Q. भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2026 के मसौदे के प्रभावों का मूल्यांकन कीजिए। ये नियम श्रेया सिंघल मामले जैसे स्थापित न्यायिक उदाहरणों को किस प्रकार चुनौती देते हैं? (15 अंक, 250 शब्द)

April 28, 2026

GS Paper IIGovernance

प्रश्न की मुख्य माँग

  • सूचना प्रौद्योगिकी नियमावली, 2026 (प्रारूप) के प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
  • बताइए कि ये प्रारूप नियम किस प्रकार न्यायिक दृष्टांतों को चुनौती देते हैं।

उत्तर

भारत का डिजिटल सार्वजनिक मंच लोकतांत्रिक भागीदारी, असहमति और जवाबदेही को आकार देता है। सूचना प्रौद्योगिकी नियमावली, 2026 (प्रारूप) को लेकर यह चिंता व्यक्त की जा रही है कि कार्यपालिका-नियंत्रित सामग्री विनियमन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कमजोर कर सकता है और संवैधानिक न्यायशास्त्र द्वारा स्थापित न्यायिक सुरक्षा उपायों को क्षीण कर सकता है।

सूचना प्रौद्योगिकी नियमावली, 2026 (प्रारूप) के प्रभाव

  • कार्यपालिका का नियंत्रण: सरकार बिना पूर्व न्यायिक समीक्षा के सामग्री हटाने का आदेश दे सकती है, जिससे मनमाने सेंसरशिप की संभावना बढ़ जाती है।
    • उदाहरण: सरकारी नीतियों या कार्यों की आलोचना करने वाली टिप्पणियाँ बिना किसी न्यायालय आदेश या आपराधिक आरोप के हटाई जा सकती हैं।
  • भय का प्रभाव: खाते के निलंबन या छिपाने के डर से लोग आलोचना या व्यंग्य व्यक्त करने से बच सकते हैं।
  • मंच आधारित सेंसरशिप: प्लेटफॉर्म कानूनी दायित्व से बचने के लिए आवश्यक से अधिक सामग्री हटा सकते हैं।
    • उदाहरण: सोशल मीडिया कंपनियाँ नियमों के पालन हेतु वैध आलोचना भी हटा सकती हैं।
  • पारदर्शिता में कमी: सामग्री हटाने के कारण न बताए जाने से जवाबदेही कमजोर होती है और उपयोगकर्ताओं के चुनौती देने के अधिकार सीमित होते हैं।
    • उदाहरण: पोस्ट बिना किसी स्पष्टीकरण के हट सकती है और उपयोगकर्ताओं को कारण ज्ञात नहीं होता है।
  • लोकतांत्रिक कमजोरी: ऑनलाइन बहस के सीमित होने से जन भागीदारी और सूचित लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर पड़ता है।
    • उदाहरण: ईंधन मूल्य, बेरोजगारी या कल्याणकारी मुद्दों पर चर्चा एल्गोरिदमिक दमन के कारण कम हो सकती है।

प्रारूप सूचना प्रौद्योगिकी नियम न्यायिक दृष्टांतों को किस प्रकार चुनौती देते हैं?

  • न्यायिक निगरानी का कमजोर होना: प्रारूप नियम कार्यपालिका को बिना पूर्व न्यायिक समीक्षा के सामग्री हटाने की अनुमति देते हैं, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर न्यायिक नियंत्रण कमजोर होता है।
    • उदाहरण: श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि मध्यस्थ मुख्यतः न्यायालय के आदेश या वैध कानूनी निर्देश पर ही कार्रवाई करें।
  • अस्पष्ट आधार: प्रारूप नियमों में व्यापक और अस्पष्ट श्रेणियाँ मनमानी सेंसरशिप को बढ़ावा दे सकती हैं, जो अनुच्छेद-19(2) की सीमाओं से परे है।
    • उदाहरण: श्रेया सिंघल मामला में धारा 66A को इसलिए निरस्त किया गया क्योंकि “आपत्तिजनक” जैसे अस्पष्ट शब्दों का दुरुपयोग हो रहा था।
  • विधिक प्रक्रिया का ह्रास: बिना उचित सूचना, सुनवाई या अपील के सामग्री हटाई जा सकती है, जिससे प्रक्रियात्मक न्याय कमजोर होता है।
    • उदाहरण: मेनका गांधी बनाम भारत संघ में न्यायालय ने कहा कि कोई भी प्रतिबंध न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत प्रक्रिया का पालन करे।
  • असंगत कार्रवाई: व्यापक और पूर्व-निवारक हटाने की शक्तियाँ वैध अभिव्यक्ति पर भी अत्यधिक प्रतिबंध लगा सकती हैं।
    • उदाहरण: के. एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ वाद में राज्य की कार्रवाई को आवश्यकता और आनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरना आवश्यक बताया गया।
  • प्रेस स्वतंत्रता का ह्रास: अधिक नियंत्रण और सेंसरशिप से नागरिकों की सूचना तक पहुँच और लोकतांत्रिक विमर्श प्रभावित होता है।
    • उदाहरण: बेनेट कोलमैन एंड कंपनी बनाम भारत संघ में न्यायालय ने कहा कि मीडिया की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध, जनता के जानने के अधिकार को प्रभावित करता है।

निष्कर्ष

हानिकारक ऑनलाइन सामग्री का विनियमन आवश्यक है, लेकिन लोकतांत्रिक वैधता के लिए न्यायिक निगरानी, पारदर्शिता और विधिक प्रक्रिया अनिवार्य हैं। डिजिटल शासन ऐसा होना चाहिए, जो नागरिकों को हानि से बचाए, परंतु भारत के ऑनलाइन सार्वजनिक मंच को मौन सेंसरशिप के क्षेत्र में परिवर्तित न करे।

Evaluate the implications of the Draft Information Technology Rules, 2026 on Freedom of Speech and Expression in India. How do these rules challenge established judicial precedents like the Shreya Singhal case? in hindi

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