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Q. संसद की कार्यप्रणाली भारत के लोकतंत्र की गुणवत्ता के लिए केंद्रीय है। विधायी जाँच और बहस की गुणवत्ता के संदर्भ में, हाल के दिनों में संसदीय कामकाज की प्रभावशीलता को प्रभावित करने वाले प्रमुख मुद्दों पर चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

December 22, 2025

GS Paper IIIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग

  • विधायी जाँच से संबंधित  मुद्दे
  • बहस की गुणवत्ता में मुद्दे।

उत्तर

संसद भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है, जो जन-प्रतिनिधित्व, कार्यपालिका की जवाबदेही तथा विचार-विमर्श आधारित विधि-निर्माण के सर्वोच्च मंच के रूप में कार्य करती है। इसकी प्रभावशीलता शासन की वैधता को सीधे प्रभावित करती है और कठोर बहस एवं सूक्ष्म जाँच के माध्यम से विविध मतों को राष्ट्रीय नीति-ढाँचे में समाहित करना सुनिश्चित करती है।

विधायी जाँच में समस्याएँ

  • समिति संदर्भों में गिरावट: विधेयकों को विभागीय रूप से संबंधित स्थायी समितियों को भेजने में उल्लेखनीय कमी आई है, जबकि ये समितियाँ तकनीकी विशेषज्ञता और द्विदलीय जाँच प्रदान करती हैं।

Parliamentary Functioning

  • विधेयकों का जल्दबाजी में पारित होना: प्रमुख विधानों को प्रस्तुति के कुछ ही दिनों या मिनटों में पारित कर दिया जाता है, जिससे जटिल प्रावधानों की विस्तृत जाँच का अवसर नहीं मिल पाता।
    • उदाहरण: वाणिज्य पोत परिवहन विधेयक, 2024 को लोकसभा में मात्र 20 मिनट और राज्यसभा में 10 मिनट में पारित कर दिया गया।

Parliamentary Functioning

  • द्वितीय सदन की उपेक्षा: “धन विधेयक” के रूप में विधेयकों का बार-बार उपयोग कार्यपालिका को महत्त्वपूर्ण नीतिगत विषयों पर राज्यसभा की संशोधन शक्ति से बचने की अनुमति देता है।
    • उदाहरण: संवैधानिक विशेषज्ञों द्वारा रेखांकित प्रवृत्ति के अनुसार, कई महत्त्वपूर्ण कानूनों को ऊपरी सदन की जाँच से बचाने हेतु धन विधेयक के रूप में अधिनियमित किया जाता है।
  • कार्यपालिका का प्रभुत्व (अध्यादेश): अनुच्छेद-123 के तहत अध्यादेश पर बार-बार निर्भरता संसद के सामने एक यथास्थिति या “जबरन” कानून पेश करके विधायिका की भूमिका को कमजोर करती है।

बहस की गुणवत्ता में समस्याएँ

  • बार-बार व्यवधान/स्थगन: नीतिगत बहसों का स्थान नारेबाजी और विरोध प्रदर्शनों ने ले लिया है, जिससे विधायी समय की भारी बर्बादी और समग्र उत्पादकता में कमी आती है।
    • उदाहरण: वर्ष 2024 के मानसून सत्र के दौरान, बार-बार स्थगन के कारण लोकसभा अपने निर्धारित समय का केवल 29% ही कार्य कर सकी।
  • प्रश्नकाल का क्षरण: कार्यपालिका की प्रत्यक्ष जवाबदेही का यह प्रमुख साधन अक्सर व्यवधानों का पहला शिकार बनता है, जिससे “तारांकित प्रश्न” मौखिक उत्तरों से वंचित रह जाते हैं।
    • उदाहरण: 18वीं लोकसभा के प्रारंभिक सत्रों में, निचले सदन में केवल 8% तारांकित प्रश्नों के मौखिक उत्तर दिए गए।
  • दल-बदल विरोधी कानून की बाधाएँ: दसवीं अनुसूची सांसदों को स्वतंत्र विवेक के बजाय दलगत “व्हिप” को प्राथमिकता देने के लिए बाध्य करती है, जिससे आंतरिक विविध बहसें और व्यक्तिगत अंत:करण दब जाते हैं।
  • विमर्श के स्थान पर ध्रुवीकरण: संसदीय सत्र राष्ट्रीय मुद्दों पर साझा सहमति बढ़ाने के बजाय राजनीतिक और सामुदायिक ध्रुवीकरण को तीव्र कर रहे हैं।

निष्कर्ष

संसदीय कार्यप्रणाली में संरचनात्मक गिरावट तात्कालिक सुधारों की माँग करती है, जिनमें अनिवार्य समिति संदर्भ और बैठकों का निश्चित कैलेंडर शामिल हैं। “सहमति की संस्कृति” को पुनर्स्थापित करना और पीठासीन अधिकारियों की तटस्थता सुनिश्चित करना आवश्यक है।

The functioning of Parliament is central to the quality of India’s democracy. Discuss the key issues affecting the effectiveness of parliamentary functioning in recent times, with reference to legislative scrutiny and quality of debate. in hindi

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