Q. आगामी जनगणना विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियों (DNT/NT) के ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहने की समस्या के समाधान का एक अवसर प्रस्तुत करती है। उनकी पहचान और समावेशन में आने वाली चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए और उन्हें नीतिगत ढाँचों में प्रभावी ढंग से एकीकृत करने के उपाय सुझाएँ। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • पहचान संबंधी चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।
  • समावेशन संबंधी चुनौतियों की चर्चा कीजिए।
  • एकीकरण के उपाय सुझाइए।

उत्तर

आगामी जनगणना विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियों की ऐतिहासिक अदृश्यता को दूर करने का एक महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है जिससे शासन में उनकी उचित पहचान सुनिश्चित हो सके और साक्ष्य-आधारित नीतिनिर्माण के माध्यम से वास्तविक सामाजिक न्याय को आगे बढ़ाया जा सके।

मुख्य भाग

पहचान संबंधी चुनौतियाँ

  • श्रेणीगत भ्रम: विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदाय अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग की सूचियों में बिखरे हुए हैं या कई अब भी असूचीबद्ध हैं, जिससे एकसमान पहचान कठिन हो जाती है।
    • उदाहरण: एक ही समुदाय विभिन्न राज्यों में अलग-अलग श्रेणियों में वर्गीकृत है, जबकि कई कहीं सूचीबद्ध ही नहीं हैं।
  • घुमंतू जीवन शैली: इनका निरंतर गतिशील जीवन पारंपरिक स्थायी गृह-आधारित सर्वेक्षणों के माध्यम से गणना को कठिन बनाता है।
    • उदाहरण: बंजारा, गाड़िया लोहार जैसे समूह लगातार स्थान बदलते रहते हैं जिससे वे जनगणना में शामिल नहीं हो पाते।
  • आँकड़ों का अभाव: विश्वसनीय जनसंख्या आँकड़ों की कमी के कारण नीतिगत उपेक्षा और लक्षित योजनाओं की कमजोरी देखी जाती है।
    • उदाहरण: इनकी जनसंख्या के अनुमान 8 से 14 करोड़ के बीच भिन्न हैं, परंतु कोई आधिकारिक जनगणना आँकड़ा उपलब्ध नहीं है।
  • सामाजिक अदृश्यता: समाज में सीमित जागरूकता के कारण ये समुदाय मुख्यधारा के विमर्श और नीतिगत प्राथमिकताओं से बाहर रह जाते हैं।
    • उदाहरण: सपेरा, कालबेलिया और बिरहोर जैसे समुदायों के बारे में अधिकांश लोग अनभिज्ञ हैं।
  • औपनिवेशिक विरासत: ऐतिहासिक कलंक आज भी उनकी पहचान और राज्य के प्रति विश्वास को प्रभावित करता है।
    • उदाहरण: 1871 के आपराधिक जनजाति अधिनियम ने इन्हें “अपराधी” घोषित किया था  जिसका प्रभाव आज भी बना हुआ है।

समावेशन संबंधी चुनौतियाँ

  • नीतिगत उपेक्षा: स्पष्ट पहचान के अभाव में लक्षित योजनाओं की कमी रहती है।
  • संस्थागत कमी: विभिन्न मंत्रालयों के बीच बिखरी जिम्मेदारियों के कारण प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पाता है।
    • उदाहरण: विमुक्त और घुमंतू समुदायों के कल्याण के लिए कोई एकल नोडल निकाय नहीं है।
  • लाभ से वंचना: उचित वर्गीकरण के अभाव में कई समुदाय अनुसूचित जाति/जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग के लाभों से वंचित रह जाते हैं।
  • दस्तावेजीकरण की समस्या: पहचान और निवास प्रमाण के अभाव में ये समुदाय कल्याणकारी योजनाओं तक पहुँच नहीं बना पाते हैं।
    • उदाहरण: घुमंतू समूहों को आधार और राशन कार्ड से जुड़ने में कठिनाई होती है।
  • राजनीतिक उदासीनता: सीमित मतदाता प्रभाव के कारण राजनीतिक प्राथमिकता कम मिलती है।
    • उदाहरण: जनगणना 2027 में इनके समावेशन को लेकर अब भी अनिश्चितता बनी हुई है।

एकीकरण के उपाय

  • जनगणना में समावेशन: सटीक गणना के लिए जनगणना में विमुक्त और घुमंतू समुदायों हेतु अलग श्रेणी/स्तंभ शामिल किया जाए।
    • उदाहरण: जनगणना 2027 के लिए विमुक्त-घुमंतू महासंघ द्वारा यह माँग उठाई गई है।
  • स्पष्ट वर्गीकरण: इदाते आयोग की सिफारिशों के अनुसार, इन समुदायों के लिए एक अलग संवैधानिक या वैधानिक श्रेणी बनाई जाए।
  • उपलब्ध आँकड़ों का उपयोग: पहचान और नीतिनिर्माण के लिए पहले से उपलब्ध रिपोर्टों और आँकड़ों का उपयोग किया जाए।
    • उदाहरण: रेंके आयोग ने इनकी जनसंख्या लगभग 10.74 करोड़ बताई है।
  • लक्षित योजनाएँ: आजीविका, शिक्षा और आवास की आवश्यकताओं के अनुरूप विशेष कल्याणकारी कार्यक्रम विकसित किए जाएँ।
  • संस्थागत तंत्र: निगरानी और नीतिगत समन्वय के लिए एक समर्पित प्राधिकरण की स्थापना की जाए।

निष्कर्ष

यदि जनगणना केवल गणना तक सीमित न रहकर अदृश्य समुदायों की पहचान सुनिश्चित करे, तो यह विमुक्त और घुमंतू समुदायों को विकास के भागीदार बना सकती है। गतिशीलता को हाशिए पर रहने का कारण नहीं बनना चाहिए, बल्कि यह गरिमा, अधिकार और समावेशन सुनिश्चित करने का आधार बनना चाहिए, ताकि ये समुदाय भारत की विकसित होती शासन व्यवस्था में पूर्ण रूप से शामिल हो सकें।

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