Q. भारत में न्यायिक लंबितता (Judicial Pendency) न केवल न्यायाधीशों की कमी का परिणाम है, बल्कि अपर्याप्त न्यायिक बुनियादी ढाँचे का भी परिणाम है। 'न्यायिक स्लमकरण' (Judicial Slumisation) की अवधारणा का परीक्षण कीजिए और बेहतर न्याय वितरण के लिए न्यायालय परिसरों की पुनर्कल्पना हेतु उपाय सुझाएँ। (15 अंक, 250 शब्द)

April 14, 2026

GS Paper IIIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग

  • जुडिशियल स्लमाइजेशन (न्यायिक अवसंरचना का क्षरण) के बारे में बताइए।
  • अवसंरचना–विलंब संबंध को स्पष्ट कीजिए।
  • न्यायालयों की पुनर्कल्पना हेतु उपाय सुझाइए।

उत्तर

भारत में न्यायिक लंबित मामलों की समस्या केवल न्यायाधीशों की कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि यह अवसंरचनात्मक कमियों को भी दर्शाती है। ‘जुडिशियल स्लमाइजेशन (न्यायिक अवसंरचना का क्षरण)’ की अवधारणा इस बात को रेखांकित करती है कि अपर्याप्त और अव्यवस्थित न्यायालय परिसर न्यायिक दक्षता को बाधित करते हैं और न्याय वितरण में विलंब का कारण बनते हैं।

जुडिशियल स्लमाइजेशन (न्यायिक अवसंरचना का क्षरण)

  • स्थानिक भीड़भाड़: अत्यधिक भीड़भाड़ वाले गलियारे और न्यायालय कक्ष कार्यक्षमता को कम करते हैं।
  • दोषपूर्ण ध्वनि व्यवस्था: भरे हुए न्यायालय कक्षों में वकीलों को न्यायाधीशों की बात सुनने में कठिनाई होती है, जिससे उन्हें ऊँची आवाज में बोलना पड़ता है।
  • अव्यवस्थित विस्तार: बिना योजना के विस्तार से अव्यवस्थित अवसंरचना विकसित होती है।
    • उदाहरण: लंबित मामलों के बढ़ने के कारण पुराने न्यायालय परिसरों में बिना वास्तु योजना के क्रमिक संशोधन।
  • उपयोगकर्ता की असुविधा : खराब भौतिक वातावरण से वादियों का विश्वास कम होता है।
    • उदाहरण: बुनियादी सुविधाओं की कमी और संकुचित प्रतीक्षालय।
  • बहिष्करणीय डिजाइन: समावेशी सुविधाओं के अभाव में न्याय तक पहुँच सीमित होती है।
    • उदाहरण: मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के प्रावधानों के बावजूद कई उच्च न्यायालयों में क्रेच सुविधाओं का अभाव।

अवसंरचना–विलंब संबंध

  • आवागमन में देरी: एक ही परिसर में विभिन्न न्यायालय कक्षों के बीच दूरी और भीड़भाड़ के कारण वकील कई मामलों में समय पर उपस्थित नहीं हो पाते हैं।
  • स्थगन की प्रवृत्ति: समन्वय की कमी के कारण मामलों में बार-बार स्थगन होता है।
    • उदाहरण: “पास-ओवर” और प्रॉक्सी उपस्थिति से कार्यसूची बाधित होती है।
  • न्यायालयी कार्यसूची में बाधा: स्थानिक समन्वय के अभाव में क्रमबद्ध सूची प्रणाली प्रभावी नहीं रह पाती है।
  • पहुँच में बाधाएँ: भीड़भाड़ वाली पार्किंग और प्रवेश अवरोध न्यायालय तक समय पर पहुँच को प्रभावित करते हैं।
  • प्रशासनिक अक्षमता: खराब संरचना से रजिस्ट्री और कर्मचारियों के कार्य में बाधा आती है।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय केस प्रबंधन प्रणाली 2024 के अनुसार, अवसंरचना न्यायिक प्रक्रिया की दक्षता को प्रभावित करती है।

न्यायालयों का पुनर्कल्पना

  • एकीकृत परिसर: एक ही स्थान पर स्थित न्यायालय बेहतर समन्वय सुनिश्चित करते हैं, जिसे देरी में कमी आती है।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय केस प्रबंधन प्रणाली 2024 (NCMS) एकीकृत अवसंरचना योजना पर बल देती है।
  • उपयोगकर्ता-केंद्रित डिजाइन: अवसंरचना को सभी हितधारकों की आवश्यकताओं के अनुसार विकसित किया जाना चाहिए।
    • उदाहरण: दक्षिण अफ्रीका का संवैधानिक न्यायालय नागरिक-केंद्रित डिजाइन का उदाहरण है।
  • समावेशी पहुँच: कमजोर वर्गों के लिए सुलभता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
    • उदाहरण: बाधारहित पहुँच और क्रेच सुविधाओं का प्रावधान।
  • डिज़ाइन मानक: एकरूप वास्तुशिल्प दिशा-निर्देश विकसित किए जाने चाहिए।
    • उदाहरण: अमेरिका (न्यू डील युग) और जापान के न्यायालय डिजाइन ढाँचे।
  • विशेषज्ञ योजना: न्यायालयों के डिजाइन में वास्तुकारों और योजना विशेषज्ञों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

निष्कर्ष

न्यायिक लंबित मामलों की समस्या के समाधान के लिए मानव संसाधन और भौतिक अवसंरचना दोनों में सुधार आवश्यक है। ‘जुडिशियल स्लमाइजेशन’ को समाप्त कर सुनियोजित, समावेशी और कुशल न्यायालय अवसंरचना विकसित करना आवश्यक है, जिससे मामलों के निपटान, न्याय तक पहुँच और न्याय प्रणाली में जनविश्वास को सुदृढ़ किया जा सके।

Judicial pendency in India is not merely a function of judge shortage but also of inadequate court infrastructure. Examine the concept of ‘Judicial Slumisation’ and suggest measures to reimagine court complexes for better justice delivery. in hindi

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