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Q. निर्यात-आधारित अति-वैश्वीकरण का दौर अब समाप्त हो रहा है। हालिया भू-राजनीतिक बदलावों और चीन के साथ भारत के व्यापारिक समीकरणों के संदर्भ में, इस बात का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए कि क्या भारत को वर्ष 1991 की आर्थिक आम सहमति से आगे बढ़कर अपनी घरेलू औद्योगिक क्षमता को सुदृढ़ करना चाहिए। (15 अंक, 250 शब्द)

June 4, 2026

GS Paper IIEconomy

प्रश्न की मुख्य माँग

  • वर्ष 1991 की आर्थिक सहमति से आगे बढ़ते हुए घरेलू औद्योगिक क्षमता विकसित करने के पक्ष में तर्कों की चर्चा कीजिए।
  • 1991 की आर्थिक सहमति के मूल सिद्धांतों को बनाए रखने के पक्ष में तर्कों का विश्लेषण कीजिए।
  • घरेलू औद्योगिक क्षमता एवं वैश्विक एकीकरण के बीच संतुलित मॉडल की आवश्यकता तथा उसके लिए आवश्यक उपायों पर चर्चा कीजिए।

उत्तर

परिचय

वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों के तीन दशक बाद, बढ़ते भू-राजनीतिक विखंडन, आपूर्ति शृंखला व्यवधानों तथा चीनी औद्योगिक आयातों पर भारत की बढ़ती निर्भरता ने इस बहस को पुनः जीवित कर दिया है कि क्या केवल आर्थिक खुलापन पर्याप्त है, अथवा अब घरेलू औद्योगिक क्षमताओं  को गहराई से विकसित करना अनिवार्य हो गया है।

भारत को घरेलू औद्योगिक क्षमता विकसित करने के पक्ष में तर्क 

  • रणनीतिक लचीलापन: विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर अत्यधिक निर्भरता महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों को भू-राजनीतिक एवं आपूर्ति शृंखला संबंधी झटकों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
    • उदाहरण: चीन भारत की औद्योगिक वस्तुओं की आवश्यकताओं का 30% से अधिक हिस्सा पूरा करता है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी तथा रसायन शामिल हैं।
  • व्यापार असंतुलन में सुधार: मजबूत घरेलू विनिर्माण आयात-निर्भरता को कम कर सकता है तथा लगातार बने रहने वाले व्यापार घाटे को घटा सकता है।
    • उदाहरण: बढ़ते निर्यात के बावजूद वित्त वर्ष 2025-26 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा लगभग 112 अरब डॉलर तक पहुँच गया।
  • मूल्य संवर्धन: मध्यवर्ती वस्तुओं का घरेलू उत्पादन भारत के भीतर अधिक मूल्य संवर्द्धन सुनिश्चित करता है।
    • उदाहरण: इलेक्ट्रॉनिक्स एवं फार्मास्युटिकल निर्यात प्रायः चीन से आयातित पुर्जों एवं कच्चे माल पर निर्भर रहते हैं।
  • औद्योगिक सुरक्षा: महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में स्थानीय क्षमताओं का विकास आर्थिक संप्रभुता को सुदृढ़ करता है।
    • उदाहरण: आर्थिक सर्वेक्षण ने महत्त्वपूर्ण खनिजों तथा विनिर्माण आपूर्ति शृंखलाओं में चीन के प्रभुत्व को रेखांकित किया है।
  • रोजगार सृजन: विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार कृषि एवं सेवा क्षेत्र से परे बड़े पैमाने पर उत्पादक रोजगार सृजित करता है।
    • उदाहरण: उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ विनिर्माण निवेश एवं रोजगार सृजन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई हैं।

भारत को 1991 की आर्थिक सहमति का परित्याग नहीं करना चाहिए

  • निर्यात की अनिवार्यता: सतत् आर्थिक विकास के लिए संरक्षणवादी दृष्टिकोण के बजाय वैश्विक बाजारों के साथ एकीकरण आवश्यक है।
    • उदाहरण: वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों ने भारत को सेवाओं के एक प्रमुख निर्यातक तथा वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी उद्योगों वाले देश में परिवर्तित किया।
  • वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ: आधुनिक विनिर्माण वैश्विक मूल्य शृंखलाओं तथा आयातित मध्यवर्ती वस्तुओं पर निर्भर करता है।
  • लागत दक्षता: वैश्विक स्तर पर उपलब्ध कच्चे माल एवं इनपुट्स तक पहुँच उत्पादन लागत को कम करती है तथा प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाती है।
    • उदाहरण: उद्योग संगठनों ने निर्यात-उन्मुख उत्पादन में प्रयुक्त चीनी कच्चे माल तक आसान पहुँच की माँग की है।
  • निवेश प्रवाह: खुली व्यापार व्यवस्था विदेशी निवेश, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा नवाचार को आकर्षित करती है।
  • संतुलित दृष्टिकोण: पूर्ण आर्थिक पृथक्करण उन उद्योगों के लिए हानिकारक हो सकता है, जो आयातित कच्चे माल एवं मध्यवर्ती वस्तुओं पर निर्भर हैं।

आगे की राह

  • स्मार्ट औद्योगीकरण: व्यापक संरक्षणवाद अपनाए बिना रणनीतिक क्षेत्रों में घरेलू क्षमताओं का विकास किया जाए।
    • उदाहरण: उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, बैटरी तथा सौर विनिर्माण को बढ़ावा देने पर केंद्रित हैं।
  • आपूर्ति स्रोतों का विविधीकरण: महत्त्वपूर्ण कच्चे माल एवं इनपुट्स के लिए किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता को कम किया जाए।
  • प्रौद्योगिकी उन्नयन: नवाचार, अनुसंधान एवं विकास (R&D) तथा उन्नत विनिर्माण क्षमताओं पर विशेष ध्यान दिया जाए।
    • उदाहरण: भारत के सेमीकंडक्टर मिशन तथा इलेक्ट्रॉनिक्स मिशन तकनीकी गहराई को सुदृढ़ करने का लक्ष्य रखते हैं।
  • प्रतिस्पर्द्धी निर्यात: केवल आयात-प्रतिस्थापन पर निर्भर रहने के बजाय वैश्विक बाजारों से जुड़े विनिर्माण एवं निर्यात को प्रोत्साहित किया जाए।
  • रणनीतिक खुलापन: व्यापार के प्रति खुलापन बनाए रखते हुए महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में लक्षित औद्योगिक नीति अपनाई जाए।

निष्कर्ष

भारत का भविष्य एक वैश्विक रूप से एकीकृत तथा रणनीतिक रूप से लचीली अर्थव्यवस्था बनने में निहित है, जो खुले बाजारों, उन्नत प्रौद्योगिकी तथा मजबूत घरेलू विनिर्माण क्षमताओं का प्रभावी उपयोग करे। भारत का लक्ष्य वर्ष 2047 तक एक विश्वसनीय आपूर्ति शृंखला केंद्र, नवाचार केंद्र तथा औद्योगिक महाशक्ति के रूप में उभरना है।

The era of export-led hyper-globalisation is coming to an end. In light of recent geopolitical shifts and India’s trade dynamics with China, critically analyse whether India should move beyond the 1991 economic consensus and build domestic industrial depth. in hindi

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