Q. व्यावसायिक सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा के विशेष संदर्भ में, भारत में असंगठित क्षेत्र पर नए श्रम संहिताओं के प्रभाव का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। ये संहिताएँ श्रम कल्याण प्रशासन की संघीय संरचना को किस सीमा तक चुनौती देती हैं? (15 अंक, 250 शब्द)

December 25, 2025

GS Paper IISocial Justice

प्रश्न की मुख्य माँग

  • व्यावसायिक सुरक्षा पर प्रभाव (OSH कोड: व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य परिस्थितियाँ कोड, 2020)।
  • सामाजिक सुरक्षा पर प्रभाव (SS कोड)।
  • संबंधित चिंताएँ।
  • आगे की राह।
  • संघीय संरचना के समक्ष चुनौतियाँ।

उत्तर

चार श्रम संहिताएँ (सामाजिक सुरक्षा, औद्योगिक संबंध, वेतन तथा व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थितियाँ) व्यापार करने में सुगमता बढ़ाने और अर्थव्यवस्था के औपचारीकरण के उद्देश्य से 29 केंद्रीय कानूनों को समेकित करने का प्रयास करती हैं। ये एक प्रतिमान परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करती हैं, क्योंकि इनके माध्यम से पहली बार गिग, प्लेटफॉर्म और असंगठित श्रमिकों को विधायी संरक्षण प्रदान किया गया है, जो पूर्व में कानूनी दायरे से बाहर थे।

व्यावसायिक सुरक्षा पर प्रभाव (व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थितियाँ संहिता, 2020)

  • सार्वभौमिक कवरेज का दायरा: यह संहिता 10 या उससे अधिक श्रमिकों वाले सभी प्रतिष्ठानों पर सुरक्षा मानकों को लागू करती है, जिससे असंगठित क्षेत्र में कार्यरत लाखों श्रमिकों को संभावित लाभ प्राप्त होता है।
  • वार्षिक स्वास्थ्य जाँच: एक निश्चित आयु से अधिक कर्मचारियों के लिए निःशुल्क वार्षिक स्वास्थ्य परीक्षण अनिवार्य किया गया है, जिससे अनौपचारिक कार्यस्थलों में व्यावसायिक रोगों की पहचान और रोकथाम संभव होती है।
    • उदाहरण: यह संहिता खतरनाक कार्य परिवेश में श्रमिकों के लिए “स्वास्थ्य के अधिकार” को प्राथमिकता देती है।
  • लैंगिक तटस्थता के नियम: महिलाओं को अब सहमति के साथ रात्रिकालीन पाली में सभी प्रतिष्ठानों में कार्य करने की अनुमति दी गई है, जिससे सभी लिंगों के लिए सुरक्षा प्रोटोकॉल समान रूप से लागू होते हैं।

सामाजिक सुरक्षा पर प्रभाव (सामाजिक सुरक्षा संहिता)

  • गिग श्रमिकों की मान्यता: पहली बार गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को कानूनी परिभाषा प्रदान की गई है, जिससे वे जीवन और दिव्यांगता बीमा जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के पात्र बनते हैं।
    • उदाहरण: 50 करोड़ से अधिक असंगठित श्रमिकों के कल्याण हेतु एक पृथक “सामाजिक सुरक्षा कोष” का प्रावधान।
  • पोर्टेबल कल्याण लाभ: “एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड” की भावना को डिजिटल श्रम पोर्टल के माध्यम से प्रतिबिंबित किया गया है, जहाँ लाभों को आधार से जोड़ा गया है, जिससे प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
    • उदाहरण: 30 करोड़ से अधिक श्रमिक सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी प्रत्यक्ष लाभ अंतरण सुविधाओं तक पहुँच हेतु पंजीकृत।
  • राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड: असंगठित, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लिए कल्याणकारी योजनाओं की सिफारिश हेतु एक समर्पित बोर्ड का प्रावधान किया गया है।

संबद्ध चिंताएँ

  • उच्च पात्रता सीमाएँ: कई सुरक्षा प्रावधान केवल एक निश्चित आकार से बड़े प्रतिष्ठानों पर लागू होते हैं, जिससे अत्यंत छोटे “सूक्ष्म इकाइयाँ” इसके दायरे से बाहर रह जाती हैं।
    • उदाहरण: छोटे उद्यमों के बहिष्करण से सबसे अधिक संवेदनशील श्रमिक सुरक्षा जाल से वंचित रह जाते हैं।
  • डिजिटल विभाजन की बाधाएँ: डिजिटल पंजीकरण पर निर्भरता कम साक्षरता या सीमित इंटरनेट पहुँच वाले श्रमिकों के लिए कठिनाइयाँ उत्पन्न करती है।
    • उदाहरण: अनेक प्रवासी श्रमिक केंद्रीयकृत पोर्टल पर अपने विवरण को अद्यतन करने में असमर्थ रहते हैं।
  • निरीक्षण व्यवस्था का शिथिलीकरण: “निरीक्षकों” के स्थान पर “सुविधादाताओं” की व्यवस्था और वेब-आधारित निरीक्षण से नियोक्ताओं की जवाबदेही में कमी की आशंका व्यक्त की जाती है।

चिंताओं के समाधान के उपाय

  • समावेशी अवसंरचना: डिजिटल पंजीकरण और शिकायत निवारण में सहायता हेतु भौतिक “श्रमिक सुविधा केंद्रों” की स्थापना।
  • सीमाओं में कमी: राज्यों को अपने नियम निर्माण अधिकार का उपयोग कर सुरक्षा अनुपालन हेतु प्रतिष्ठान आकार की न्यूनतम सीमा घटानी चाहिए।
  • मज़बूत कोष प्रबंधन: सामाजिक उत्तरदायित्व और उपकर के माध्यम से सामाजिक सुरक्षा कोष के पर्याप्त वित्तपोषण को सुनिश्चित करना।

संघीय संरचना से जुड़ी चुनौतियाँ

  • केंद्रीकृत नियम निर्माण: संहिताएँ श्रमिक श्रेणियों और कल्याण शर्तों की परिभाषा में राज्यों को दरकिनार करते हुए केंद्र सरकार को व्यापक अधिकार प्रदान करती हैं।
  • राज्य स्वायत्तता का क्षरण: चूँकि “श्रम” समवर्ती सूची में है, इसलिए केंद्रीकृत पोर्टल और कोष कई बार राज्यों के मौजूदा कल्याण बोर्डों के साथ ओवरलैप करते हैं।
  • एकरूपता बनाम विविधता: संहिताएँ “सभी के लिए एक समान” मॉडल को लागू करती हैं, जो विभिन्न राज्यों की विशिष्ट औद्योगिक संरचनाओं और न्यूनतम वेतन क्षमताओं की अनदेखी करता है।

निष्कर्ष

श्रम संहिताएँ राज्यों को विशिष्ट “नियम” बनाने की अनुमति देकर संघवाद के सिद्धांत से सामंजस्य स्थापित करती हैं, किंतु एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म और मानकीकृत परिभाषाओं के माध्यम से केंद्रीकरण की ओर झुकाव भी दर्शाती हैं। यद्यपि ये असंगठित क्षेत्र के संरक्षण हेतु एक ऐतिहासिक अवसर प्रस्तुत करती हैं, परंतु इनकी सफलता सहयोगात्मक संघवाद पर निर्भर करती है, जहाँ केंद्र रूपरेखा प्रदान करे और राज्य स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करें।

Critically evaluate the impact of the new Labour Codes on the unorganised sector in India, with special reference to occupational safety and social security. To what extent do these codes challenge the federal structure of labour welfare administration? in hindi

Need help preparing for UPSC or State PSCs?

Connect with our experts to get free counselling & start preparing

Aiming for UPSC?

Download Our App

      
Quick Revise Now !
AVAILABLE FOR DOWNLOAD SOON
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध
Quick Revise Now !
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.