Q. भारत में दहेज अब केवल एक सामाजिक बुराई मात्र नहीं रह गया है, बल्कि यह हिंसा की एक ऐसी निरंतरता बन गया है जो 'नारी-हत्या' (femicide) के समान है। मौजूदा कानूनी ढाँचों के आलोक में इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए और इसे समाप्त करने के लिए एक व्यापक रणनीति सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)

May 29, 2026

GS Paper IISocial Justice

प्रश्न की मुख्य माँग

  • दहेज (Dowry) को हिंसा एवं नारी हत्या (Femicide) की निरंतर प्रक्रिया के रूप में स्पष्ट करना।
  • दहेज से संबंधित मौजूदा विधिक ढाँचों की प्रभावशीलता एवं सीमाओं का विश्लेषण करना।
  • दहेज उन्मूलन एवं महिलाओं के संरक्षण हेतु एक व्यापक रणनीति सुझाना।

उत्तर

परिचय

विधिक प्रतिबंधों के बावजूद भारत में दहेज (Dowry) लैंगिक हिंसा के एक संरचनात्मक एवं संस्थागत रूप के रूप में बना हुआ है। दबाव, उत्पीड़न एवं दहेज मृत्यु (Dowry Deaths) से लेकर स्त्रियों के विरुद्ध गंभीर अपराधों तक, यह पितृसत्तात्मक संरचना को प्रतिबिंबित करता है, जो महिलाओं का वस्तुकरण करती है, समानता को कमजोर करती है तथा बढ़ते हुए रूप में लैंगिक-आधारित नारी हत्या  (Gender-Based Femicide) का स्वरूप धारण कर रही है।

हिंसा एवं नारी हत्या  की निरंतर प्रक्रिया के रूप में दहेज

  • बलपूर्वक आर्थिक माँगें: दहेज की शुरुआत प्रायः “उपहारों” के रूप में होती है, जो धीरे-धीरे वधू पक्ष से जबरन आर्थिक संसाधनों की प्राप्ति का माध्यम बन जाती है।
    • उदाहरण: दहेज की माँगों को अक्सर विवाह एवं गृहस्थी की स्थापना हेतु वित्तीय सहायता के रूप में सामान्यीकृत कर दिया जाता है।
  • घरेलू उत्पीड़न: दहेज की माँग पूरी न होने पर विवाहोपरांत महिलाओं को मानसिक एवं शारीरिक क्रूरता का सामना करना पड़ता है।
    • उदाहरण: भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा-85 पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा की जाने वाली क्रूरता एवं उत्पीड़न को दंडनीय अपराध घोषित करती है।
  • दहेज मृत्यु: लगातार होने वाला उत्पीड़न अनेक मामलों में हत्या, आत्महत्या अथवा संदिग्ध मृत्यु का कारण बन जाता है।
    • उदाहरण: NCRB के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में भारत में 5,737 दहेज मृत्यु के मामले दर्ज किए गए, जो औसतन प्रतिदिन लगभग 16 मौतों के बराबर हैं।
  • संरचनात्मक पितृसत्ता: दहेज ऐसी पितृसत्तात्मक मान्यताओं को प्रतिबिंबित करता है, जिनमें महिलाओं को आर्थिक बोझ माना जाता है तथा विवाह को एक लेन-देन (Transactional Arrangement) के रूप में देखा जाता है।
  • नारी हत्या  का स्वरूप: दहेज हत्याएँ महिलाओं को विशेष रूप से लैंगिक एवं आर्थिक अपेक्षाओं के कारण निशाना बनाती हैं, जिससे वे नारी हत्या (Femicide) की श्रेणी में आती हैं।

मौजूदा विधिक ढाँचों की प्रभावशीलता एवं सीमाएँ

  • दहेज निषेध: दहेज निषेध अधिनियम, 1961 (Dowry Prohibition Act, 1961) दहेज देने एवं लेने दोनों को अपराध घोषित करता है।
  • दंडात्मक प्रावधान: दहेज मृत्यु एवं विवाहित महिलाओं के विरुद्ध क्रूरता से संबंधित विशिष्ट आपराधिक प्रावधान उपलब्ध हैं।
    • उदाहरण: भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा-80 दहेज मृत्यु के लिए दंड का प्रावधान करती है, जबकि धारा-85 क्रूरता एवं उत्पीड़न को संबोधित करती है।
  • कमज़ोर प्रवर्तन: सशक्त कानूनों के बावजूद कमजोर जाँच प्रक्रिया एवं न्याय में विलंब इनके निवारक प्रभाव को कम कर देते हैं।
    • उदाहरण: जिन मामलों में मुकदमे पूरे होते हैं, उनमें भी दोषसिद्धि  की दर लगभग 35% के आस-पास बनी रहती है।
  • सामाजिक दबाव: कलंक, भय एवं सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण पीड़िताएँ एवं उनके परिवार अक्सर शिकायत दर्ज कराने से बचते हैं।
    • उदाहरण: अनेक महिलाओं को कानूनी उपाय अपनाने के बजाय “समायोजन” एवं “समझौता” करने की सलाह दी जाती है।
  • संस्थागत कमियाँ: आश्रय गृहों, परामर्श सेवाओं एवं गवाह संरक्षण की सीमित उपलब्धता पीड़ित सहायता तंत्र को कमजोर बनाती है।
    • उदाहरण: NCRB एवं राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की रिपोर्टें बार-बार घरेलू हिंसा के मामलों में कम रिपोर्टिंग  एवं शिकायतों की वापसी की समस्या को रेखांकित करती हैं।

दहेज उन्मूलन एवं महिलाओं के संरक्षण हेतु व्यापक रणनीति

  • सामाजिक जागरूकता: व्यापक जन-जागरूकता अभियानों के माध्यम से दहेज को प्रतिष्ठा का प्रतीक नहीं, बल्कि एक अनैतिक सामाजिक प्रथा के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए।
    • उदाहरण: “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” अभियान में दहेज-विरोधी व्यवहारगत जागरूकता मॉड्यूल को शामिल किया जा सकता है।
  • महिला सशक्तीकरण: शिक्षा, रोजगार एवं संपत्ति अधिकार महिलाओं की निर्णय क्षमता एवं सौदेबाजी शक्ति को सुदृढ़ करते हैं।
  • त्वरित न्याय: फास्ट-ट्रैक न्यायालयों (Fast-Track Courts) एवं समयबद्ध जाँच प्रक्रियाओं के माध्यम से दोषसिद्धि दर एवं निवारक प्रभाव को बढ़ाया जा सकता है।
  • सहायता तंत्र: सुगम हेल्पलाइन, आश्रय गृह, परामर्श सेवाएँ एवं निःशुल्क विधिक सहायता (Legal Aid) के माध्यम से संवेदनशील एवं पीड़ित महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
    • उदाहरण: सखी योजना (Sakhi Scheme) के अंतर्गत संचालित वन स्टॉप सेंटर हिंसा से प्रभावित महिलाओं को समेकित सहायता प्रदान करते हैं।
  • सामुदायिक सहभागिता: परिवारों, धार्मिक नेताओं एवं स्थानीय संस्थाओं को दहेज प्रथा का सामाजिक बहिष्कार कर इसके विरुद्ध सामूहिक सामाजिक दबाव विकसित करना चाहिए।

निष्कर्ष 

दहेज प्रथा विधिक प्रतिबंधों के बावजूद इसलिए बनी हुई है क्योंकि पितृसत्तात्मक व्यवस्था महिलाओं पर आर्थिक नियंत्रण को सामान्य एवं स्वीकार्य बना देती है। इसके उन्मूलन के लिए केवल कठोर विधिक प्रवर्तन पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसे व्यापक सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता है जो गरिमा, समानता एवं साझेदारी को विवाह की वास्तविक आधारशिला के रूप में स्थापित करे।

Dowry in India is no longer just a social evil, but a continuum of violence that amounts to femicide. Critically analyse this statement in the light of existing legal frameworks and suggest a comprehensive strategy to eradicate it. in hindi

Need help preparing for UPSC or State PSCs?

Connect with our experts to get free counselling & start preparing

Aiming for UPSC?

Download Our App

      
Quick Revise Now !
AVAILABLE FOR DOWNLOAD SOON
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध
Quick Revise Now !
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.