प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत में एक संधारणीय ऊर्जा स्रोत के रूप में हरित हाइड्रोजन की क्षमता का मूल्यांकन कीजिये।
- भारत में हरित हाइड्रोजन को बड़े पैमाने पर अपनाने में शामिल प्रौद्योगिकीय चुनौतियों पर चर्चा कीजिए।
- भारत में हरित हाइड्रोजन के बड़े पैमाने पर अंगीकरण में शामिल अवसंरचनात्मक चुनौतियों पर प्रकाश डालिये।
- आगे की राह लिखिये।
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उत्तर
2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन प्राप्त करने की भारत की रणनीति में ग्रीन हाइड्रोजन एक महत्त्वपूर्ण तत्व के रूप में उभर रहा है। सौर और पवन जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करके जल के इलेक्ट्रोलिसिस के माध्यम से उत्पादित, यह जीवाश्म ईंधन के लिए एक संधारणीय विकल्प प्रदान करता है। सरकार के राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का लक्ष्य वर्ष 2030 तक प्रतिवर्ष 5 मिलियन टन उत्पादन करना है जिससे भारत ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित होगा।
भारत में हरित हाइड्रोजन की संभावना
- औद्योगिक क्षेत्रों का डीकार्बोनाइजेशन: ग्रीन हाइड्रोजन स्टील, सीमेंट और रसायन जैसे उद्योगों में जीवाश्म ईंधन का स्थान ले सकता है, जिससे कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आएगी।
- उदाहरण के लिए: जामनगर में धीरूभाई अंबानी ग्रीन एनर्जी गीगा कॉम्प्लेक्स ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन करने के लिए तैयार है, जिसका उद्देश्य औद्योगिक प्रक्रियाओं को डीकार्बोनाइज करना है।
- ऊर्जा भंडारण और ग्रिड स्थिरता: यह अतिरिक्त अक्षय ऊर्जा के भंडारण के लिए एक प्रभावी माध्यम के रूप में कार्य करता है, जिससे ग्रिड स्थिरता और विश्वसनीयता बढ़ती है।
- उदाहरण के लिए: चरम अक्षय ऊर्जा उत्पादन के दौरान उत्पादित ग्रीन हाइड्रोजन को कम उत्पादन की अवधि के दौरान संग्रहीत और उपयोग किया जा सकता है, जिससे एक निरंतर ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित होती है।
- जीवाश्म ईंधन के आयात में कमी: घरेलू स्तर पर हरित हाइड्रोजन का उत्पादन करके, भारत आयातित जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा में वृद्धि होगी।
- उदाहरण के लिए: प्रतिवर्ष 5 मिलियन टन हरित हाइड्रोजन का उत्पादन करने की सरकार की पहल का उद्देश्य जीवाश्म ईंधन के आयात पर निर्भरता कम करना है।
- आर्थिक विकास और रोजगार सृजन: ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र से रोजगार के पर्याप्त अवसर उत्पन्न होने और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
- उदाहरण के लिए: राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन से वर्ष 2030 तक 6 लाख से अधिक रोजगार सृजित होने और ₹8 लाख करोड़ का निवेश प्राप्त होने का अनुमान है।
- निर्यात के अवसर: भारत में स्वच्छ ऊर्जा की वैश्विक माँग को पूरा करते हुए हरित हाइड्रोजन का प्रमुख निर्यातक बनने की क्षमता है।
प्रौद्योगिकीय चुनौतियाँ
- उच्च उत्पादन लागत: ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन की वर्तमान लागत, परंपरागत हाइड्रोजन की तुलना में काफी अधिक है।
- उदाहरण के लिए: ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन लागत $5.30 से $6.70 प्रति किलोग्राम के बीच अनुमानित है, जो सबसे सस्ते G20 ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादक, ऑस्ट्रेलिया की तुलना में लगभग 40% अधिक महंगी है।
- सीमित इलेक्ट्रोलाइज़र विनिर्माण क्षमता: भारत में इलेक्ट्रोलाइजर के लिए पर्याप्त घरेलू विनिर्माण क्षमता का अभाव है, जो हरित हाइड्रोजन उत्पादन के लिए आवश्यक है।
- उदाहरण के लिए: आयातित इलेक्ट्रोलाइजर पर निर्भरता, लागत को बढ़ाती है और हरित हाइड्रोजन उत्पादन को बढ़ाने में बाधा डालती है।
- जल की कमी: इलेक्ट्रोलिसिस के लिए बहुत ज़्यादा जल की ज़रूरत होती है, जो जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में एक चुनौती है।
- उदाहरण के लिए: इलेक्ट्रोलिसिस के ज़रिए एक किलोग्राम ग्रीन हाइड्रोजन बनाने के लिए लगभग नौ लीटर ताज़ा जल की ज़रूरत होती है, जिससे भारत के पहले से ही तनावग्रस्त जल संसाधनों पर दबाव और बढ़ जाता है।
- प्रौद्योगिकी परिपक्वता: कुशल और लागत प्रभावी हरित हाइड्रोजन उत्पादन की तकनीक अभी भी विकसित हो रही है।
- मौजूदा बुनियादी ढाँचे के साथ एकीकरण: मौजूदा ऊर्जा प्रणालियों में हरित हाइड्रोजन को एकीकृत करने के लिए पर्याप्त संशोधनों और निवेश की आवश्यकता है।
बुनियादी ढाँचागत चुनौतियाँ
- भंडारण सुविधाओं का अभाव: ग्रीन हाइड्रोजन को इसके कम ऊर्जा घनत्व के कारण विशेष भंडारण समाधान की आवश्यकता होती है।
- उदाहरण के लिए: समर्पित भंडारण सुविधाओं की अनुपस्थिति, ऊर्जा स्रोत के रूप में ग्रीन हाइड्रोजन की स्केलिबिलिटी और विश्वसनीयता को बाधित करती है।
- परिवहन सीमाएँ: लंबी दूरी तक हरित हाइड्रोजन का परिवहन करना, रसद संबंधी चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है।
- अल्प–विकसित वितरण नेटवर्क: वर्तमान वितरण बुनियादी ढाँचा हरित हाइड्रोजन को प्रबंधित करने के लिए सुसज्जित नहीं है।
- फिलिंग स्टेशन की कमी: हाइड्रोजन ईंधन फिलिंग स्टेशनों की कमी हाइड्रोजन-चालित वाहनों को अपनाने में बाधा डालती है।
- ग्रिड संगतता मुद्दे: ग्रीन हाइड्रोजन को मौजूदा ऊर्जा ग्रिड में एकीकृत करने के लिए तकनीकी चुनौतियों पर काबू पाना जरूरी है।
- उदाहरण के लिए: ग्रीन हाइड्रोजन को समायोजित करने के लिए ग्रिड के बुनियादी ढाँचे में बदलाव करना इसके प्रभावी उपयोग के लिए आवश्यक है।
आगे की राह
- नीतिगत प्रोत्साहन: सहायक नीतियों को लागू करने से ग्रीन हाइड्रोजन को अपनाने में तेज़ी आ सकती है।
- उदाहरण के लिए: ग्रीन हाइड्रोजन परियोजनाओं के लिए सब्सिडी और कर प्रोत्साहन, निवेश को आकर्षित कर सकते हैं और लागत कम कर सकते हैं।
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी: सरकार और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग से नवाचार और बुनियादी ढाँचे के विकास को बढ़ावा मिल सकता है।
- अनुसंधान एवं विकास निवेश: अनुसंधान एवं विकास के लिए वित्त पोषण में वृद्धि से प्रौद्योगिकीय प्रगति हो सकती है।
- बुनियादी ढाँचे का विकास: हरित हाइड्रोजन को व्यापक रूप से अपनाने के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचे का निर्माण महत्त्वपूर्ण है।
- उदाहरण के लिए: भंडारण सुविधाओं, परिवहन नेटवर्क और ईंधन फिलिंग स्टेशनों का विकास, हरित हाइड्रोजन के उपयोग को सुविधाजनक बनाएगा।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी में शामिल होने से वैश्विक बाजारों और प्रौद्योगिकियों तक पहुँच मिल सकती है।
- उदाहरण के लिए: भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच सहयोग अक्षय ऊर्जा पहलों में निवेश बढ़ाने पर केंद्रित है, जिसमें हरित हाइड्रोजन परियोजनाएँ, स्वच्छ ऊर्जा में द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाना शामिल है।
ग्रीन हाइड्रोजन जो एक सतत और स्वच्छ ऊर्जा स्रोत प्रदान करता है में भारत के ऊर्जा परिदृश्य को बदलने की पर्याप्त क्षमता है। हालाँकि, इसके बड़े पैमाने पर अंगीकरण में तकनीकी और बुनियादी ढाँचे से जुड़ी चुनौतियाँ हैं, जिन्हें नीतिगत समर्थन, अनुसंधान और बुनियादी ढाँचे में निवेश और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से संबोधित किया जाना चाहिए। इन बाधाओं को पार करके, ग्रीन हाइड्रोजन भारत के कार्बन-तटस्थ भविष्य की ओर संक्रमण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।