Q. अनुसूचित जाति (SC) के दर्जे को विशिष्ट धर्मों तक सीमित रखने के संवैधानिक और सामाजिक निहितार्थों का परीक्षण कीजिए। क्या यह सामाजिक न्याय और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच पर्याप्त संतुलन बनाता है? (10 अंक, 150 शब्द)

March 30, 2026

GS Paper IIIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग

  • संवैधानिक और सामाजिक प्रभावों का परीक्षण कीजिए।
  • सामाजिक न्याय एवं धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन के उपाय सुझाइए।
  • संतुलन स्थापित करने में चुनौतियों के रेखांकित कीजिए।

उत्तर

भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुसूचित जाति की स्थिति पर धर्म आधारित सीमाओं की पुष्टि करने वाले हालिया फैसले से संवैधानिक नैतिकता, सामाजिक न्याय और क्या पहचान से जुड़े लाभ, धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी के साथ सह-अस्तित्व में रह सकते हैं, जैसे गंभीर प्रश्न उठते हैं।

संवैधानिक और सामाजिक प्रभाव

  • धर्म आधारित प्रतिबंध: अनुसूचित जाति का दर्जा संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत कुछ विशेष धर्मों तक सीमित है, जिससे धर्म पात्रता का निर्णायक आधार बन जाता है।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि ईसाई धर्म में परिवर्तन करने पर अनुसूचित जाति का दर्जा तत्काल समाप्त हो जाता है।
  • समानता की चिंता: धर्म के आधार पर भिन्न व्यवहार अनुच्छेद-14 के तहत समानता के सिद्धांत पर प्रश्न उठाता है, क्योंकि समान स्थिति वाले व्यक्तियों के साथ असमान व्यवहार होता है।
    • उदाहरण: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि दलित ईसाई भी जातिगत भेदभाव का सामना करते हैं, परंतु उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलता।
  • धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रभाव: कल्याणकारी लाभों को धार्मिक पहचान से जोड़ना अनुच्छेद-25 के अंतर्गत धार्मिक स्वतंत्रता के प्रयोग को अप्रत्यक्ष रूप से सीमित करता है।
  • लगातार बहिष्करण: धर्मांतरण के बाद भी व्यक्ति जातिगत भेदभाव का सामना करते रहते हैं, लेकिन वैधानिक सुरक्षा और संरक्षण से वंचित हो जाते हैं।
    • उदाहरण: धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत सुरक्षा समाप्त हो जाती है।
  • पहचान का द्वंद्व: व्यक्तियों को धार्मिक आस्था और आरक्षण जैसे सकारात्मक भेदभाव के लाभों के मध्य चयन के लिए विवश होना पड़ता है।
    • उदाहरण: ईसाई धर्म अपनाने वाले दलितों को शिक्षा, रोजगार और कल्याणकारी योजनाओं में आरक्षण का लाभ खोने का जोखिम होता है।
  • सामाजिक विखंडन: इससे दलित समुदायों के भीतर धार्मिक आधार पर विभाजन उत्पन्न होता है, जो आंतरिक असमानता को और बढ़ाता है।

सामाजिक न्याय एवं धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन के उपाय

  • लक्षित न्याय: ऐतिहासिक रूप से वंचित जाति समूहों तक लाभ सीमित रखकर केंद्रित उत्थान सुनिश्चित किया जाता है।
    • उदाहरण: अनुसूचित जाति का दर्जा हिंदू सामाजिक संरचना में निहित जातिगत वंचनाओं से जुड़ा है।
  • दुरुपयोग की रोकथाम: दोहरे लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से किए जाने वाले रणनीतिक धर्मांतरण को रोकता है।
  • संवैधानिक वैधता: यह अनुच्छेद-341 के अंतर्गत राष्ट्रपति आदेश पर आधारित है, जिससे इसे कानूनी मान्यता प्राप्त है।
    • उदाहरण: संसद द्वारा संशोधन कर सिख और बौद्ध धर्म को इसमें शामिल किया गया।
  • सामाजिक आधार परीक्षण: यह जाति-आधारित और जनजाति-आधारित पहचान में अंतर करता है (अनुसूचित जनजाति पर धर्म संबंधी कोई प्रतिबंध नहीं है)।
  • सीमित संतुलन: यह व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता की तुलना में जाति-आधारित सामाजिक न्याय को प्राथमिकता देता है।

संतुलन स्थापित करने में चुनौतियाँ

  • निरंतर भेदभाव: जातिगत कलंक अक्सर धर्म परिवर्तन के बाद भी बना रहता है।
    • उदाहरण: सरकारी आयोगों के अध्ययन दर्शाते हैं कि ईसाई और मुस्लिम समुदायों में भी जाति प्रथाएँ विद्यमान हैं।
  • संवैधानिक तनाव: अनुच्छेद-14, 15 और 25 के मध्य टकराव यह दर्शाता है कि समानता और धर्म-आधारित वर्गीकरण के बीच विवाद बना हुआ है।
  • परिवर्तित सामाजिक वास्तविकता: जाति की सामाजिक वास्तविकताएँ अब हिंदू ढाँचे से परे भी विस्तृत हो चुकी हैं।
    • उदाहरण: दलित ईसाइयों और मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की माँग।
  • नीतिगत असंगति: अनुसूचित जनजातियों पर धर्म संबंधी कोई प्रतिबंध नहीं है, जबकि अनुसूचित जातियों पर है।
  • लंबित समीक्षा: यह मुद्दा आयोगों और न्यायपालिका के समक्ष विचाराधीन है।
    • उदाहरण: के.जी. बालकृष्णन की अध्यक्षता में गठित आयोग दलित धर्मांतरितों को शामिल करने पर रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा।

निष्कर्ष

यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय लक्षित जाति-आधारित सामाजिक न्याय की संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखता है, फिर भी बदलती सामाजिक वास्तविकताओं के संदर्भ में समानता, गरिमा और धार्मिक स्वतंत्रता के मध्य संतुलन स्थापित करने हेतु अधिक सूक्ष्म और साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

Examine the constitutional and social implications of restricting SC status to specific religions. Does it adequately balance social justice with religious freedom? in hindi

Explore UPSC Foundation Course

Need help preparing for UPSC or State PSCs?

Connect with our experts to get free counselling & start preparing

Aiming for UPSC?

Download Our App

      
Quick Revise Now !
AVAILABLE FOR DOWNLOAD SOON
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध
Quick Revise Now !
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.