प्रश्न की मुख्य माँग
- स्वर्ण मुद्रीकरण योजना (GMS) की सफलता में बाधा उत्पन्न करने वाली प्रमुख चुनौतियाँ।
- वित्तीय आत्मनिर्भरता के लिए एक मजबूत, विश्वास-आधारित पारिस्थितिकी तंत्र बनाने के उपाय।
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उत्तर
भारत विश्व के सबसे बड़े निजी स्वर्ण धारक देशों में से एक है, फिर भी एक अनुमान है कि 25,000 टन से अधिक सोना अब भी घरों और धार्मिक प्रतिष्ठानों में निष्क्रिय पड़ा हुआ है। इस सोने को सक्रिय वित्तीय परिसंपत्ति में परिवर्तित करना वित्तीय आत्मनिर्भरता के लिए आवश्यक है ताकि आयात पर निर्भरता घटाई जा सके, घरेलू भंडार मजबूत हों और बाहरी आर्थिक झटकों तथा मुद्रा अस्थिरता से सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम (GMS) की सफलता में प्रमुख चुनौतियाँ
- जनविश्वास की कमी और भावनात्मक लगाव: भारत में सोने को एक भावनात्मक और सामाजिक सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है, न कि वित्तीय निवेश के रूप में।
- उदाहरण: ग्रामीण परिवार स्वामित्व खोने या शुद्धता कम होने के डर से बैंक में जमा करने के बजाय घर पर सोना रखना पसंद करते हैं।
- संग्रह और परीक्षण अवसंरचना की कमी: कलेक्शन और प्योरिटी टेस्टिंग सेंटर्स (CPTCs) की संख्या सीमित है, जिससे भागीदारी असुविधाजनक हो जाती है।
- उदाहरण: टियर-II और टियर-III शहरों में प्रमाणित परीक्षण केंद्रों की अनुपस्थिति
जमाकर्ताओं को हतोत्साहित करती है।
- जटिल प्रक्रियाएँ और प्रशासनिक बिलंब: लंबी दस्तावेजी प्रक्रिया, मूल्यांकन में देरी, और रिडेम्प्शन की जटिलता आम जनता को भाग लेने से रोकती है।
- उदाहरण: शुरुआती योजनाओं में लंबे लॉक-इन पीरियड्स और कई संस्थानों के शारीरिक दौरे आवश्यक थे।
- संस्थागत भागीदारी और जनजागरूकता की कमी: बैंकों की रुचि सीमित है क्योंकि लाभांश कम हैं, और जनता योजना के फायदों से अनभिज्ञ है।
- उदाहरण: वर्ष 2023 तक केवल 25 टन से कम सोना ही जुटाया जा सका, जो अपेक्षाओं से बहुत कम है।
- बाजार अस्थिरता और कम रिटर्न: GMS जमा पर ब्याज दर (2–2.5%) आकर्षक नहीं है, जबकि सोने की कीमत में वृद्धि अधिक लाभदायक है।
- उदाहरण: निवेशक गोल्ड ETF या सिक्के रखना पसंद करते हैं बजाय GMS में जमा करने के।
वित्तीय आत्मनिर्भरता के लिए भरोसेमंद और सुदृढ़ पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण
- पारदर्शिता और बीमा के माध्यम से विश्वास बढ़ाना: सोने की शुद्धता और मात्रा पर सरकारी बीमा लागू करना।
- उदाहरण: जैसे बैंकों में जमा बीमा होता है, वैसे ही गोल्ड डिपॉजिट बीमा मनोवैज्ञानिक झिझक कम कर सकता है।
- स्वर्ण अवसंरचना का विस्तार और डिजिटलीकरण: अधिक CPTCs स्थापित करना और ब्लॉकचेन तकनीक का प्रयोग कर पारदर्शिता सुनिश्चित करना।
- उदाहरण: दुबई गोल्ड सूक (Dubai Gold Souk) की तरह ब्लॉकचेन आधारित रजिस्ट्र्री ट्रेसबिलिटी और प्रामाणिकता सुनिश्चित करती है।
- वित्तीय साक्षरता और सामुदायिक भागीदारी बढ़ाना: स्वयं सहायता समूह (SHGs), मंदिरों और सहकारी संस्थाओं के माध्यम से जन-जागरूकता अभियान चलाना और सामाजिक विश्वास से योजना को जोड़ना।
- उदाहरण: केरल के मंदिरों की स्वर्ण जमा योजनाओं में स्थानीय विश्वास के कारण बेहतर भागीदारी देखी गई है।
- डिजिटल वित्तीय तंत्र से एकीकरण: ई-गोल्ड, डिजिटल रुपया और फिनटेक ऐप्स के साथ
GMS को जोड़ना ताकि भागीदारी सहज हो सके।
- उदाहरण: RBI के डिजिटल गोल्ड बॉण्ड्स को GMS खातों में परिवर्तनीय बनाया जा सकता है, जिससे तरलता बढ़ेगी।
- राजकोषीय प्रोत्साहन और लचीली योजनाएँ: कर छूट, कम लॉक-इन अवधि और लचीले रिडेम्प्शन विकल्प प्रदान करें।
- उदाहरण: जापान का “गोल्ड सेविंग्स अकाउंट” मॉडल ब्याज अर्जित करते हुए तरलता भी बनाए रखता है।
निष्कर्ष
भारत के निष्क्रिय स्वर्ण भंडार को सक्रिय करने के लिए देश को अनुपालन-आधारित मॉडल से
विश्वास-आधारित (Confidence-Based) मॉडल की ओर बढ़ना होगा। पारदर्शिता, प्रोत्साहन और डिजिटल एकीकरण के माध्यम से गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम (GMS) को वित्तीय आत्मनिर्भरता का प्रमुख स्तंभ बनाया जा सकता है, जो न केवल सोने के आयात को घटाएगा, बल्कि राष्ट्रीय भंडार को सुदृढ़ करेगा और घरेलू भावनाओं को आर्थिक शक्ति में परिवर्तित करेगा।