प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत में वर्तमान अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय की अक्षमताएँ।
- उभरती हुई प्रौद्योगिकियों की ओर सब्सिडी का पुनर्निर्देशन।
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उत्तर
परिचय
भारत का अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर व्यय (लगभग 0.65% GDP) वैश्विक नवाचार अग्रणी देशों जैसे अमेरिका (3.5%) और दक्षिण कोरिया (4.9%) की तुलना में काफी कम है। राजकोषीय सीमाओं को देखते हुए, दक्षता में सुधार केवल व्यय वृद्धि से नहीं बल्कि मौजूदा सब्सिडी संसाधनों के रणनीतिक पुनर्निर्देशन के माध्यम से संभव है, विशेषकर उच्च गुणक प्रभाव वाली उभरती प्रौद्योगिकियों जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर और स्वच्छ ऊर्जा की ओर।
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वर्तमान में अनुसंधान एवं विकास (R&D) आवंटन में विद्यमान अक्षमताएँ
- सब्सिडी-प्रधान राजकोषीय संरचना: खाद्य, उर्वरक और कार्बन सब्सिडी पर लगभग ₹49 बिलियन वार्षिक व्यय अनुसंधान के लिए उपलब्ध राजकोषीय स्थान को सीमित करता है।
- उदाहरण: उर्वरक सब्सिडी में लगभग 11% CAGR की वृद्धि गहन-तकनीकी निवेश हेतु संसाधनों को सीमित करती है।
- विखंडित एवं निम्न-प्रभाव R&D पारिस्थितिकी तंत्र: सार्वजनिक अनुसंधान प्रणाली में उद्योग से कमजोर जुड़ाव के कारण व्यावसायीकरण की दर कम है।
- उदाहरण: रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) तथा वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) के अनुसंधान का स्केलेबल डिफेन्स-टेक स्टार्ट-अप्स में सीमित रूपांतरण।
- इनपुट-केंद्रित बनाम परिणाम-केंद्रित वित्तपोषण: वर्तमान प्रणाली संस्थानों पर अधिक केंद्रित है।
- उदाहरण: अकादमिक अनुदान अक्सर केवल प्रकाशन तक सीमित रहते हैं, जबकि प्रोटोटाइप डिप्लॉयमेंट तक विस्तार नहीं हो पाता है।
उभरती प्रौद्योगिकियों की ओर सब्सिडी का पुनर्निर्देशन
- “नवाचार सब्सिडी” की ओर पुनर्विनियोजन: सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के मात्र 0.06% (~$2 billion) का भी पुनर्निर्देशन शोध संस्थानों के लिए राष्ट्रीय एआई पहुँच सुनिश्चित कर सकता है।
- उदाहरण: IITs एवं IISc के लिए एआई टोकन सब्सिडी प्रदान कर बड़े पैमाने पर मॉडल प्रशिक्षण की सुविधा प्रदान करना।
- क्रॉस-सब्सिडाइजेशन मॉडल का उपयोग: निजी क्षेत्र के तकनीकी लाभों का उपयोग सार्वजनिक R&D पहुँच को वित्तपोषित करने में किया जा सकता है।
- उदाहरण: भुगतान आधारित एआई सेवाओं से प्राप्त राजस्व का उपयोग विश्वविद्यालयों को मुफ्त एआई पहुँच प्रदान हेतु करना।
- रणनीतिक तकनीकी क्लस्टरों में निवेश: सब्सिडी को उच्च प्रभाव वाले क्षेत्रों जैसे एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग, बायोटेक और सेमीकंडक्टर में केंद्रित किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन को चिप डिजाइन R&D प्रोत्साहनों के साथ संरेखित करना।
आगे की राह
- सार्वजनिक–निजी R&D अभिसरण: हाइपरस्केलर कंपनियों जैसे अमेजन वेब सर्विसेज (AWS), गूगल, माइक्रोसॉफ्ट के साथ साझेदारी कर कंप्यूटिंग एक्सेस को बढ़ावा दिया जाना चाहिए तथा बदले में नीति-प्रोत्साहन दिए जाएँ।
- उदाहरण: भूमि एवं ऊर्जा सब्सिडी के बदले क्लाउड-आधारित अनुसंधान अवसंरचना विकसित करना।
- मिशन-मोड R&D वित्तपोषण: विखंडित अनुदानों के स्थान पर स्पष्ट एवं मापनीय परिणामों वाले लक्षित मिशनों पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
- ओपन इनोवेशन एवं संप्रभु अवसंरचना: ओपन-सोर्स मॉडल्स को बढ़ावा देते हुए घरेलू होस्टिंग क्षमता विकसित की जाए।
- उदाहरण: Llama या Sarvam AI जैसे मॉडल्स को भारतीय सर्वरों पर होस्ट कर संप्रभु एआई अनुसंधान को सक्षम बनाना।
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निष्कर्ष
भारत के सीमित अनुसंधान एवं विकास (R&D) बजट के प्रभावी उपयोग हेतु एक संरचनात्मक परिवर्तन आवश्यक है, जिसमें उपभोग-आधारित सब्सिडी से हटकर ज्ञान एवं नवाचार-आधारित सब्सिडी की ओर अग्रसर हो सके। कल्याणकारी व्यय के एक छोटे हिस्से को भी उभरती प्रौद्योगिकियों की ओर पुनर्निर्देशित कर, तथा उसे निजी पूँजी और कंप्यूटिंग अवसंरचना के साथ समन्वित कर, भारत असमानुपातिक नवाचार लाभ प्राप्त कर सकता है और तेजी से एक डीप-टेक अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण कर सकता है।