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Q. भारत की बढ़ती देखभाल अर्थव्यवस्था प्रशिक्षित देखभालकर्ताओं की बढ़ती माँग और आशा कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं जैसी अनौपचारिक महिला कार्यकर्ताओं पर निरंतर निर्भरता दोनों को उजागर करती है। इन अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए और भारत में स्वास्थ्य सेवा अर्थव्यवस्था को औपचारिक रूप से मान्यता देने और मजबूत करने की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

March 9, 2026

GS Paper IIndian Society

प्रश्न की मुख्य माँग

  • अग्रिम पंक्ति के देखभाल कर्मियों द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।
  • इन चुनौतियों के कारणों का उल्लेख कीजिए।
  • देखभाल अर्थव्यवस्था को औपचारिक रूप से मान्यता देने और सुदृढ़ करने की आवश्यकता को चिह्नित कीजिए।

उत्तर

भारत की विस्तृत होती देखभाल अर्थव्यवस्था में अग्रिम पंक्ति के कर्मियों, जैसे आशा कार्यक्रम की कार्यकर्ता और आंगनवाड़ी सेवाओं के कर्मचारी, की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। स्वास्थ्य, पोषण और बाल देखभाल जैसी आवश्यक सेवाएँ प्रदान करने के बावजूद, इनमें से कई को अभी भी “स्वयंसेवक” के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, जिससे श्रम अधिकारों, लैंगिक समानता और भारत की कल्याणकारी सेवा वितरण प्रणाली की स्थिरता को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं। 

मुख्य भाग

अग्रिम पंक्ति के देखभाल कर्मियों द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियाँ

  • कम और अनियमित मानदेय: अधिकांश कर्मियों को नियमित वेतन के स्थान पर सीमित मानदेय मिलता है, जिससे उनकी आय असुरक्षित रहती है।
    • उदाहरण: आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को औपचारिक वेतन के बजाय छोटा मानदेय दिया जाता है।
  • औपचारिक रोजगार लाभों का अभाव: इन कर्मियों को मातृत्व लाभ, सवेतन अवकाश या पेंशन सुरक्षा जैसी रोजगार संबंधी सुरक्षा प्राप्त नहीं होती।
    • उदाहरण: अनेक कार्यकर्ता सीमित समर्थन के लिए केवल आयुष्मान भारत और प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन जैसी योजनाओं पर निर्भर रहते हैं।
  • नौकरी की सुरक्षा और अनुबंध का अभाव: स्थायी सार्वजनिक कार्य करने के बावजूद इन्हें “स्वयंसेवक” के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
    • उदाहरण: कल्याणकारी कार्यक्रमों में 50 लाख से अधिक महिलाएँ बिना औपचारिक रोजगार अनुबंध के कार्य कर रही हैं।
  • अधिक कार्यभार और अनेक जिम्मेदारियाँ: इन कर्मियों को मातृ स्वास्थ्य निगरानी, पोषण निगरानी और सामुदायिक जागरूकता जैसे कई कार्य करने पड़ते हैं।
  • नीतिगत और निर्णय-निर्माण प्रक्रियाओं में सीमित आवाज: अग्रिम पंक्ति के कर्मियों का उन नीतिगत चर्चाओं में बहुत कम प्रतिनिधित्व होता है, जो उनके कार्य से संबंधित होती हैं।

इन चुनौतियों के कारण

  • देखभाल कार्य के प्रति लैंगिक धारणा: देखभाल से जुड़े कार्यों को अक्सर महिलाओं की घरेलू भूमिका का स्वाभाविक विस्तार माना जाता है, न कि एक कुशल श्रम के रूप में।
  • कल्याणकारी सेवाओं के वितरण में संरचनात्मक अनौपचारिकता: सरकारी कल्याणकारी कार्यक्रम वित्तीय दायित्वों को कम करने के लिए अनौपचारिक कार्यबल पर निर्भर रहते हैं।
    • उदाहरण: राज्य इन कर्मियों को औपचारिक रोजगार लागत से बचने के लिए “मानद कार्यकर्ता” के रूप में वर्गीकृत करता है।
  • देखभाल दंड और लैंगिक असमानता: महिलाएँ अनुपातहीन रूप से अवैतनिक और कम वेतन वाले देखभाल कार्यों का भार वहन करती हैं।
    • उदाहरण: वर्ष 2024 के समय उपयोग सर्वेक्षण के अनुसार, महिलाएँ प्रतिदिन लगभग 140 मिनट देखभाल कार्यों में व्यतीत करती हैं, जबकि पुरुष लगभग 74 मिनट।
  • राज्यों के बीच खंडित नीतिगत प्रतिक्रियाएँ: विभिन्न राज्यों में मानदेय वृद्धि जैसी नीतियाँ व्यापक रूप से भिन्न होती हैं।
  • कौशल कार्यक्रमों में संस्थागत एकीकरण का अभाव: नई देखभाल संबंधी पहलों में अक्सर मौजूदा कार्यबल को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया जाता है।
    • उदाहरण: केंद्रीय बजट 2026–27 में प्रस्तावित राष्ट्रीय कौशल योग्यता रूपरेखा के प्रशिक्षण कार्यक्रम में वर्तमान आशा या आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का स्पष्ट एकीकरण नहीं दिखाई देता।

देखभाल अर्थव्यवस्था को औपचारिक रूप से मान्यता देने और सुदृढ़ करने की आवश्यकता

  • श्रम अधिकारों और उचित वेतन की सुनिश्चितता: औपचारिक मान्यता मिलने से वेतन, रोजगार अनुबंध और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
    • उदाहरण: वर्ष 2025 में धरम सिंह एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में न्यायालय ने कहा कि निरंतर संस्थागत कार्य को अनिश्चित काल तक अस्थायी नहीं माना जा सकता है।
  • सार्वजनिक कल्याण सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार: बेहतर कार्य परिस्थितियाँ स्वास्थ्य, पोषण और बाल देखभाल सेवाओं के वितरण की दक्षता को बढ़ा सकती हैं।
  • श्रम बाजार में लैंगिक असमानता को कम करना: औपचारिकता से रोजगार और वेतन में लैंगिक अंतर को कम करने में सहायता मिल सकती है।
  • कौशल विकास के माध्यम से देखभाल कार्यबल को सुदृढ़ करना: नए कर्मियों की नियुक्ति के बजाय मौजूदा कार्यबल को कौशल प्रशिक्षण देकर सशक्त किया जा सकता है।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय कौशल योग्यता रूपरेखा से संबद्ध प्रशिक्षण कार्यक्रमों को आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं तक विस्तारित करने से उनकी पेशेवर स्थिति मजबूत हो सकती है।
  • सतत् देखभाल अर्थव्यवस्था का निर्माण: औपचारिक मान्यता कल्याणकारी सेवा वितरण प्रणालियों की निरंतरता और स्थिरता सुनिश्चित करती है।
    • उदाहरण: अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने सम्मानजनक देखभाल कार्य के लिए 5R रूपरेखा को बढ़ावा दिया है, जिसमें पारिश्रमिक और प्रतिनिधित्व पर विशेष बल दिया गया है।

निष्कर्ष

सशक्त देखभाल अर्थव्यवस्था के लिए भारत की आकांक्षाओं को पूरा करने हेतु अग्रिम पंक्ति के कर्मियों को स्वयंसेवक के बजाय कुशल पेशेवरों के रूप में मान्यता देना आवश्यक है। औपचारिक रोजगार स्थिति, उचित वेतन, कौशल विकास और नीतिगत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना कल्याणकारी सेवाओं की प्रभावशीलता को सुदृढ़ करने के साथ-साथ लैंगिक समानता को आगे बढ़ाने और भविष्य के लिए एक सतत् तथा समावेशी देखभाल अवसंरचना के निर्माण में महत्त्वपूर्ण होगा। 

India’s expanding care economy highlights both the growing demand for trained caregivers and the continued reliance on informal women workers such as ASHAs and Anganwadi workers. Examine the challenges faced by these frontline care workers and discuss the need to formally recognise and strengthen the care economy in India. in hindi

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