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Q. भारत-फ्रांस की विकसित होती रणनीतिक साझेदारी भारत की भू-राजनीतिक दृष्टिकोण में 'बहुध्रुवीय पश्चिम' की ओर व्यापक बदलाव को दर्शाती है। हालिया द्विपक्षीय घटनाक्रमों और वैश्विक शासन में 'तीसरे मार्ग' की खोज के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

February 19, 2026

GS Paper IIInternational Relations

प्रश्न की मुख्य माँग

  • बताइए कि ‘बहुध्रुवीय पश्चिम’ की ओर परिवर्तन का क्या अर्थ है।
  • वैश्विक शासन में ‘थर्ड वे’ की खोज का उल्लेख कीजिए।
  • ‘बहुध्रुवीय पश्चिम’ और ‘थर्ड वे’ को साकार करने में आने वाली चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।

उत्तर

भारत और फ्राँस के बीच गहराती साझेदारी केवल द्विपक्षीय सौहार्द का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह भारत के वैश्विक दृष्टिकोण में एक महत्त्वपूर्ण पुनर्संतुलन को दर्शाती है। एक भू-राजनीतिक रूप से मुखर यूरोप के साथ सक्रिय जुड़ाव के माध्यम से नई दिल्ली ‘बहुध्रुवीय पश्चिम’ की अवधारणा को आकार दे रही है तथा अमेरिका–चीन प्रतिद्वंद्विता के बीच एक नियामक ‘तीसरे मार्ग’ की वकालत कर रही है।

‘बहुध्रुवीय पश्चिम’ की ओर परिवर्तन

  • यूरोप एक स्वतंत्र सामरिक ध्रुव के रूप में: भारत अब पश्चिम को केवल वाशिंगटन-नेतृत्व वाले एकसमान समूह के रूप में नहीं देखता, बल्कि यूरोप को एक स्वायत्त रणनीतिक शक्ति के रूप में मान्यता देता है।
    • उदाहरण: Horizon 2047 ढाँचे के अंतर्गत भारत–फ्राँस सहयोग में वृद्धि।
  • रक्षा औद्योगिक साझेदारी: खरीदार–विक्रेता मॉडल से आगे बढ़कर सह-विकास और सह-निर्माण की दिशा में कदम।
    • उदाहरण: दसॉल्ट राफेल बेड़े का विस्तार और संयुक्त जेट-इंजन सहयोग की योजनाएँ।
  • हिंद-प्रशांत में समन्वय: साझा समुद्री सुरक्षा हित भारत के सामरिक विकल्पों को विस्तृत करते हैं।
    • उदाहरण: अमेरिका-केंद्रित गठबंधनों से इतर हिंद-प्रशांत में समन्वित उपस्थिति।
  • सामरिक स्वायत्तता में समानता: यूरोपीय “सामरिक स्वायत्तता ” की फ्राँसीसी अवधारणा भारत की परंपरागत विदेश नीति से मेल खाती है।
    • उदाहरण: विविधीकृत आपूर्ति शृंखलाओं और रक्षा आत्मनिर्भरता का समर्थन।
  • फ्राँस से परे यूरोप की ओर झुकाव: भारत का यूरोप के साथ व्यापक संपर्क उसकी प्रणालीगत पुनर्संरचना को दर्शाता है।
    • उदाहरण: यूरोपीय संघ नेतृत्व के साथ सक्रिय संवाद और भारत-यूरोपीय संघ आर्थिक संबंधों का विस्तार।

वैश्विक शासन में ‘तीसरे मार्ग’ की खोज

  • AI शासन में संतुलित दृष्टिकोण: अमेरिकी कॉरपोरेट वर्चस्व और चीनी राज्य-नियंत्रण दोनों का अस्वीकार है।
    • उदाहरण: AI इंपैक्ट समिट में संतुलित नियामक ढाँचे के पक्ष में संयुक्त पहल।
  • नियम-निर्माण में सक्रिय भूमिका (Norm Entrepreneurship): वैश्विक नियमों को केवल स्वीकार करने के बजाय उन्हें आकार देने का प्रयास।
    • उदाहरण: संप्रभुता-सम्मत किंतु नवाचार-अनुकूल AI मानकों की वकालत।
  • प्रौद्योगिकी साझेदारियों का विविधीकरण: एकल शक्ति केंद्रों पर निर्भरता कम करना।
  • रणनीतिक कूटनीतिक क्षेत्रों का विस्तार: ‘बहुध्रुवीय पश्चिम’ भारत के कूटनीतिक विकल्पों को बढ़ाता है।
  • विभाजनों के पार गठबंधन-निर्माण: पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण के द्वंद्वों को पार करते हुए साझेदारी का निर्माण।
    • उदाहरण: फ्राँस द्वारा भारत के व्यापक यूरोपीय जुड़ाव को प्रोत्साहन।

‘बहुध्रुवीय पश्चिम’ और ‘तीसरे मार्ग’ को साकार करने की चुनौतियाँ

  • अमेरिका–चीन का संरचनात्मक प्रभुत्व: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रक्षा प्रौद्योगिकी तथा वैश्विक पूँजी प्रवाह अभी भी दो महाशक्तियों के हाथों में केंद्रित हैं।
    • उदाहरण: वैश्विक AI अवसंरचना पर अमेरिकी तकनीकी कंपनियों का वर्चस्व।
  • यूरोप की आंतरिक विखंडनशीलता: यूरोपीय संघ के भीतर सदस्य देशों के परस्पर भिन्न हित सामूहिक और सुसंगत नीति-निर्माण को सीमित कर सकते हैं।
    • उदाहरण: सुरक्षा और व्यापार नीति के प्रश्नों पर विभिन्न यूरोपीय देशों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ।
  • महाशक्तियों की तुलना में सीमित आर्थिक पैमाना: भारत और फ्राँस की संयुक्त आर्थिक क्षमता अमेरिका–चीन जैसे देशों की तुलना में अपेक्षाकृत कम है।
    • उदाहरण: उन्नत सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकी में वित्तीय निवेश और अनुसंधान व्यय की असमानताएँ।
  • भू-राजनीतिक दबाव: अमेरिका के साथ सामरिक साझेदारी को बनाए रखते हुए यूरोपीय स्वायत्तता को गहरा करना अत्यंत सूक्ष्म कूटनीतिक संतुलन की माँग करता है।
    • उदाहरण: NATO भागीदारों के साथ रक्षा पारस्परिकता सुनिश्चित करते हुए स्वतंत्र ढाँचों में सहयोग।
  • कार्यान्वयन संबंधी अंतराल: रणनीतिक दृष्टि को ठोस औद्योगिक और तकनीकी क्षमता में रूपांतरित करना समयसाध्य और संसाधन-प्रधान प्रक्रिया है।
    • उदाहरण: स्वदेशी जेट-इंजन सहयोग अभी पूर्ण परिचालन परिपक्वता तक नहीं पहुँचा है।

निष्कर्ष

फ्राँस के साथ भारत का बढ़ता जुड़ाव एक ध्रुवीकृत विश्व में अपने रणनीतिक विकल्पों को विस्तृत करने का यथार्थवादी प्रयास है। ‘बहुध्रुवीय पश्चिम’ को स्थायी बनाने हेतु गहन तकनीकी सह-विकास, सुदृढ़ यूरोपीय संघ समन्वय तथा संतुलित अमेरिकी सहभागिता आवश्यक है, जिससे सामरिक स्वायत्तता सुरक्षित रखते हुए एक अधिक न्यायसंगत और नवाचार-आधारित वैशिक व्यवस्था का निर्माण संभव हो सके।

The evolving India-France strategic partnership reflects a broader shift in New Delhi’s geopolitical imagination towards a ‘multipolar West’. Analyze this statement in the context of recent bilateral developments and the pursuit of a ‘Third Way’ in global governance. in hindi

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