Q. अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक 'जीवन का अधिकार' में अंतर्निहित रूप से 'गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार' भी शामिल होना चाहिए। भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु से संबंधित नैतिक और कानूनी जटिलताओं का विश्लेषण कीजिए। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में उपशामक देखभाल को एकीकृत करने से अंतिम चरण के रोगियों की दीर्घकालिक पीड़ा को कैसे कम किया जा सकता है? (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु से जुड़ी नैतिक जटिलताओं का वर्णन कीजिए।
  • भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु से जुड़ी कानूनी जटिलताओं का उल्लेख कीजिए।
  • दीर्घकालिक पीड़ा से निपटने में उपशामक देखभाल की भूमिका की चर्चा कीजिए।

उत्तर

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 की व्याख्या ने जीवन के अधिकार के दायरे को विस्तारित करते हुए गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार को भी शामिल किया है। कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018) के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कड़े सुरक्षा प्रावधानों के तहत जीवनरक्षक उपचार को वापस लेने की अनुमति दी, जिससे जीवन के अंतिम चरण से जुड़े निर्णयों पर महत्त्वपूर्ण नैतिक और कानूनी बहस उत्पन्न हुई।

Also Read | IAS Result 2025

भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु से जुड़ी नैतिक जटिलताएँ

  • जीवन संरक्षण बनाम गरिमापूर्ण मृत्यु: एक नैतिक दुविधा यह है कि जीवन प्रत्याशा को हर कीमत पर लंबा किया जाए या तब उपचार को रोककर रोगी की गरिमा का सम्मान किया जाए जब उपचार निरर्थक हो जाए।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय ने 13 वर्षों तक निष्क्रिय अवस्था में रहे हरीश राणा के मामले में जीवनरक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति दी।
  • रोगी की स्वायत्तता बनाम परिवार का निर्णय: कई बार रोगी अपनी सहमति व्यक्त करने की स्थिति में नहीं होता, जिससे यह नैतिक प्रश्न उठता है कि उपचार वापस लेने का निर्णय कौन ले।
  • दुरुपयोग या दबाव का जोखिम: यह चिंता निरंतर बनी रहती है कि इच्छामृत्यु का निर्णय परिवार पर आर्थिक या सामाजिक दबावों से प्रभावित हो सकता है।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय ने जीवनरक्षक प्रणाली हटाने से पहले चिकित्सकीय बोर्ड की जाँच को अनिवार्य किया।
  • चिकित्सा पेशेवरों की नैतिक जिम्मेदारी: डॉक्टरों के समक्ष यह दुविधा होती है कि जीवन को लंबा किया जाए या ऐसे उपचार से बचा जाए, जो केवल पीड़ा को बढ़ाता है।
    • उदाहरण: ऐसे उपचार को जारी रखना जो लाभकारी नहीं है, रोगी की गरिमा का उल्लंघन कर सकता है।
  • सांस्कृतिक और धार्मिक संवेदनशीलताएँ: भारतीय समाज में पारंपरिक रूप से जीवन संरक्षण को उच्च महत्त्व दिया जाता है, जिससे जीवन के अंतिम चरण से जुड़े निर्णयों पर नैतिक संकोच उत्पन्न होता है।
    • उदाहरण: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इच्छामृत्यु करुणामूलक चिकित्सा निर्णय है, न कि देखभाल का परित्याग।

भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु से जुड़ी कानूनी जटिलताएँ

  • संवैधानिक व्याख्या: न्यायालयों को जीवन के अधिकार और गरिमा के साथ जीने-मरने के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करना पड़ता है, जबकि सक्रिय रूप से जीवन समाप्त करने पर प्रतिबंध भी बना रहता है।
  • सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु के मध्य भेद: भारतीय कानून में निरर्थक उपचार को वापस लेने की अनुमति है, लेकिन मृत्युकारी उपायों की अनुमति नहीं है।
    • उदाहरण: घातक इंजेक्शन के माध्यम से सक्रिय इच्छामृत्यु अभी भी अवैध है।
  • प्रक्रियात्मक सुरक्षा प्रावधान: इच्छामृत्यु के निर्णय के दुरुपयोग को रोकने के लिए कानूनी प्रक्रियाओं में चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा सत्यापन आवश्यक होता है।
  • समग्र कानून का अभाव: भारत में इच्छामृत्यु पर अभी तक कोई विशेष व्यापक कानून नहीं है और मुख्यतः न्यायिक दिशा-निर्देशों पर निर्भरता बनी हुई है।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय ने जीवनरक्षक उपचार हटाने को विनियमित करने के लिए विशेष कानून बनाने का निर्देश दिया है।
  • न्यायिक निगरानी और प्रशासनिक प्रक्रिया: जब चिकित्सा बोर्ड उपचार वापस लेने की सिफारिश करता है, तो अस्पतालों को प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट को इसकी सूचना देनी होती है, जिससे प्रक्रिया की पारदर्शिता और वैधता सुनिश्चित होती है।

लंबे समय तक होने वाले कष्ट को कम करने में पीड़ा-निवारक देखभाल की भूमिका

  • दर्द प्रबंधन: पीड़ा-निवारक देखभाल विशेष चिकित्सा उपचार और दर्द प्रबंधन के माध्यम से रोगी की शारीरिक पीड़ा को कम करती है।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय ने उपचार हटाने की अनुमति को संरचित पीड़ा-निवारक देखभाल योजनाओं से जोड़ने पर बल दिया।
  • रोगी की गरिमा और आराम: जीवन के अंतिम चरण में यह देखभाल रोगी की गरिमा बनाए रखते हुए उसे भावनात्मक सहयोग और आराम प्रदान करती है।
  • समग्र समर्थन: पीड़ा-निवारक देखभाल में रोगियों और उनके देखभालकर्ताओं के लिए मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक परामर्श भी शामिल होता है।
  • अनावश्यक चिकित्सा हस्तक्षेपों की रोकथाम: यह ऐसी जीवन-प्रत्याशा में बढ़ोतरी करने वाली चिकित्सा प्रक्रियाओं को हतोत्साहित करती है, जो जीवन की गुणवत्ता में सुधार नहीं करती हैं।
    • उदाहरण: न्यायालय ने कहा कि गैर-चिकित्सीय उपचार जारी रखना केवल पीड़ा को लंबा करता है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य में जीवन-अंत (पैलियेटिव) देखभाल का विस्तार: अस्पतालों में पैलियेटिव सेवाओं को शामिल करने से उनकी उपलब्धता बढ़ती है और अधिक मानवीय स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित होती है।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय ने गुणवत्तापूर्ण पैलियेटिव और जीवन-अंत देखभाल प्राप्त करने के अधिकार पर जोर दिया।

निष्कर्ष

करुणा, गरिमा और कानूनी सुरक्षा उपायों के बीच संतुलन बनाए रखना भारत में इच्छामृत्यु से संबंधित विकसित होते ढाँचे का केंद्रीय तत्त्व है। पैलियेटिव केयर अवसंरचना का विस्तार, नैतिक निगरानी को सुदृढ़ करना और स्पष्ट कानून बनाना आवश्यक है, ताकि मानवीय जीवन-अंत देखभाल सुनिश्चित की जा सके तथा संवेदनशील रोगियों की सुरक्षा बनी रहे। इस प्रकार स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के अंतर्गत गरिमा के साथ जीवन और मृत्यु के अधिकार के अनुरूप बनाई जा सकती है।

To get PDF version, Please click on "Print PDF" button.

Need help preparing for UPSC or State PSCs?

Connect with our experts to get free counselling & start preparing

Aiming for UPSC?

Download Our App

      
Quick Revise Now !
AVAILABLE FOR DOWNLOAD SOON
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध
Quick Revise Now !
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.