प्रश्न की मुख्य माँग
- उद्देश्यपरक व्याख्या की आवश्यकता का उल्लेख कीजिए।
- न्यायिक लंबित मामलों के प्रभावों की चर्चा कीजिए।
- आगे की राह सुझाइए।
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उत्तर
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अंतर्गत “एसिड अटैक पीड़ित” की परिभाषा का विस्तार यह दर्शाता है कि कल्याणकारी कानूनों की व्याख्या केवल शब्दों तक सीमित न रहकर उद्देश्यपरक दृष्टिकोण से की जानी चाहिए, ताकि समान परिस्थितियों वाले सभी पीड़ितों को गरिमा, समानता और समयबद्ध न्याय सुनिश्चित किया जा सके।
उद्देश्यपरक व्याख्या की आवश्यकता
- समावेशी परिभाषा: कल्याणकारी कानूनों का उद्देश्य केवल बाहरी रूप से विकृत पीड़ितों तक सीमित न होकर, समान प्रकार की दिव्यांगता से पीड़ित सभी व्यक्तियों की सुरक्षा करना होना चाहिए।
- उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अंतर्गत जबरन एसिड पिलाए जाने से आंतरिक चोट झेलने वाले पीड़ितों को भी शामिल किया।
- अनुच्छेद-14 के अंतर्गत समानता: हमले की विधि (एसिड फेंकना/एसिड पिलाना) के आधार पर वर्गीकरण मनमाना है और समान संरक्षण के अधिकार का उल्लंघन करता है।
- गरिमा की सुरक्षा: दिव्यांगता की मान्यता, गरिमापूर्ण जीवन, उचित चिकित्सा सुविधा तथा पुनर्वास के लिए अनुच्छेद-21 के अंतर्गत आवश्यक है।
- उदाहरण: प्रमाण-पत्र के अभाव में अनेक पीड़ितों को मुआवजा, पुनर्वास योजनाएँ और चिकित्सीय सहायता नहीं मिल पाई।
- आपराधिक एवं कल्याणकारी कानूनों में सामंजस्य: कल्याणकारी कानूनों की व्याख्या आपराधिक कानूनों के अनुरूप होनी चाहिए, जहाँ एसिड हमले के दोनों रूपों को समान माना गया है।
- उदाहरण: भारतीय न्याय संहिता, 2024 की धारा 124 दोनों अपराधों के लिए समान दंड का प्रावधान करती है।
- हितकारी व्याख्या: सामाजिक कल्याण संबंधी कानूनों की व्याख्या उदारतापूर्वक की जानी चाहिए, ताकि न्याय को बढ़ावा मिले और अन्याय को रोका जा सके।
न्यायिक लंबित मामलों का प्रभाव
- मुकदमों में विलंब: लंबित मामलों के कारण दंड देने में देरी होती है, जिससे एसिड हमलों के विरुद्ध निवारक प्रभाव कमजोर पड़ता है।
- उदाहरण: वर्ष 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने एसिड हमले के मामलों में विलंबित सुनवाई को “न्याय व्यवस्था का उपहास” बताया।
- मुआवजा मिलने में देरी: लंबित मामलों के कारण पीड़ितों को मुआवजा, दिव्यांगता प्रमाण-पत्र और पुनर्वास सुविधाएँ प्राप्त करने में विलंब होता है।
- उदाहरण: अनेक पीड़ित प्रभावी सरकारी सहायता प्राप्त करने से पूर्व वर्षों तक कानूनी प्रक्रिया के समाप्त होने की प्रतीक्षा करते हैं।
- क्षेत्रीय असमानता: कुछ राज्यों में लंबित मामलों की अधिक संख्या के कारण न्याय तक पहुँच में असमानता उत्पन्न होती है।
- उदाहरण: उत्तर प्रदेश में 198, पश्चिम बंगाल में 160 तथा गुजरात में 114 मामले लंबित थे।
- मनोवैज्ञानिक बोझ: लंबी न्यायिक प्रक्रिया उन पीड़ितों के मानसिक आघात और सामाजिक असुरक्षा को बढ़ा देती है, जो पहले से ही आजीवन चोटों का सामना कर रहे होते हैं।
- उदाहरण: एसिड निगलने से आंतरिक चोट झेलने वाले पीड़ितों को निरंतर जठराँत्र चिकित्सा और बार-बार कानूनी अनुवर्ती प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
- कानून के प्रवर्तन में कमजोरी: धीमी न्यायिक प्रक्रिया कानून के भय को कम करती है और अपराधों की पुनरावृत्ति को बढ़ावा देती है।
आगे की राह
- स्पष्ट विधायी संशोधन: भविष्य में बहिष्करण और अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचने के लिए संसद को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम की परिभाषा में स्पष्ट संशोधन करना चाहिए।
- उदाहरण: याचिका में सुझाए अनुसार “एसिड फेंकना” के स्थान पर “एसिड का उपयोग” शब्द प्रयुक्त किया जाना चाहिए।
- त्वरित न्यायालयों की स्थापना: एसिड हमले के मामलों के लिए राज्यों में विशेष त्वरित न्यायालय (फास्ट ट्रैक कोर्ट) व्यवस्था स्थापित की जानी चाहिए।
- उदाहरण: इसी प्रकार की व्यवस्था पॉक्सो तथा यौन हिंसा से जुड़े मामलों में पहले से लागू है।
- कठोर दंड व्यवस्था: अधिक कठोर दंड की व्यवस्था से अपराधों के विरुद्ध निवारक प्रभाव बढ़ाया जा सकता है।
- एसिड विक्रेताओं की जवाबदेही: संक्षारक पदार्थों तक आसान पहुँच रोकने के लिए एसिड की बिक्री पर अधिक कठोर नियंत्रण आवश्यक है।
- उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय ने अवैध रूप से एसिड बेचने वालों को ऐसे अपराधों में सह-अभियुक्त बनाने का सुझाव दिया।
- दिव्यांगता मूल्यांकन में सुधार: दिव्यांगता मूल्यांकन दिशा-निर्देशों में आंतरिक चोटों और दीर्घकालिक अंग क्षति को भी शामिल किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: वर्तमान प्रमाणन व्यवस्था मुख्यतः बाहरी विकृति पर केंद्रित है, जिसके कारण पहले एसिड निगलने वाले पीड़ित बाहर रह जाते थे।
निष्कर्ष
उद्देश्यपरक व्याख्या कल्याणकारी कानूनों को केवल संकीर्ण शब्दों तक सीमित न रखकर उन्हें वास्तविक न्याय का माध्यम बनाती है। त्वरित सुनवाई तथा मजबूत संस्थागत समर्थन के साथ यह सुनिश्चित करती है कि एसिड हमले के पीड़ितों को केवल सहानुभूति ही नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन और अधिकारों का प्रभावी संरक्षण भी प्राप्त हो।