प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत-यूरोपीय संघ FTA की मुख्य विशेषताएँ
- भारत के लिए रणनीतिक अवसर
- भारत के लिए रणनीतिक चुनौतियाँ।
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उत्तर
27 जनवरी, 2026 को संपन्न हुआ भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता (FTA), 19 वर्ष के गतिरोध के अंत का प्रतीक है। अक्सर “सभी सौदों की जननी” कहा जाने वाला यह समझौता, एक नियम-आधारित, बहुध्रुवीय व्यापार व्यवस्था की ओर एक रणनीतिक परिवर्तन का संकेत देता है। यह एक परिपक्व और व्यावहारिक दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसमें बढ़ते वैश्विक संरक्षणवाद के बीच आपसी आर्थिक लचीलेपन को मजबूत करने के लिए दोनों पक्ष वैचारिक कठोरता से आगे बढ़ चुके हैं।
भारत-यूरोपीय संघ FTA की मुख्य विशेषताएँ
यह समझौता दुनिया की लगभग एक-चौथाई आबादी और वैश्विक जीडीपी के 25% को कवर करता है।
- असममित टैरिफ उदारीकरण : यूरोपीय संघ, भारतीय निर्यात मूल्य के 99.5% पर टैरिफ (शुल्क) समाप्त करेगा, जबकि भारत 10 वर्ष की अवधि में यूरोपीय संघ के निर्यात के 97.5% पर रियायतें प्रदान करेगा।
- “ऑटो-वाइन” समझौता: भारत लग्जरी कारों (2,50,000 यूनिट कोटा के भीतर 110% से 10%) और वाइन (शुरुआत में 150% से 75%) पर शुल्क में भारी कटौती करेगा। यह प्रीमियम सेगमेंट को विदेशी व्यापार के लिए खोलते हुए घरेलू आम-बाजार उद्योगों की सुरक्षा करता है।
- सेवाएँ और गतिशीलता : यूरोपीय संघ ने भारत के लिए 144 सेवा उप-क्षेत्रों (IT/ITeS और पेशेवर सेवाओं सहित) को खोल दिया है। इसके साथ ही, चुनिंदा कार्यक्रमों में भारतीय छात्रों के लिए “अनकैप्ड मोबिलिटी” (असीमित आवाजाही) का ढाँचा भी तैयार किया गया है।
- संवेदनशील क्षेत्र सुरक्षा उपाय: भारत ने छोटे किसानों की आजीविका की रक्षा के लिए डेयरी, अनाज और पोल्ट्री को पूर्ण टैरिफ उन्मूलन से सफलतापूर्वक बाहर रखा है।
भारत के लिए रणनीतिक अवसर
- भू-राजनीतिक बचाव : यह एफटीए (FTA) अमेरिका के बढ़ते व्यापार संरक्षणवाद (जैसे 50% अमेरिकी टैरिफ) के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण संतुलन (Counterweight) के रूप में कार्य करता है और चीनी बाजार का एक स्थिर विकल्प प्रदान करता है।
- वैश्विक मूल्य शृंखला (GVC) एकीकरण: कपड़ा, चमड़ा और रत्न व आभूषण (जिन पर वर्तमान में 12-17% शुल्क है) के लिए शून्य-शुल्क पहुँच भारतीय MSMEs को यूरोप के लिए पसंदीदा आपूर्तिकर्ताओं के रूप में अपनी क्षमता बढ़ाने की अनुमति देती है।
- प्रौद्योगिकी और हरित ऊर्जा: यह समझौता हाई-टेक यूरोपीय इनपुट्स तक पहुँच को सुविधाजनक बनाता है, जो ग्रीन हाइड्रोजन और उन्नत सेमीकंडक्टर निर्माण की दिशा में भारत के परिवर्तन में सहायता करता है।
- उदाहरण: व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद (TTC) का संरेखण भारत को सर्वोत्तम श्रेणी की पर्यावरण तकनीकों को प्राप्त करने में मदद करता है।
भारत के लिए रणनीतिक चुनौतियाँ
- सीबीएएम बाधा: भारत कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) से छूट हासिल करने में विफल रहा। यह भारतीय स्टील और एल्यूमीनियम पर एक “ग्रीन टैरिफ” के रूप में कार्य करेगा।
- उदाहरण: भारतीय निर्यातकों को वर्ष 2026 से अधिक कार्बन उत्सर्जन वाले निर्यात के लिए भारी अनुपालन लागत का सामना करना पड़ेगा।
- व्यापार और सतत् विकास (TSD): इसमें कानूनी रूप से बाध्यकारी श्रम और पर्यावरणीय मानकों को शामिल किया गया है, जिनका भारत पारंपरिक रूप से विरोध करता रहा है। यह “संप्रभु विनियमन” के लिए घरेलू नीति के दायरे को सीमित करता है।
- कार्यान्वयन में देरी : समझौते का 27 भाषाओं में अनुवाद किया जाना और सभी यूरोपीय संघ के सदस्य देशों द्वारा इसका अनुसमर्थन किया जाना आवश्यक है। इससे देरी होने का जोखिम है, जिससे तत्काल लाभ बाधित हो सकते हैं।
आगे की राह
- घरेलू सुधारों में तेजी लाना: भारत को वियतनाम जैसे देशों के साथ प्रतिस्पर्द्धा करने के लिए ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ (व्यापार करने में आसानी) और लॉजिस्टिक्स में सुधार करना चाहिए, जो पहले से ही यूरोपीय संघ एफटीए (EU FTA) के लाभ उठा रहे हैं।
- कार्बन-मूल्य निर्धारण में सामंजस्य: एक घरेलू कार्बन बाजार स्थापित करना, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भारतीय कंपनियों द्वारा भुगतान किया गया कर भारत के भीतर ही रहे, न कि यूरोपीय संघ द्वारा CBAM शुल्क के रूप में वसूला जाए।
- सामाजिक सुरक्षा समझौते (SSAs): भारतीय आईटी (IT) पेशेवरों द्वारा “दोहरे सामाजिक सुरक्षा” (Double social security) योगदान को रोकने के लिए, यूरोपीय संघ के अलग-अलग देशों के साथ द्विपक्षीय सामाजिक सुरक्षा समझौतों (SSAs) के लिए जोर देना।
निष्कर्ष
भारत-यूरोपीय संघ एफटीए, आदर्शवादी कूटनीति की जीत कम और अनिश्चित वैश्विक व्यवस्था की प्रतिक्रिया अधिक है। जिन सीमाओं के साथ बढ़ने के लिए भारत तैयार है, उनका संकेत देकर उसने 75 अरब डॉलर का निर्यात इंजन हासिल कर लिया है। भले ही सीबीएएम (CBAM) और टीएसडी (TSD) अध्याय चुनौतियाँ दर्शाते हैं, लेकिन यह सौदा एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक कवच प्रदान करता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि भारत की 10 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की राह यूरोप के साथ एक विविध और भरोसेमंद साझेदारी पर टिकी रहे।