प्रश्न की मुख्य माँग
- जलवायु वित्त (Climate Finance) को बढ़ावा देने में RBI के उपायों के योगदान का विश्लेषण कीजिए।
- RBI के इन उपायों से संबंधित सीमाओं की विवेचना कीजिए।
- ‘क्लाइमेट फाइनेंस टैक्सोनॉमी’ (Climate Finance Taxonomy) की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
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उत्तर
परिचय
भारत को अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) लक्ष्यों को वर्ष 2030 तक प्राप्त करने के लिए लगभग ₹162.5 ट्रिलियन (2.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर) तथा नेट-जीरो (Net Zero) लक्ष्य हासिल करने हेतु 2070 तक लगभग 10.1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता है। जलवायु-वित्त के साधनों में वृद्धि के बावजूद, अनुकूलन संबंधी वित्तीय अंतराल, निवेश जोखिम, परियोजनाओं की कमी तथा संस्थागत बाधाएँ बड़े पैमाने पर पूँजी जुटाने को भारत के समक्ष प्रमुख जलवायु-वित्त संबंधी चुनौतियाँ उत्पन्न करती हैं।
जलवायु वित्त में RBI के उपायों का योगदान
- जलवायु जोखिम ढाँचा: RBI ने जलवायु जोखिम प्रबंधन हेतु एक ढाँचा प्रस्तावित किया है, जिसके अंतर्गत विनियमित संस्थाओं को जलवायु जोखिमों की पहचान, मूल्यांकन तथा प्रबंधन करना होगा।
- उदाहरण: जलवायु-संबंधित वित्तीय जोखिमों पर RBI का प्रारूप प्रकटीकरण ढाँचा (2024-25)।
- हरित वित्त को बढ़ावा: RBI ने ग्रीन डिपॉजिट तथा सतत् वित्त संबंधी दिशा-निर्देशों के माध्यम से जलवायु-केंद्रित ऋण प्रवाह को प्रोत्साहित किया है।
- उदाहरण: ग्रीन डिपॉजिट स्वीकार करने हेतु RBI का ढाँचा (2023), जिसे अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के माध्यम से लागू किया गया।
- जलवायु प्रकटीकरण: RBI वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप मानकीकृत जलवायु प्रकटीकरण व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
- उदाहरण: जलवायु-संबंधित वित्तीय प्रकटीकरण कार्यबल (TCFD) तथा अंतरराष्ट्रीय सततता मानक बोर्ड (ISSB) के सिद्धांतों पर आधारित RBI का प्रारूप प्रकटीकरण ढाँचा।
RBI के उपायों की सीमाएँ
- आपूर्ति-केंद्रित दृष्टिकोण: RBI के अधिकांश उपाय वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता बढ़ाते हैं, किंतु वे स्वतः जलवायु निवेशों की मांग उत्पन्न नहीं करते।
- अनुकूलन की उपेक्षा: वित्तीय प्रवाह अभी भी जलवायु अनुकूलन परियोजनाओं की अपेक्षा शमन क्षेत्रों को अधिक प्राथमिकता देता है।
- उदाहरण: नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र को जलवायु-लचीलापन परियोजनाओं की तुलना में कहीं अधिक निवेश प्राप्त होता है।
- वर्गीकरण संबंधी अंतराल: एकीकृत ‘क्लाइमेट फाइनेंस टैक्सोनॉमी’ (Climate Finance Taxonomy) के अभाव में यह स्पष्ट नहीं होता कि कौन-सा निवेश वास्तव में जलवायु-अनुकूल माना जाएगा।
- प्रारंभिक अवस्था के ढाँचे: जलवायु जोखिम प्रकटीकरण एवं प्रबंधन से संबंधित अनेक ढाँचे अभी विकासशील अवस्था में हैं और अभी तक बड़े पैमाने पर पूँजी प्रवाह को आकर्षित नहीं कर पाए हैं।
- उदाहरण: भारत की ₹162.5 ट्रिलियन की वित्तीय आवश्यकता वर्तमान हरित-वित्त (Green Finance) प्रवाह की तुलना में कहीं अधिक है।
‘क्लाइमेट फाइनेंस टैक्सोनॉमी’ की आवश्यकता
- समान परिभाषा: एक टैक्सोनॉमी जलवायु-अनुकूल आर्थिक गतिविधियों के लिए मानकीकृत वर्गीकरण प्रदान करती है।
- उदाहरण: वित्त मंत्रालय हरित संक्रमण को समर्थन देने हेतु भारत की जलवायु वित्त टैक्सोनॉमी विकसित कर रहा है।
- ग्रीनवॉशिंग की रोकथाम: स्पष्ट मानदंड भ्रामक पर्यावरणीय दावों को कम करते हैं तथा बाजार की विश्वसनीयता बढ़ाते हैं।
- उदाहरण: आर्थिक सर्वेक्षण में सतत वित्त पर चर्चा के दौरान हरित निवेशों में पारदर्शिता पर बल दिया गया है।
- निवेशक विश्वास: एकसमान मानक घरेलू एवं वैश्विक निवेशकों को वास्तविक जलवायु परियोजनाओं की पहचान करने में सहायता करते हैं।
- उदाहरण: यूरोपीय संघ (EU) टैक्सोनॉमी ने विश्व स्तर पर सतत् निवेश निर्णयों के लिए अधिक स्पष्टता प्रदान की है।
- बेहतर संसाधन आवंटन: पूँजी को नवीकरणीय ऊर्जा तथा जलवायु-लचीली अवसंरचना जैसे उन क्षेत्रों की ओर निर्देशित किया जा सकता है, जहाँ शमन एवं अनुकूलन के सर्वाधिक लाभ प्राप्त होते हैं।
- वैश्विक सामंजस्य: एक सुदृढ़ टैक्सोनॉमी अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त तथा हरित पूँजी बाजारों तक पहुँच को सुगम बनाती है।
निष्कर्ष
भारत की जलवायु महत्त्वाकांक्षाओं को प्राप्त करने के लिए केवल वित्तीय साधनों का निर्माण पर्याप्त नहीं है, बल्कि बड़े पैमाने पर पूँजी प्रवाह को भी सक्रिय करना आवश्यक है। RBI की पहलें इसके लिए एक सक्षम आधार प्रदान करती हैं, किंतु वित्त को प्रभावी एवं लक्षित रूप से निर्देशित करने हेतु व्यापक ‘क्लाइमेट फाइनेंस टैक्सोनॉमी’ (Comprehensive Climate Finance Taxonomy) तथा मजबूत संस्थागत ढाँचे की स्थापना अनिवार्य है।