Q. अफ्रीका में अत्यधिक प्रतिस्पर्द्धी भू-राजनीतिक परिदृश्य के मद्देनजर, भारत की अफ्रीका नीति में 'घोषणात्मक कूटनीति' (Declaratory Diplomacy) से 'प्रक्रिया-संचालित साझेदारी' (Process-driven Partnership) की ओर आवश्यक बदलाव का मूल्यांकन कीजिए। इस सहभागिता को बनाए रखने के लिए संरचनात्मक तंत्रों का सुझाव दीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

May 16, 2026

GS Paper IIInternational Relations

प्रश्न की मुख्य माँग

  • अफ्रीका में भारत की घोषणात्मक कूटनीति की सीमाओं का उल्लेख कीजिए।
  • प्रक्रिया-आधारित भारत–अफ्रीका साझेदारी की आवश्यकता की चर्चा कीजिए।
  • सतत एवं संस्थागत सहभागिता हेतु संरचनात्मक तंत्र का सुझाव दीजिए। 

उत्तर

चीन, यूरोपीय संघ, जापान तथा अन्य शक्तियों की बढ़ती सक्रियता के बीच अफ्रीका वैश्विक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र बनकर उभरा है। भारत के लिए केवल ऐतिहासिक सद्भावना पर्याप्त नहीं है। रणनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने हेतु अब सतत् और संस्थागत सहभागिता अनिवार्य हो गई है।

अफ्रीका में भारत की घोषणात्मक कूटनीति की सीमाएँ

  • शिखर सम्मेलनों पर निर्भरता: भारत–अफ्रीका संबंध निरंतर संस्थागत संवाद के बजाय समय-समय पर आयोजित भारत–अफ्रीका मंच शिखर सम्मेलनों (IAFS) पर अत्यधिक निर्भर बने हुए हैं।
    • उदाहरण: IAFS-IV वर्ष 2020 में आयोजित होना था, किंतु इसके लंबे समय तक स्थगित रहने से सहभागिता की गति कमजोर पड़ी।
  • क्रियान्वयन अंतराल: शिखर सम्मेलनों में घोषित प्रतिबद्धताओं का कार्यान्वयन प्रायः कमजोर रहता है तथा अनुवर्ती तंत्र पर्याप्त प्रभावी नहीं होते।
    • उदाहरण: प्रतिबद्धताओं और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच निरंतर अंतर को IAFS की प्रमुख कमजोरी माना जाता है।
  • क्षेत्रीय आर्थिक समुदायों से कमजोर संपर्क: अफ्रीकी संघ तथा क्षेत्रीय आर्थिक समुदायों के साथ सीमित सहभागिता भारत की रणनीतिक गहराई को कम करती है।
    • उदाहरण: क्षेत्रीय आर्थिक समुदायों और अफ्रीकी संघ की संस्थाओं के साथ भारत की सहभागिता पर्याप्त रूप से संस्थागत नहीं बन पाई है।
  • अस्थायी साझेदार की छवि: निरंतरता के अभाव में भारत को दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार के बजाय केवल एक यथार्थ एवं अवसरवादी भागीदार के रूप में देखा जाने का जोखिम बना रहता है।

प्रक्रिया-आधारित भारत–अफ्रीका साझेदारी की आवश्यकता

  • प्रतिस्पर्द्धी वास्तविकता: अफ्रीका की वैश्विक साझेदारियाँ अधिक विविध हो चुकी हैं, जिसके कारण भारत को केवल ऐतिहासिक निकटता से आगे बढ़कर संरचित सहभागिता अपनानी होगी।
    • उदाहरण: वर्ष 2025–26 में यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया, फ्राँस और चीन ने अफ्रीका में अपनी सक्रियता में वृद्धि की है।
  • रणनीतिक उपस्थिति: निरंतर सहभागिता वैश्विक शासन संबंधी मुद्दों पर अफ्रीका की प्राथमिकताओं को आकार देने में भारत की भूमिका को सुदृढ़ करती है।
    • उदाहरण: अफ्रीकी संघ आयोग जलवायु परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऊर्जा संक्रमण जैसे विषयों पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव रखता है।
  • विकासात्मक साझेदारी: भारत प्रतीकात्मक कूटनीति के बजाय डिजिटल समावेशन, स्वास्थ्य और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में व्यावहारिक सहयोग प्रदान कर सकता है।
    • उदाहरण: भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना प्रणाली अफ्रीकी देशों के लिए अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत करती है।
  • राजनीतिक विश्वास: नियमित संवाद विश्वास को मजबूत करता है तथा भारत की सहभागिता को बाहरी शक्तियों के एजेंडे के बजाय अफ्रीकी प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाता है।
    • उदाहरण: युगांडा की संसद में प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन में इस बात पर बल दिया गया कि भारत की नीति अफ्रीकी प्राथमिकताओं से निर्देशित होनी चाहिए।
  • ग्लोबल साउथ में भूमिका: अफ्रीका के साथ मजबूत संबंध भारत के विश्वसनीय ग्लोबल साउथ साझेदार होने के दावे को सुदृढ़ करते हैं।
    • उदाहरण: अफ्रीका भारत के दक्षिण–दक्षिण सहयोग और विकासात्मक कूटनीति का केंद्रीय आधार बना हुआ है।

सतत सहभागिता हेतु संरचनात्मक तंत्र

  • वार्षिक उच्चस्तरीय यात्राएँ: अफ्रीकी संघ आयोग के अध्यक्ष तथा अफ्रीकी संघ के वर्तमान अध्यक्ष की वार्षिक यात्राओं को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए।
    • उदाहरण: अफ्रीकी संघ आयोग के अध्यक्ष को प्रतिवर्ष आमंत्रित करना तथा घूर्णन प्रणाली वाले अफ्रीकी संघ अध्यक्ष की राजकीय यात्रा आयोजित करना।
  • ट्रैक 1.5 संवाद: ट्रैक 1.5 संवाद तंत्र शिखर सम्मेलनों के बीच निरंतरता की कमी को दूर करने में सहायक हो सकता है।
    • उदाहरण: नीति-निर्माताओं, विशेषज्ञों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों को शामिल करते हुए वार्षिक भारत–अफ्रीका रणनीतिक संवाद स्थापित किया जा सकता है।
  • मध्यावधि समीक्षा तंत्र: प्रतिबद्धताओं की प्रगति की निगरानी तथा प्राथमिकताओं के नियमित पुनर्संतुलन हेतु औपचारिक मध्यावधि समीक्षा तंत्र विकसित किया जाना चाहिए।
  • कूटनीतिक परामर्श: नई दिल्ली और अदीस अबाबा में अफ्रीकी राजनयिकों के साथ नियमित परामर्श तंत्र को और सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
  • क्षेत्रीय आर्थिक समुदायों से सहभागिता: क्षेत्रीय आर्थिक समुदायों तथा पूर्व के त्रिस्तरीय अफ्रीका ढाँचे के साथ संरचित सहभागिता को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए।
    • उदाहरण: भारत का द्विपक्षीय–क्षेत्रीय–अखिल-अफ्रीकी ढाँचा पूर्व की क्रियान्वयन समस्याओं के बावजूद वैचारिक रूप से अब भी उपयुक्त माना जाता है।

निष्कर्ष

भारत की अफ्रीका नीति को केवल शिखर सम्मेलन आधारित प्रतीकात्मकता से आगे बढ़कर संस्थागत सुदृढ़ता की दिशा में विकसित होना होगा। निरंतरता, प्रभावी क्रियान्वयन और अफ्रीकी प्राथमिकताओं पर आधारित प्रक्रिया-आधारित साझेदारी भारत को केवल एक ऐतिहासिक मित्र ही नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय रणनीतिक भागीदार के रूप में स्थापित करेगी।

In the wake of a highly competitive geopolitical landscape in Africa, evaluate the shift required in India’s Africa policy from ‘declaratory diplomacy’ to a process-driven partnership’. Suggest structural mechanisms to sustain this engagement. in hindi

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