदचिह्न को सीमित किया जाए।
  • जनजातीय सहमति तंत्र का सुदृढ़ीकरण: वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत स्वतंत्र, पूर्व एवं अग्रिम सहमति सुनिश्चित की जाए।
    • उदाहरण: ग्राम सभा की स्वीकृतियों का स्वतंत्र सत्यापन।
  • समुद्री और तटीय संरक्षण क्षेत्र: महत्त्वपूर्ण घोंसला बनाने वाले और प्रवाल स्थलों के आसपास विकास निषेध क्षेत्र स्थापित करें।
    • उदाहरण: लेदरबैक कछुओं के आवास हेतु समर्पित संरक्षण क्षेत्र।
  • अंतर-पीढ़ीगत न्याय के सिद्धांत का अंगीकरण: परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल वर्तमान सामरिक लाभ के आधार पर नहीं, बल्कि दीर्घकालिक पारिस्थितिकीय लागतों को ध्यान में रखकर किया जाए।

निष्कर्ष

सामरिक अवसंरचना भारत की समुद्री सुरक्षा और आर्थिक आकांक्षाओं के लिए अत्यंत आवश्यक है। तथापि, ग्रेट निकोबार जैसे पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में विकास को विवेक, पारदर्शिता और अंतर-पीढ़ीगत उत्तरदायित्व के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए। संतुलित दृष्टिकोण प्रगति के निषेध में नहीं, बल्कि उसे पारिस्थितिकी बुद्धिमत्ता और संस्थागत जवाबदेही के माध्यम से नियंत्रित एवं परिष्कृत रूप में आगे बढ़ाने में निहित है।

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