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निबंध का प्रारूपप्रस्तावना – विषयवस्तु को समझना
नवाचार किस प्रकार सशक्तीकरण को प्रोत्साहन देता है
जब समावेशन प्रबल होगा: तब अंतराल कम होते जाते हैं
डिजिटल समावेशन में चुनौतियाँ और अंतराल
सरकारी पहलों की भूमिका
भारत की वैश्विक आकांक्षाएँ
नैतिक आयाम
भविष्य का रोडमैप: डिजिटल दशक को वास्तविक रूप में समावेशी बनाना
निष्कर्ष
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“डिजिटल दशक” भारत के डिजिटल परिवर्तन में 2020 के दशक को एक महत्वपूर्ण चरण के रूप में चिह्नित करता है, जहाँ प्रौद्योगिकी समावेशी विकास के लिए एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करती है। इंटरनेट पहुँच, डिजिटल सेवाओं और बुनियादी ढाँचे के तीव्र विस्तार के साथ, इसमें लोकतंत्र को सशक्त बनाने , सेवाओं का विकेंद्रीकरण करने और अवसरों का लोकतांत्रिक बनाने की क्षमता निहित है, जो न केवल प्रौद्योगिकी, बल्कि भारत के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने को भी प्रभावित करेगा।
जब इसे जिम्मेदारीपूर्वक अपनाया जाए तो डिजिटल नवाचार गहन और सतत् समावेशिता को प्रोत्साहित करता है, जिससे किसानों से लेकर जनजातीय महिलाओं तक अत्यंत वंचित वर्गों को भी आवश्यक सेवाएँ प्राप्त करने में सहायता मिलती है। फिनटेक, एड-टेक और ई-गवर्नेंस पारंपरिक भौगोलिक , जाति, वर्ग और लैंगिक संबंधी बाधाओं को समाप्त कर सकता हैं। हालाँकि, यह परिवर्तन सोचसमझकर किया जाना चाहिए, ताकि सभी के लिए समान पहुँच और डिजिटल साक्षरता सुनिश्चित हो सके।
आधार, यूपीआई और डिजिलॉकर जैसे प्लेटफॉर्म के साथ-साथ स्वास्थ्य, शिक्षा और वाणिज्य में तकनीक के माध्यम से भारत में हो रहा विकास एक नए आयाम स्थापित कर रहा है। दूरदर्शिता और न्याय के साथ, डिजिटल दशक प्रत्येक नागरिक को डिजिटल क्रांति में एक हितधारक बना सकता है, जिससे भारत सशक्त होगा और वैश्विक दक्षिण के लिए एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत होगा।
UPI, आधार-सक्षम भुगतान जैसे डिजिटल नवाचार और ONDC जैसे प्लेटफॉर्म सुरक्षित लेनदेन और व्यापक बाजारों तक निष्पक्ष पहुँच को सक्षम करके छोटे विक्रेताओं और गिग वर्कर्स को सशक्त बना रहे हैं। यह ई-कॉमर्स के क्षेत्र में समान अवसर उपलब्ध कराकर वित्तीय स्वतंत्रता और समावेशी आर्थिक विकास को प्रोत्साहन देता है।
कृषि-प्रौद्योगिकी एवं वित्त-प्रौद्योगिकी के स्टार्टअप ग्रामीण बाजार तक पहुँच बढ़ाकर ग्रामीण आय एवं उद्यमशीलता को सशक्त कर रहे हैं, वहीं प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसे प्रशासनिक सुधार पारदर्शी, समयबद्ध एवं दुरुपयोगरहित कल्याण वितरण सुनिश्चित कर ग्रामीण सशक्तीकरण को और सुदृढ़ कर रहे हैं।
प्रौद्योगिकी-संचालित प्लेटफ़ॉर्म आवश्यक सेवाओं तक पहुँच में सुधार करके अनौपचारिक श्रमिकों और वंचित समुदायों को सशक्त बना रहे हैं। ई-श्रम पोर्टल ने लाखों लोगों को कल्याणकारी योजनाओं से जोड़कर उन्हें औपचारिक अर्थव्यवस्था में शामिल किया है, जबकि दीक्षा, स्वयं और पीएम ई-विद्या जैसे डिजिटल शिक्षा प्लेटफॉर्म दूरदराज और वंचित क्षेत्र के छात्रों को निःशुल्क, बहुभाषी सामग्री प्रदान कर शैक्षिक अंतराल को कम कर रहे हैं।
टेलीमेडिसिन और डिजिटल वाणिज्य, वंचित क्षेत्रों में पहुंच और अवसरों का विस्तार कर रहे हैं। ई-संजीवनी जैसे प्लेटफॉर्म दूरस्थ परामर्श के माध्यम से ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा के अंतराल को कम रहे हैं, जबकि GeM जैसी पहल महिलाओं के नेतृत्व वाले स्टार्टअप और स्वयं सहायता समूहों को व्यापक बाजारों से जोड़कर उन्हें सशक्त बनाती है, जिससे उनकी आर्थिक स्वतंत्रता और डिजिटल समावेशन में वृद्धि होती है।
ई-गवर्नेंस प्लेटफॉर्म ने सार्वजनिक सेवा वितरण को अधिक कुशल, पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित बना दिया है। उमंग, डिजिलॉकर और आरोग्य सेतु जैसे प्लैटफॉर्म हजारों सेवाओं तक पहुँच प्रदान करते हैं, जबकि CPGRAMS और RTI ऑनलाइन त्वरित शिकायत निवारण के माध्यम से जवाबदेही में वृद्धि करते हैं और शासन में विश्वास को सुदृढ़ करते हैं।
शासन में AI का एकीकरण डेटा-संचालित नीतियों और वास्तविक समय संसाधन प्रबंधन को सक्षम करके प्रशासनिक दक्षता और निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ा रहा है। यातायात नियंत्रण और आपदा प्रतिक्रिया से लेकर वैक्सीन वितरण के लिए कोविन (CoWIN)जैसे प्लेटफार्मों तक, AI और एनालिटिक्स अधिक प्रभावी, समावेशी और न्यायसंगत सार्वजनिक सेवा वितरण सुनिश्चित करते हैं।
समावेशन भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक और डिजिटल आयामों तक विस्तारित है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत की विकास यात्रा में कोई भी पीछे न छूटे।
भौगोलिक समावेशन भारत के डिजिटल परिवर्तन का एक प्रमुख स्तंभ है, जो यह सुनिश्चित करता है कि सबसे दूरस्थ क्षेत्र भी डिजिटल क्रांति में पीछे न छूटें, तथा आवश्यक सेवाएं सभी के लिए सुलभ हों। उदाहरण के लिए, भारतनेट ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी का विस्तार कर रहा है, जिससे नागरिकों को सरकारी सेवाओं, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे तक पहुंच बनाने में मदद मिल रही है, जो पहले संभव नहीं था।
डिजिटल माध्यमों के द्वारा लैंगिक समावेशन महिलाओं को सशक्त बना रहा है, उन्हें आधुनिक अर्थव्यवस्था में आगे बढ़ने के लिए वित्तीय संसाधनों, उद्यमशीलता के अवसरों और डिजिटल उपकरणों तक पहुंच प्रदान कर रहा है। उदाहरण के लिए, डिजिटल माइक्रो-क्रेडिट प्लेटफॉर्म और स्वयं सहायता समूहों का डिजिटलीकरण महिला उद्यमियों को ऋण, बाजार और संसाधनों तक पहुंच प्रदान कर रहा है, जिससे वित्तीय स्वतंत्रता और आर्थिक सशक्तीकरण की बाधाएं दूर हो रही हैं।
वित्तीय समावेशन में अभूतपूर्व प्रगति हुई है, डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से लाखों लोगों को औपचारिक बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच प्राप्त हुई है, जिससे समाज के सभी वर्गों में आर्थिक भागीदारी को बढ़ावा मिला है। उदाहरण के लिए, 50 करोड़ से अधिक जन-धन खाते खोले जाने से बैंकिंग सेवाओं से वंचित लाखों भारतीयों को, विशेष रूप से ग्रामीण और वंचित क्षेत्रों में, वित्तीय सेवाओं और सरकारी सब्सिडी तक पहुंच प्रदान करके सशक्त बनाया गया है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से शैक्षिक समावेशन को उल्लेखनीय रूप से प्रोत्साहन प्राप्त हो रहा है, जिससे देश भर के छात्रों, विशेष रूप से वंचित क्षेत्रों के छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षण संसाधनों तक पहुँच प्राप्त करने में मदद मिल रही है। उदाहरण के लिए, NEP 2020 में डिजिटल शिक्षा पर बल और एडटेक प्लेटफॉर्म के उदय से यह सुनिश्चित हो रहा है कि सभी पृष्ठभूमि के छात्रों को शैक्षिक संसाधनों तक समान पहुँच प्राप्त हो, जिससे पूरे देश में शैक्षणिक परिणामों में सुधार हो रहा है।
भाषाई और सांस्कृतिक समावेशन भारत के डिजिटल विकास का एक महत्वपूर्ण पहलू है, जो यह सुनिश्चित करता है कि सभी नागरिक अपनी मूल भाषाओं में सेवाओं और सूचनाओं तक पहुंच प्राप्त कर सकें। उदाहरण के लिए, स्थानीय भाषा की सामग्री, ध्वनि-आधारित प्रौद्योगिकियां और AI आधारित अनुवाद टूल्स लाखों लोगों को अपनी स्थानीय भाषाओं में डिजिटल सेवाओं से जुड़ने में सक्षम बना रहे हैं, जिससे गैर-अंग्रेजी भाषी नागरिकों के लिए बेहतर पहुंच सुनिश्चित हो रही है।
डिजिटल यात्रा में सशक्तीकरण की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन वास्तविक, सार्वभौमिक समावेशन सुनिश्चित करने के लिए गंभीर चुनौतियों का समाधान किया जाना चाहिए। ये बाधाएं डिजिटल समावेशी समाज के समग्र लक्ष्य की प्राप्ति में रुकावट पैदा कर सकती हैं।
डिजिटल विभाजन एक बड़ी बाधा बनी हुई है, विशेषकर शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच। जबकि शहरों में डिजिटल सेवाओं के लिए बुनियादी ढांचा मौजूद है, ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर उन्नत इंटरनेट सेवा का अभाव होता है, जिससे स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और डिजिटल अर्थव्यवस्था तक पहुंच सीमित हो जाती है। इसके अतिरिक्त, महिलाओं एवं वरिष्ठ नागरिकों में डिजिटल साक्षरता की कमी तथा उपकरणों की सीमित वहनीयता सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को और गहरा करने का जोखिम उत्पन्न करती है।
जैसे-जैसे डिजिटल समावेशन में वृद्धि होती है, साइबर सुरक्षा और डेटा गोपनीयता के जोखिम भी बढ़ते जाते हैं, विशेष रूप से ग्रामीण जनसंख्या और महिलाओं जैसे सुभेद्य समूहों के लिए। शोषण को रोकने और सुरक्षित डिजिटल सशक्तीकरण को सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 को लागू करना महत्वपूर्ण है।
प्लेटफॉर्म आधारित पूँजीवाद के कारण कुछ बड़ी प्रौद्योगिकी कम्पनियों का बाजार पर प्रभुत्व बढ़ गया है, जिससे प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता विकल्प सीमित हो गए हैं। बड़ी कंपनियों को प्राथमिकता देने वाले प्रमुख ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम तथा स्थानीय विक्रेता संघर्ष कर रहे हैं, जिससे लघु व्यवसायों के निष्पक्ष एवं सतत विकास में बाधा उत्पन्न हो रही है।
डिजिटल अर्थव्यवस्था के तीव्र विकास के बावजूद, डिजिटल साक्षरता कम बनी हुई है, विशेष रूप से ग्रामीण और हाशिए पर स्थित समुदायों में, जिससे उनकी भागीदारी सीमित हो रही है। इस अंतर को कम करने के लिए बड़े पैमाने पर क्रियान्वित कौशल कार्यक्रमों जैसे PMGDISHA और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तथा इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) में प्रशिक्षण की आवश्यकता है ताकि व्यक्तियों को आर्थिक और सामाजिक सशक्तीकरण के लिए आवश्यक डिजिटल कौशल से सक्षम किया जा सके।
समावेशी सरकारी पहलों द्वारा संचालित भारत का डिजिटल परिवर्तन यह सुनिश्चित करता है कि तकनीकी विकास सभी नागरिकों, विशेषकर हाशिए पर पड़े लोगों तक पहुंचे, जिससे एक अधिक समतापूर्ण डिजिटल भविष्य को बढ़ावा मिले।
इंडिया स्टैक अंतर-संचालनीय डिजिटल प्लेटफार्मों का एक समूह है जो सार्वजनिक सेवाओं तक सुरक्षित, निर्बाध पहुंच को सक्षम बनाता है। आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर और अकाउंट एग्रीगेटर प्रणाली नागरिकों को वित्तीय सेवाओं, दस्तावेज़ों और डेटा साझाकरण तक सुगम पहुँच प्रदान करके उन्हें सशक्त बनाती है। ये सभी मंच मिलकर एक डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र का मूलाधार निर्मित करते हैं, जो समावेशी विकास को प्रोत्साहित करता है एवं यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी डिजिटल अर्थव्यवस्था से वंचित न रहे।
राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन (NDHM) रोगी-केंद्रित डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड पर ध्यान केंद्रित करता है, जिससे स्वास्थ्य सेवा अधिक सुलभ और कुशल बनती है। आधार को स्वास्थ्य रिकॉर्ड के साथ एकीकृत करके, NDHM शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों के नागरिकों को समय पर स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त करने की सुविधा प्रदान करता है, जिससे सभी के लिए, विशेष रूप से वंचित लोगों के लिए समान स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच सुनिश्चित होती है।
ONDC (डिजिटल कॉमर्स के लिए खुला नेटवर्क) छोटे व्यवसायों और स्थानीय विक्रेताओं को बड़ी कंपनियों के साथ समान स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाकर डिजिटल बाज़ारों में बदलाव ला रहा है। प्रवेश संबंधी बाधाओं को कम करने वाला मंच प्रदान करके, ओएनडीसी छोटे विक्रेताओं को सशक्त बनाता है, यह सुनिश्चित करता है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था समावेशी हो, जिससे उन्हें व्यापक उपभोक्ताओं तक पहुंचने में मदद मिले।
पीएलआई योजनाएँ स्वदेशी नवाचार को बढ़ावा दे रही हैं, विशेष रूप से सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योगों में। घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करके, ये योजनाएं विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करती हैं, रोजगार सृजन करती हैं और आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहन देती हैं। यह पहल वैश्विक तकनीक में भारत की स्थिति को सुदृढ़ करती है और स्थानीय स्तर पर अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों के विकास को प्रोत्साहित करती है।
भारत तेजी से डिजिटल नवाचार में एक वैश्विक अग्रणी के रूप में उभर रहा है, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (डीपीआई) में इसकी अग्रणी पहल को G-20 और विश्व बैंक जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से प्रशंसा मिल रही है। अंतर-संचालनीय और मापनीय डिजिटल समाधान तैयार करके भारत समावेशी वृद्धि और विकास के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाने के इच्छुक अन्य देशों के लिए एक मानक स्थापित कर रहा है।
इंडिया स्टैक एक प्रमुख तत्व साधन बन गया है, जिसके डिजिटल प्लेटफॉर्म को श्रीलंका और फिलीपींस जैसे विकासशील देशों द्वारा अपनाया जा रहा है। ये देश भारत को एकीकृत डिजिटल समाधानों के लिए एक आदर्श के रूप में देख रहे हैं, जो वित्तीय समावेशन, सार्वजनिक सेवा वितरण और नागरिक सशक्तीकरण को बढ़ावा दे सकता है, जिससे वे अपनी डिजिटल यात्रा में भारत की सफलता को दोहरा सकेंगे।
भारत का लक्ष्य अपनी तकनीकी प्रतिभा और पारिस्थितिकी तंत्र का लाभ उठाकर AI और डिजिटल नवाचार में वैश्विक नेतृत्वकर्ता बनना है। वैश्विक तकनीकी कंपनियोँ के साथ सहयोग करते हुए, यह डेटा संप्रभुता को प्राथमिकता देता है और एक परस्पर संबद्ध विश्व में राष्ट्रीय हितों और गोपनीयता की सुरक्षा करता है।
प्रौद्योगिकी को एक साधन के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि साध्य के रूप में। इसका ध्यान केवल अपने लिए तकनीकी प्रगति को बढ़ावा देने के बजाय मानव कल्याण संवर्धन और व्यक्तियों को सशक्त बनाने के व्यापक उद्देश्य की पूर्ति पर होना चाहिए। नवाचार का अंतिम लक्ष्य मानवीय गरिमा होना चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि प्रौद्योगिकी असमानताएँ उत्पन्न करने के बजाय समाज के उत्थान में सहायक हो।
नैतिक नवाचार में न्याय, समानता और मानवता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, तथा यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि डिजिटल उपकरण सभी व्यक्तियों, विशेषकर संवेदनशील वर्ग के प्रति सम्मान को ध्यान में रखकर डिजाइन किए जाएं। यह महत्वपूर्ण है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म और सेवाओं को निष्पक्षता पर ध्यान केंद्रित करते हुए विकसित किया जाए, यह सुनिश्चित किया जाए कि वे समाज के सभी वर्गों के लिए सुलभ हों, और मौजूदा सामाजिक विभाजन को सुदृढ़ किए बिना समावेशी प्रगति को प्रोत्साहन दें।
जैसे-जैसे हम प्रौद्योगिकी की शक्ति को आत्मसात कर रहे हैं, यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म बहिष्कार या निगरानी का साधन न बन जाएं। प्रौद्योगिकी को विशेषाधिकार प्राप्त और हाशिए पर पड़े लोगों के बीच के अंतर को बढ़ाना नहीं चाहिए; इसके बजाय, इसे लोगों को एक साथ लाने का कार्य करना चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि यह सशक्तीकरण का एक उपकरण है न कि नियंत्रण का तंत्र। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता के हनन से बचने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बढ़ती निर्भरता को सावधानीपूर्वक प्रबंधित किया जाना चाहिए।
“प्रौद्योगिकी को स्वतंत्रता और बंधुत्व की सेवा करनी चाहिए” यह आदर्श दर्शाता है कि डिजिटल प्रगति को स्वतंत्रता, सामाजिक एकता और न्याय के मूल्यों को बनाए रखना चाहिए। जैसे-जैसे नवाचार समाज को नया स्वरुप प्रदान करता है, तो इसे इस प्रकार संचालित किया जाना चाहिए कि यह समानता को बढ़ावा दे, गरिमा की रक्षा करे और प्रत्येक व्यक्ति को सशक्त बनाए, जिससे तकनीकी प्रगति एक समावेशी एवं मानवीय भविष्य की ओर अग्रसर हो।
डिजिटल अवसंरचना एक अधिकार के रूप में, डिजिटल विभाजन को कम करने के लिए, इंटरनेट तक पहुंच को जल अथवा विद्युत की भांति इसे एक बुनियादी आवश्यकता माना जाना चाहिए। हाई-स्पीड इंटरनेट की सार्वभौमिक पहुँच ग्रामीण समुदायों को सशक्त बना सकती है, शासन व्यवस्था में सुधार कर सकती है और आर्थिक भागीदारी को बढ़ावा दे सकती है। लास्ट माइल कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने के लिए भारतनेट और 5जी विस्तार में तेजी लाई जानी चाहिए। डिजिटल अवसंरचना को एक अधिकार के रूप में मान्यता देना जो प्रौद्योगिकी को सामाजिक न्याय के साथ संरेखित करता है।
नवाचार को लोकतांत्रिक बनाने के लिए महिलाओं और युवाओं के लिए लक्षित कौशल कार्यक्रम आवश्यक हैं। PMGDISHA, एआई-आधारित कोडिंग बूटकैंप और टिंकरिंग लैब जैसी पहल डिजिटल साक्षरता संबंधी अंतराल को कम कर सकती हैं। भारत के डिजिटल परिवर्तन का नेतृत्व करने के लिए इस जनसांख्यिकीय लाभांश का उपयोग किया जाना चाहिए। समावेशी नवाचार का अर्थ है उन लोगों को सशक्त बनाना जो ऐतिहासिक रूप से तकनीकी क्रांतियों से वंचित रहे हैं।
डिजिटल भारत केवल अंग्रेजी प्लेटफॉर्म पर ही सफल नहीं हो सकता है। स्थानीय भाषा की सामग्री, वॉइस इंटरफ़ेस और AI-संचालित अनुवाद उपकरणों को बढ़ावा देकर सांस्कृतिक और भाषाई अंतर को कम किया जा सकता है। भाषिनी जैसे प्लेटफ़ॉर्म और स्थानीय एडटेक ऐप् लाखों लोगों को इससे जोड़ सकते हैं। इससे यह सुनिश्चित होता है कि नवाचार प्रत्येक भारतीय की भाषा बोले।
जैसे-जैसे डिजिटल पहुंच बढ़ती जा रही है,सशक्त साइबर कानूनों के माध्यम से नागरिकों की सुरक्षा करना अनिवार्य हो गया है। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 को जवाबदेही और नागरिक-केंद्रितता के साथ लागू किया जाना चाहिए। नैतिक ढांचे को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रौद्योगिकी गरिमा, निजता और न्याय को बनाए रखे। विश्वास के बिना तकनीक वास्तव में समावेशी नहीं हो सकती।
डिजिटल समावेशन को बढ़ाने के लिए सहयोगात्मक प्रयास की आवश्यकता है। सार्वजनिक निजी भागीदारी (PPP) किफायती उपकरणों, स्थानीय भाषा की विषय-वस्तु और अंतिम छोर तक डिजिटल साक्षरता के क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा दे सकती है। निजी क्षेत्र की सक्रियता को समावेशन और सशक्तीकरण के सार्वजनिक लक्ष्यों के साथ संरेखित किया जाना चाहिए। साथ मिलकर, वे एक ऐसे डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण कर सकते हैं जो सुलभ, सुरक्षित और समतापूर्ण हो।
आज भारत एक परिवर्तनकारी राह पर खड़ा है, जहाँ उसका जनसांख्यिकीय लाभांश, तकनीकी क्षमताएँ एवं प्रगतिशील नीतिगत ढाँचा एक साथ अभिसमाहित हो रहे हैं। युवा जनसंख्या एवं UPI तथा आधार जैसी डिजिटल पहलों की उपलब्धता से, भारत समावेशिता एवं व्यापकता पर आधारित तकनीकी-संचालित विकास के नए मॉडल को आकार देने की विशिष्ट स्थिति में है।
डिजिटल इंडिया ने ग्रामीण क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ते हुए पारदर्शी शासन को सशक्त किया है और डिजिटल भुगतान, इंटरनेट विस्तार तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता व सेमीकंडक्टर में प्रगति के माध्यम से नवाचार को गति प्रदान कर राष्ट्र को रूपांतरित कर दिया है। जैसे-जैसे भारत विकसित भारत के दृष्टिकोण की ओर अग्रसर हो रहा है, डिजिटल इंडिया समावेशी विकास का उत्प्रेरक बनकर नागरिकों को सशक्त बनाता है तथा देश को वैश्विक तकनीकी नेतृत्व के पथ पर स्थापित करता है। आगामी दशक गहरे परिवर्तन की संभावनाओं से पूर्ण है, जहाँ प्रौद्योगिकी सशक्त, स्मार्ट और आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला होगी।
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