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Q. हिमाचल प्रदेश विधानसभा द्वारा महिलाओं के लिए विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ाकर 21 वर्ष करने के विधेयक के मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों पर कानूनी और सामाजिक प्रभाव पर चर्चा कीजिये। (15 अंक, 250 शब्द)

August 30, 2024

GS Paper II
प्रश्न की मुख्य माँग

  • महिलाओं के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष करने संबंधी हिमाचल प्रदेश विधानसभा के विधेयक के मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों पर विधिक प्रभाव पर चर्चा कीजिए।
  • महिलाओं के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष करने संबंधी हिमाचल प्रदेश विधानसभा के विधेयक के मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों पर सामाजिक प्रभाव पर चर्चा कीजिए।

 

उत्तर:

हाल ही में हिमाचल प्रदेश विधानसभा द्वारा महिलाओं के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष से बढ़ाकर 21 वर्ष करने संबंधी विधेयक लैंगिक समानता को बढ़ावा देने और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण विधायी परिवर्तन को दर्शाता है। यह कदम पारंपरिक मानदंडों को चुनौती देने और महिलाओं को सशक्त बनाने के भारत के व्यापक प्रयासों के अनुरूप है, परंतु यह समुदायों में मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों पर इसके प्रभाव के बारे में भी सवाल उठाता है।

महिलाओं के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष करने का कानूनी प्रभाव

सकारात्मक कानूनी प्रभाव नकारात्मक कानूनी प्रभाव
 

1. लैंगिक समानता को मजबूत करता है: महिलाओं के लिए विवाह की आयु को पुरुषों के समान करके, यह विधेयक लैंगिक समानता को बढ़ावा देता है और महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन संबंधी कन्वेंशन (Convention on the Elimination of All Forms of Discrimination against Women- CEDAW) के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का समर्थन करता है ।

 

2. बाल विवाह में कमी: विवाह की आयु 21 वर्ष करने से बाल विवाह को रोकने में मदद मिलती है, तथा यह सुनिश्चित होता है, कि महिलाओं को अपनी शिक्षा पूरी करने और आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने का अवसर मिले।

उदाहरण के लिए: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के अनुसार, जिन राज्यों में विवाह संबंधी कानून सख्त हैं, वहाँ बाल विवाह की दर में कमी देखी गई है।

 

3. राष्ट्रीय कानूनों के साथ सामंजस्य: यह विधेयक बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 जैसे राष्ट्रीय प्रयासों के अनुरूप है, जो पूरे भारत में कानूनी मानकों में एकरूपता उत्पन्न करता है।

उदाहरण के लिए: यह कदम महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा महिलाओं के लिए विवाह की आयु पर गठित टास्क फोर्स की सिफारिशों का पूरक है ।

4. महिला अधिकारों की रक्षा: विवाह की आयु बढ़ाना अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप है और इससे युवा महिलाओं को समय से पहले गर्भधारण और स्वास्थ्य जोखिमों से बचाने में मदद मिलती है।

उदाहरण के लिए: विश्व स्वास्थ्य संगठन मातृ मृत्यु दर को कम करने और महिलाओं के स्वास्थ्य परिणामों में सुधार के लिए विवाह में देरी को महत्वपूर्ण मानता है।

 

5. सुधारों के लिए कानूनी मिसाल: विवाह की आयु 21 वर्ष निर्धारित करना अन्य राज्यों के लिए कानूनी मिसाल बन सकता है और संभावित रूप से राष्ट्रीय नीति को प्रभावित कर सकता है।

 

1. व्यक्तिगत कानूनों के साथ संघर्ष: यह विधेयक विभिन्न समुदायों पर लागू व्यक्तिगत कानूनों, जैसे मुस्लिम पर्सनल लॉ, के साथ असंगत हो सकता है, जिसमें विवाह योग्य आयु  निर्धारित की गई है।

 

 

 

2. कानूनी जटिलता और प्रवर्तन: विधेयक, प्रवर्तन के लिए कानूनी जटिलताओं को प्रस्तुत करता है, क्योंकि विवाह की आयु विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के तहत एक मानदंड है, जिससे भ्रम और संभावित कानूनी चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।

 

 

 

3. संवैधानिक चुनौतियाँ: इस विधेयक को धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वायत्तता के आधार पर संवैधानिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, विशेषकर यदि इसे व्यक्तिगत कानूनी अधिकारों का उल्लंघन करने वाला माना जाए।

उदाहरण के लिए: विभिन्न धर्मों में विवाह की आयु को मानकीकृत करने के पिछले प्रयासों को अनुच्छेद 25 और 26 के उल्लंघन का हवाला देते हुए न्यायलयों में चुनौती दी गई है।

4. कानूनी खामियों की संभावना: विधेयक में कानूनी खामियाँ उत्पन्न हो सकती हैं, जहाँ पक्षकार व्यक्तिगत कानूनों के तहत या अन्य अधिकार क्षेत्रों में विवाह करके राज्य के कानूनों को दरकिनार कर सकते हैं।

 

 

 

5. समुदायों से प्रतिरोध: इस विधेयक को उन समुदायों से प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है जो इसे सांस्कृतिक प्रथाओं और परंपराओं पर थोपने के रूप में देखते हैं।

 

महिलाओं के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष करने का सामाजिक प्रभाव

सकारात्मक सामाजिक प्रभाव नकारात्मक सामाजिक प्रभाव
1. महिलाओं को सशक्त बनाना: विवाह की आयु बढ़ाने से महिलाओं को शिक्षा और कैरियर के अवसरों को आगे बढ़ाने के लिए अधिक समय मिलता है, जिससे आर्थिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत विकास को बढ़ावा मिलता है।

उदाहरण के लिए: जिन राज्यों में विवाह की आयु अधिक है, वहाँ महिला साक्षरता दर और रोजगार के अवसरों में सुधार हुआ है।

 

2. स्वास्थ्य जोखिम कम होता है: विवाह में देरी करने से महिलाओं में समय से पहले गर्भधारण की संभावना कम हो जाती है, जिससे मातृ एवं शिशु मृत्यु दर कम हो जाती है।

उदाहरण के लिए: NFHS-5 के आँकड़े केरल जैसे राज्यों में विवाह की उच्च आयु और मातृ एवं शिशु मृत्यु दर की कम दर के बीच संबंध दर्शाते हैं ।

 

3. सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देना: यह विधेयक शिक्षा और महिला अधिकारों के महत्त्व के बारे में जागरूकता को प्रोत्साहित करता है तथा समाज में प्रगतिशील दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है।

उदाहरण के लिए: बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसे जन जागरूकता अभियान लड़कियों की शिक्षा और सशक्तिकरण के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण को बदलने में सहायक रहे हैं।

 

4. सामाजिक सुधारों का समर्थन: विवाह की आयु बढ़ाना, व्यापक सामाजिक सुधारों के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य लैंगिक असमानता को कम करना और महिलाओं की स्वायत्तता को बढ़ावा देना है।

उदाहरण के लिए: घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 जैसे विधायी सुधारों का उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना है, जो इस विधेयक के उद्देश्यों के समान है।

 

5. दीर्घकालिक विकास को बढ़ावा: विवाह में देरी करने से जीवन साथी के संबंध में अधिक जानकारीपूर्ण निर्णय लेने में मदद मिलती है, जिससे परिवार स्थिर होता है और सामाजिक प्रगति होती है ।

1. अपंजीकृत विवाहों में वृद्धि की संभावना: यदि दंपति, कानूनी प्रावधानों के बजाय पारंपरिक या धार्मिक रीति-रिवाजों के तहत विवाह करने का निर्णय लेते हैं, तो अपंजीकृत विवाहों में वृद्धि हो सकती है।

उदाहरण के लिए: जिन क्षेत्रों में सामाजिक मानदंड बाल विवाह के पक्ष में हैं, वहाँ समुदाय नए कानून के तहत औपचारिक पंजीकरण का विरोध कर सकते हैं।

 

2. सामाजिक प्रतिक्रिया: इस कानून को रूढ़िवादी समाजों में प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है, जहाँ कम उम्र में विवाह की प्रथा है, जिससे संभावित सामाजिक प्रतिक्रिया और सामुदायिक अशांति उत्पन्न हो सकती है।

उदाहरण के लिए: कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में, पारंपरिक प्रथाएँ नए कानूनी ढाँचे के साथ टकराव उत्पन्न कर सकती हैं, जिससे सामाजिक टकराव की स्थिति बन सकती  है।

3. गुप्त प्रथाओं में वृद्धि: नई आयु प्रतिबंधों को दरकिनार करने के लिए गुप्त प्रथाओं, जैसे कि उम्र में हेराफेरी करना या गुप्त रूप से विवाह की व्यवस्था करना, का खतरा है।

 

 

 

 

4. पारिवारिक गतिशीलता पर दबाव: विवाह की आयु में परिवर्तन से पारंपरिक पारिवारिक गतिशीलता और अपेक्षाओं पर दबाव उत्पन्न हो  सकता है, जिससे अंतर-पीढ़ीगत संघर्ष हो सकता है ।

उदाहरण के लिए: कम उम्र में विवाह को बढ़ावा देने वाले परिवारों को नए मानदंडों के अनुकूल ढलने में कठिनाई हो सकती है, जिससे समुदाय में विवाद और गलतफहमियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

 

5. सामाजिक मानदंडों में संभावित व्यवधान: कानूनी विवाह की आयु में अचानक परिवर्तन से मौजूदा सामाजिक मानदंड बाधित हो सकते हैं, जिससे कुछ जनसांख्यिकीय समूहों में भ्रम और असंतोष उत्पन्न हो सकता है।

 

भविष्य की ओर देखते हुए, हिमाचल प्रदेश में महिलाओं के लिए विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ाकर 21 वर्ष करना, लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक प्रगतिशील कदम है। हालाँकि, यह मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों और सामाजिक मानदंडों के साथ सामंजस्य स्थापित करने में चुनौतियाँ भी प्रस्तुत करता है। इस परिवर्तनकारी बदलाव के प्रभावी कार्यान्वयन और व्यापक स्वीकृति को सुनिश्चित करने के लिए कानूनी ढाँचे और सामाजिक संवेदनशीलता पर विचार करते हुए एक संतुलित दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है।

 

Discuss the legal and social impact of the Himachal Pradesh Assembly’s bill to raise the minimum marriage age for women to 21 years on existing personal laws.  in hindi

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