प्रश्न की मुख्य माँग
- ‘भारत-यूरोप’ रणनीतिक ढाँचा
- इस ढाँचे से जुड़ी समस्याएँ
- गहन साझेदारी के संभावित परिणाम।
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उत्तर
जनवरी 2026 में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की भारत यात्रा, पदभार ग्रहण करने के बाद उनकी पहली एशियाई यात्रा, बर्लिन की रणनीति में एक मौलिक परिवर्तन का प्रतीक है। जर्मनी “चीन प्लस एक्स” नीति का अनुसरण कर रहा है, ऐसे में यह यात्रा सामान्य कूटनीति से कहीं बढ़कर है, जो भारत को एक नए, बहुध्रुवीय “भारत-यूरोप” रणनीतिक ढाँचे के केंद्रबिंदु के रूप में स्थापित करती है।
‘भारत-यूरोप’ रणनीतिक ढाँचा
- एक नई रणनीतिक भौगोलिक संरचना: ‘भारत-यूरोप’ सहयोग वैश्विक अनिश्चितता से निपटने के लिए भारत और यूरोप की सुरक्षा तथा आर्थिक संरचनाओं को एक एकीकृत, सुसंगत ढाँचे में जोड़ने का प्रयास करता है।
- उदाहरण: दोनों देशों के मध्य वार्ता में एक ऐसी “नई रणनीतिक संरचना” की रूपरेखा तैयार करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जो दोनों शक्तियों को अमेरिका और चीन पर अपनी निर्भरता को संतुलित करने में सक्षम बनाए।
- वैश्विक शक्ति संतुलन: यह ढाँचा मध्य शक्तियों को अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता और रूस-चीन गठबंधन के बीच रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए एक “मध्यमार्गी विकल्प” प्रदान करता है।
- उदाहरण: न तो भारत और न ही यूरोप चीनी आक्रामकता से निपटने के लिए पूरी तरह से अमेरिका पर निर्भर रहना चाहता है, जिसके कारण यह द्विपक्षीय “संतुलन” रणनीति अपनाई गई है।
- आपूर्ति शृंखला वैविध्य और जोखिम में कमी: यह प्रणालीगत प्रतिद्वंद्वियों पर महत्त्वपूर्ण निर्भरता को कम करने के लिए “लचीली आपूर्ति शृंखलाओं” और विश्वसनीय प्रौद्योगिकी साझेदारियों के निर्माण पर केंद्रित है।
- उदाहरण: दोनों नेताओं ने अर्द्धचालकों और महत्त्वपूर्ण खनिजों को इस भारत-यूरोपीय लचीले ढाँचे के “नए आधार” के रूप में रेखांकित किया।
- कूटनीति के रूप में संपर्क: यह ढाँचा आईएमईसी कॉरिडोर जैसी अवसंरचना को दोनों क्षेत्रों के मध्य पारदर्शी और टिकाऊ संपर्क के लिए एक रणनीतिक उपकरण के रूप में देखता है।
- उदाहरण: भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर (आईएमईसी) के लिए साझा समर्थन वैकल्पिक व्यापार मार्गों के निर्माण पर सहमति को दर्शाता है।
इस ढाँचे से जुड़ी समस्याएँ
- खतरे को लेकर अलग-अलग धारणाएँ: जहाँ यूरोप रूस को तात्कालिक प्राथमिक सुरक्षा खतरा मानता है, वहीं भारत रूस को चीन के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक कवच के रूप में देखता है।
- उदाहरण: यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में भारत की तथाकथित “तटस्थता” तथा रूसी ऊर्जा और हथियारों पर उसकी निरंतर निर्भरता को लेकर यूरोप और भारत के बीच मतभेद और तनाव स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं।
- नियामक और मानक अंतर: यूरोपीय संघ द्वारा मानक मानदंडों (पर्यावरण, श्रम, मानवाधिकार) पर जोर देना अक्सर भारत की विकासात्मक प्राथमिकताओं और नीतिगत लचीलेपन के मध्य संघर्ष को चिह्नित करता है।
- उदाहरण: भारत यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) को उभरती अर्थव्यवस्थाओं को दंडित करने वाला एक “संरक्षणवादी उपकरण” मानता है।
- असममित आर्थिक अपेक्षाएँ: जर्मनी डेयरी और ऑटोमोबाइल में व्यापक बाजार पहुँच चाहता है, जबकि भारत “किफायती जेनेरिक दवाओं” को प्राथमिकता देता है और कठोर बौद्धिक संपदा अधिकार मानदंडों का विरोध करता है।
- उदाहरण: इन “बुनियादी मतभेदों” के कारण भारत-यूरोप मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर बातचीत वर्षों से बाधित है।
- संस्थागत जटिलता: यूरोपीय संघ की निर्णय लेने की प्रक्रिया “भूलभुलैया जैसी” है, जो अक्सर भारत को द्विपक्षीय संबंधों की ओर धकेलती है।
- उदाहरण: ब्रुसेल्स में “नौकरशाही विखंडन” और संस्थागत जिम्मेदारियों के अतिव्यापी होने के कारण अतीत में भी पहलें अक्सर ठप हो गई हैं।
गहन साझेदारी के संभावित परिणाम
- रक्षा औद्योगिक आधुनिकीकरण: सुरक्षा प्रदाता के रूप में जर्मनी के उभरने से भारत को उच्च-तकनीकी सह-विकास का अवसर मिल रहा है, जिससे रूस पर निर्भरता कम हो रही है।
- उदाहरण: थिसनक्रुप से अगली पीढ़ी की छह पनडुब्बियों के लिए संभावित 8 अरब डॉलर के सौदे में “मेक इन इंडिया” के तहत ईंधन सेल प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण शामिल है।
- आर्थिक उत्प्रेरक (मुक्त व्यापार समझौता): आगामी भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में संभावित रूप से घोषित होने वाला एक सफल मुक्त व्यापार समझौता, भारत को यूरोपीय संघ के निर्यात में 50% से अधिक की वृद्धि कर सकता है।
- उदाहरण: चांसलर मर्ज ने सुझाव दिया कि 90% वस्तुओं पर शुल्क समाप्त करने के लिए यह समझौता जनवरी 2026 के अंत तक हस्ताक्षरित किया जा सकता है।
- सेमीकंडक्टर और डिजिटल नेतृत्व: एआई, 6जी और सेमीकंडक्टर में सहयोगात्मक प्रयास भारत को वैश्विक उच्च-तकनीकी विनिर्माण केंद्र में एकीकृत करेंगे।
- उदाहरण: सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र पर संयुक्त घोषणा का उद्देश्य भविष्य की प्रौद्योगिकियों के लिए एक विश्वसनीय मूल्य शृंखला का निर्माण करना है।
- कुशल प्रवासन और गतिशीलता: भारतीय पेशेवरों का व्यवस्थित प्रवासन जर्मनी में श्रम की कमी को दूर करने के साथ-साथ भारत की मानव पूँजी को भी बढ़ाएगा।
- उदाहरण: जर्मनी में भारतीयों की संख्या वर्ष 2025 तक तीन गुना बढ़कर 2,80,000 हो गई है और नए वीजा-मुक्त पारगमन सुविधाओं ने पेशेवर यात्रा को आसान बना दिया है।
निष्कर्ष
भारत-जर्मनी साझेदारी अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं है; यह एक ऐसे विश्व का प्रबंधन करने की क्षमता विकसित करने से जुड़ी है, जहाँ कोई नियम-कानून नहीं हैं। पनडुब्बी समझौते और मुक्त व्यापार समझौते के माध्यम से ‘भारत-यूरोप’ ढाँचे को क्रियान्वित करके, दोनों राष्ट्र केवल नियमों का पालन करने वाले देश से नियम-निर्माता देश बन सकते हैं। यह साझेदारी एक संतुलित, बहुध्रुवीय व्यवस्था के लिए आवश्यक है, जहाँ पारस्परिक आर्थिक और सुरक्षा संबंधी मजबूती के माध्यम से रणनीतिक स्वायत्तता संरक्षित रहे।
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