Q. तदर्थ राजनीतिक निर्णयों के स्थान पर राज्य पुनर्गठन के लिए एक स्थायी, वस्तुनिष्ठ राष्ट्रीय ढाँचे की आवश्यकता का मूल्यांकन कीजिए। उपयुक्त सुधारों का सुझाव दीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • एक स्थायी एवं वस्तुनिष्ठ राष्ट्रीय ढाँचे की आवश्यकता का उल्लेख कीजिए।
  • स्थायी ढाँचा स्थापित करने में चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।
  • उपयुक्त सुधार सुझाइए।

उत्तर

भारत का संघीय मानचित्र प्रायः संस्थागत रूपरेखा की अपेक्षा राजनीतिक वार्ताओं के माध्यम से विकसित हुआ है। वर्ष 1956 के भाषायी पुनर्गठन से लेकर तेलंगाना जैसे बाद के विभाजनों तक, राज्य निर्माण अधिकतर प्रतिक्रियात्मक रहा है। शासन की बढ़ती जटिलता और जनसंख्या के विस्तार को देखते हुए, संतुलित संघीय पुनर्संरचना हेतु एक स्थायी एवं वस्तुनिष्ठ राष्ट्रीय ढाँचे की आवश्यकता स्पष्ट होती है।

एक स्थायी एवं वस्तुनिष्ठ राष्ट्रीय ढाँचे की आवश्यकता

  • प्रशासनिक दक्षता: अत्यधिक जनसंख्या वाले राज्य प्रशासनिक रूप से बोझिल हो जाते हैं, जिससे अंतिम छोर तक सेवा-प्रदाता प्रभावित होते हैं।
    • उदाहरण: 20 करोड़ से अधिक जनसंख्या वाला उत्तर प्रदेश पूर्वांचल जैसे क्षेत्रों में क्षेत्रीय विषमताओं से जूझता है।
  • साक्ष्य-आधारित निर्णय-निर्माण: वस्तुनिष्ठ मानदंड राजनीतिक प्रेरित एवं आकस्मिक विभाजनों को रोकते हैं।
  • संतुलित क्षेत्रीय विकास: ढाँचा-आधारित विभाजन से पिछड़े क्षेत्रों की उपेक्षा का समाधान संस्थागत रूप से किया जा सकता है।
    • उदाहरण: छत्तीसगढ़ के निर्माण से आदिवासी जिलों पर प्रशासनिक ध्यान केंद्रित करने में सुधार हुआ।
  • राजकोषीय व्यवहार्यता मूल्यांकन: अत्यधिक केंद्रीय अनुदानों पर निर्भर छोटे राज्य संघीय संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं; नए राज्यों की आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित होनी चाहिए। 
  • राष्ट्रीय एकता का संरक्षण: संरचित पुनर्गठन क्षेत्रीय आकांक्षाओं और संवैधानिक स्थिरता के बीच संतुलन स्थापित करता है।
    • उदा: राज्य पुनर्गठन आयोग (1953–55) ने भाषायी आधार पर पुनर्गठन करते हुए संघ की एकता बनाए रखी।

स्थायी ढाँचा स्थापित करने में चुनौतियाँ

  • राजनीतिक प्रतिरोध: सत्तारूढ़ दल क्षेत्रीय प्रभाव या चुनावी लाभ खोने के भय से विरोध कर सकते हैं।
    • उदाहरण: विदर्भ की माँग पर निर्णय में विलंब राजनीतिक गणनाओं को दर्शाता है।
  • पहचान एवं भावनात्मक मुद्दे: क्षेत्रीय आंदोलनों का आधार केवल प्रशासनिक तर्क नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान भी होती है।
    • उदाहरण: गोरखालैंड की माँगें शासन संबंधी चिंताओं के साथ-साथ पहचान पर भी केंद्रित हैं।
  • वित्तीय एवं संसाधन विवाद: विभाजन के पश्चात् परिसंपत्तियों, देनदारियों, जल एवं राजस्व के बँटवारे पर विवाद उत्पन्न होते हैं।
    • उदाहरण: विभाजन के बाद आंध्र प्रदेश-तेलंगाना के बीच हैदराबाद के राजस्व को लेकर असहमति।
  • संवैधानिक संवेदनशीलता: अनुच्छेद-3 संसद को राज्यों के पुनर्गठन की अनुमति देता है, लेकिन अत्यधिक केंद्रीय विवेकाधिकार को चुनौती दी जा सकती है।
  • विखंडन का जोखिम: स्पष्ट मानदंडों के बिना बार-बार विभाजन से क्रमिक माँगों को प्रोत्साहन मिल सकता है। 
    • उदाहरण: अन्य जगहों पर छोटे राज्यों ने आगे विभाजन के लिए उप-क्षेत्रीय आंदोलनों को जन्म दिया है।

उपयुक्त सुधार

  • स्थायी राष्ट्रीय पुनर्गठन आयोग की स्थापना: राज्य की व्यवहार्यता और माँगों की समय-समय पर समीक्षा करने के लिए एक स्थायी विशेषज्ञ निकाय।
    • उदाहरण: वर्ष 1953 के राष्ट्रीय पुनर्गठन आयोग के समान एक स्थायी तंत्र का संस्थागतकरण।
  • बहु-कारक मानदंड ढाँचा: शासन दक्षता सुनिश्चित करने के लिए जनसंख्या आकार, प्रशासनिक क्षमता, राजकोषीय स्थिरता और विकास सूचकांकों के लिए सीमा-आधारित मानदंड शामिल करें।
  • अनिवार्य राजकोषीय प्रभाव आकलन: स्वीकृति से पूर्व राजस्व आधार एवं व्यय क्षमता का स्वतंत्र मूल्यांकन।
  • संरचित सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया: हितधारकों के साथ संस्थागत संवाद से असंतोष कम किया जा सकता है।
    • उदाहरण: अंतिम स्वीकृति से पूर्व संसदीय समिति द्वारा परामर्श।
  • चरणबद्ध एवं योजनाबद्ध क्रियान्वयन: परिसंपत्ति-विभाजन, कैडर आवंटन एवं नई राजधानी निर्माण हेतु समयबद्ध संक्रमण योजना।
    • उदाहरण: संस्थानों का क्रमिक स्थानांतरण, न कि आकस्मिक विभाजन।

निष्कर्ष

भारत को एक नियम-आधारित, पारदर्शी ढाँचे की आवश्यकता है, जो प्रशासनिक तर्कसंगतता और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के बीच संतुलन स्थापित करे। स्थायी आयोग, वस्तुनिष्ठ मानदंड, राजकोषीय सुरक्षा उपाय और संरचित परामर्श प्रक्रिया राज्य पुनर्गठन को राजनीतिक अवसरवादिता से निकालकर संस्थागत सुधार में परिवर्तित कर सकते हैं। इससे सहकारी संघवाद सुदृढ़ होगा तथा राष्ट्रीय एकता और उत्तरदायी शासन दोनों का संरक्षण संभव होगा।

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