Q. जहाँ एक ओर 'वंदे मातरम' ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध एक सशक्त युद्धघोष के रूप में कार्य करता था, वहीं इसे राष्ट्रगान के रूप में अपनाने में राष्ट्रवाद और धार्मिक संवेदनशीलता के बीच एक संवेदनशील संतुलन बनाए रखना आवश्यक था। स्वदेशी आंदोलन में इस गीत की भूमिका पर चर्चा कीजिए और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा वर्ष 1937 में पारित प्रस्ताव के पीछे के तर्क का विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • स्वदेशी आंदोलन में भूमिका।
  • कांग्रेस के वर्ष 1937 के प्रस्ताव के पीछे का तर्क।

उत्तर

वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इसके जटिल ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत पर नई बहस उभरकर सामने आई है। यह गीत स्वदेशी आंदोलन का केंद्रीय प्रेरक था, परंतु विविधतापूर्ण समाज में इसके उपयोग में संवेदनशीलता आवश्यक थी। वर्ष 1937 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) प्रस्ताव से स्पष्ट होता है कि राष्ट्रवाद को भावनात्मक आकर्षण और समावेशिता—दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना पड़ा।

स्वदेशी आंदोलन में भूमिका

  • एकता का प्रतीक: यह गीत औपनिवेशिक विरोध प्रदर्शनों के दौरान विविध क्षेत्रों और समुदायों को भावनात्मक रूप से जोड़ने वाला साझा गीत बन गया।
    • उदाहरण: हिंदू और मुस्लिम—दोनों समुदाय एक साथ “वंदे मातरम्” का उद्घोष करते हुए आगे बढ़ते थे।
  • सांस्कृतिक पुनर्जागरण: इस गीत ने भारत को मातृभूमि के रूप में चित्रित करके सांस्कृतिक गौरव को पुनर्जीवित किया, ब्रिटिश आख्यानों का खंडन किया और राष्ट्रवादी पहचान को मजबूत किया।
  • जन-एकत्रीकरण: इसकी लयात्मक और भावनात्मक ध्वनि ने सभाओं, जुलूसों तथा बहिष्कार आंदोलनों को ऊर्जा प्रदान की, जिससे बड़े पैमाने पर जनसहभागिता सुनिश्चित हुई।
  • विस्तृत स्वीकृति: आरंभिक दौर में यह गीत विभिन्न समुदायों में व्यापक रूप से स्वीकार किया गया, जिससे आंदोलन का सामाजिक आधार विस्तृत हुआ।
  • प्रेरणादायक शक्ति: इसके भावनात्मक प्रभाव ने त्याग और साहस को प्रेरित किया, दमन के समय भी मनोबल बनाए रखा और सामूहिक संकल्प को मजबूत किया।

वर्ष 1937 के कांग्रेस प्रस्ताव के पीछे का तर्क

  • धार्मिक संवेदनशीलता: गीत के बाद के अंतरों में विशिष्ट धार्मिक प्रतीक मौजूद थे, जो कुछ समूहों को दूर कर सकते थे। इसलिए कांग्रेस ने केवल पहले दो अंतरों को अपनाया।
  • एकता की रक्षा:  कांग्रेस का उद्देश्य साझा राजनीतिक मंच को मजबूत बनाए रखना था तथा किसी भी ऐसे प्रतीक से बचना था जो हिंदू-मुस्लिम एकजुटता को प्रभावित कर सके।
  • तनाव की रोकथाम: पूरे गीत पर जोर देने से उस समय की संवेदनशील परिस्थिति में साम्प्रदायिक तनाव बढ़ सकता था, जिससे स्वतंत्रता संघर्ष की व्यापक एकता कमजोर पड़ती।
  • समावेशी राष्ट्रवाद: केवल गैर-विवादित भाग को स्वीकार कर कांग्रेस ने ऐसा राष्ट्रवाद प्रस्तुत किया जो सांस्कृतिक गौरव पर आधारित था, पर धार्मिक विशिष्टता पर नहीं।
  • व्यावहारिक दृष्टिकोण: यह प्रस्ताव एक व्यावहारिक और रणनीतिक संतुलन का उदाहरण था, जिसमें देशभक्ति की भावना को व्यापक जनाधार बनाए रखने की आवश्यकता से जोड़कर देखा गया।

निष्कर्ष

वंदे मातरम् का इतिहास दिखाता है, कि सशक्त सांस्कृतिक प्रतीक एकता को प्रेरित कर सकते हैं, पर बहुल समाज में उनके उपयोग में संवेदनशीलता अनिवार्य होती है। वर्ष 1937 में कांग्रेस द्वारा इसके उपयोग को सीमित करने का निर्णय समावेशी राष्ट्रवाद के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का प्रतीक था। आज भी इस सामंजस्य की भावना को बनाए रखना भारत के सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने को सुदृढ़ करने के लिए आवश्यक है।

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