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Q. भारत में न्यायिक स्वतंत्रता के संवैधानिक महत्त्व का परीक्षण कीजिए। क्या न्यायपालिका की अकादमिक आलोचना संस्थागत संवेदनशीलता के अधीन होनी चाहिए? (15 अंक, 250 शब्द)

February 27, 2026

GS Paper IIIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भारत में न्यायिक स्वतंत्रता का संवैधानिक महत्त्व समझाइए।
  • बताइए कि शैक्षणिक आलोचना को संस्थागत संवेदनशीलताओं के अधीन क्यों होना चाहिए।
  • वर्णन कीजिए कि शैक्षणिक आलोचना को संस्थागत संवेदनशीलताओं के अधीन क्यों नहीं होना चाहिए।

उत्तर

न्यायिक स्वतंत्रता भारत में संवैधानिक लोकतंत्र की आधारशिला है। हाल ही में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद द्वारा प्रकाशित एक विद्यालयी पाठ्यपुस्तक के संबंध में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप ने संस्थागत गरिमा की रक्षा और शैक्षणिक आलोचना की स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर पुनः बहस को जीवित कर दिया है।

भारत में न्यायिक स्वतंत्रता का संवैधानिक महत्त्व

  • मूल संरचना की सुरक्षा: न्यायिक स्वतंत्रता, संविधान की मूल संरचना सिद्धांत का अभिन्न अंग है।
    • उदाहरण: इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण प्रकरण में यह पुनः प्रतिपादित किया गया कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष संस्थाएँ लोकतंत्र की आधारशिला हैं।
  • संवैधानिक नैतिकता का संरक्षक: न्यायपालिका संवैधानिक नैतिकता तथा संविधान की मूल संरचना की रक्षा करती है।
    उदाहरण: न्यायालय ने टिप्पणी की कि संबंधित पाठ्यपुस्तक में संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में उसकी भूमिका की उपेक्षा की गई।
  • कार्यपालिका और विधायिका पर नियंत्रण: स्वतंत्र न्यायालय सत्ता के केंद्रीकरण और मनमानी शासन व्यवस्था को रोकते हैं।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर अवमानना की कार्यवाही आरंभ करना उसकी संस्थागत प्राधिकारिता को प्रतिपादित करता है।
  • नागरिकों के अधिकारों का संरक्षण: न्यायिक स्वतंत्रता अनुच्छेद-32 और 226 के अंतर्गत प्रदत्त मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन को सुनिश्चित करती है।
    • उदाहरण: विधिक सहायता और न्याय तक पहुँच के क्षेत्र में न्यायपालिका का योगदान।
  • संस्थागत वैधता और जनविश्वास: लोकतंत्र नागरिकों के निष्पक्ष न्यायिक निर्णयों में विश्वास पर आधारित होता है।

हाँ, शैक्षणिक आलोचना को संस्थागत संवेदनशीलताओं के अधीन होना चाहिए

  • संस्थागत गरिमा की रक्षा: आधारहीन आरोप न्यायालय की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचा सकते हैं और उसकी विश्वसनीयता को कमजोर कर सकते हैं।
    • उदाहरण: न्यायालय ने टिप्पणी की कि संबंधित प्रस्तुति न्यायिक प्राधिकार को कमजोर करने वाली प्रतीत होती है।
  • युवा मन की सुरक्षा: विद्यालय स्तर की सामग्री विद्यार्थियों की संवैधानिक समझ को आकार देती है।
    • उदाहरण: पीठ ने “प्रभावग्रस्त होने योग्य मस्तिष्कों” को पक्षपातपूर्ण कथनों से बचाने की आवश्यकता पर बल दिया।
  • अवमानना संबंधी अधिकारिता: अनुच्छेद-129 सर्वोच्च न्यायालय को अपनी प्राधिकारिता की रक्षा हेतु अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति प्रदान करता है।
  • संस्थागत क्षरण की रोकथाम: अनियंत्रित कथानक क्रमशः संवैधानिक संस्थाओं की वैधता को कमजोर कर सकते हैं।
  • लोक शिक्षा में उत्तरदायित्व: राज्य प्रायोजित पाठ्यपुस्तकों को निष्पक्षता के उच्च मानकों का पालन करना चाहिए।
    • उदाहरण: न्यायालय ने संबंधित पाठ्यपुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध और उसकी जब्ती का आदेश दिया।

नहीं, शैक्षणिक आलोचना को संस्थागत संवेदनशीलताओं के अधीन नहीं होना चाहिए

  • वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: अनुच्छेद-19(1)(क) सार्वजनिक संस्थाओं की युक्तिसंगत आलोचना की रक्षा करता है।
    • उदाहरण: न्यायालय ने स्वयं स्पष्ट किया है कि असहमति और गंभीर विमर्श लोकतंत्र के लिए अनिवार्य हैं।
  • शैक्षणिक स्वतंत्रता: विश्वविद्यालयों और विद्वानों को संस्थागत कार्यप्रणाली का समालोचनात्मक परीक्षण करने का अधिकार होना चाहिए।
  • लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व: रचनात्मक आलोचना पारदर्शिता और सुधार को सुदृढ़ करती है।
    • उदाहरण: न्यायालय ने स्वीकार किया कि लोकतंत्र में संस्थागत उत्तरदायित्व अत्यावश्यक है।
  • भयकारी प्रभाव से बचाव: अवमानना की शक्ति का अत्यधिक विस्तार वास्तविक शैक्षणिक शोध को हतोत्साहित कर सकता है।
    • उदाहरण: पीठ ने पक्षपातपूर्ण कथन और वैध आलोचना के बीच स्पष्ट भेद स्थापित किया।
  • सार्वजनिक संस्थाएँ समीक्षा से परे नहीं: न्यायपालिका भी अन्य अंगों की भाँति संवैधानिक मानकों के अधीन उत्तरदायी है।

निष्कर्ष

न्यायिक स्वतंत्रता को संविधान की जीवनरेखा के रूप में संरक्षित किया जाना अनिवार्य है, किंतु लोकतंत्र समान रूप से सूचित एवं उत्तरदायी आलोचना की भी अपेक्षा करता है। आगे का मार्ग प्रमाण-आधारित शैक्षणिक विमर्श को प्रोत्साहित करने, पाठ्यपुस्तकों में शैक्षिक निष्पक्षता सुनिश्चित करने तथा न्यायपालिका की गरिमा को सुरक्षित रखते हुए उसे तर्कसंगत लोकतांत्रिक समीक्षा से पृथक न करने में निहित है।

Examine the constitutional significance of judicial independence in India. Should academic critique of the judiciary be subject to institutional sensitivities? in hindi

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