Q. परीक्षण कीजिए कि गुरु तेग बहादुर के 'किसी से न डरें, किसी को न डराएँ' के सिद्धांत की व्याख्या आधुनिक राजनीतिक व्यवस्थाओं में मानवाधिकारों और राज्य शक्ति की सीमाओं पर चर्चाओं में कैसे की जा सकती है। (10 अंक, 150 शब्द)

November 26, 2025

GS Paper IVEthics, Integrity and Aptitude

प्रश्न की मुख्य माँग

  • मानवाधिकारों की व्याख्या और राज्य शक्ति की सीमाएँ।
  • आज इस सिद्धांत को लागू करने में चुनौतियाँ।

उत्तर

गुरु तेग बहादुर का “किसी से न डरो, किसी को न डराओ” का सिद्धांत नैतिक साहस और करुणामयी शक्ति का प्रतीक है। यह इस बात पर जोर देता है कि प्रत्येक इंसान  सम्मान, समानता और उत्पीड़न से मुक्ति का हकदार है। आधुनिक राजनीतिक व्यवस्थाओं में, यह अधिनायकवाद का विरोध करने और सभी के सार्वभौमिक मानवाधिकारों की रक्षा करने का एक मार्गदर्शक सिद्धांत बन गया है।

मानवाधिकारों और राज्य-सत्ता की सीमाओं में व्याख्या

  • व्यक्तिगत गरिमा की अनुल्लंघनीयता: यह सिद्धांत इस बात पर जोर देता है कि किसी भी प्राधिकारी को बलपूर्वक भय नहीं फैलाना चाहिए।
    • उदाहरण: हिरासत में यातना के विरुद्ध संवैधानिक सुरक्षा, गरिमा के अधिकार को सुदृढ़ करती है।
  • विश्वास और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: दूसरों को भयभीत न करने का आशय विविध विचारों और आस्थाओं के सम्मान से है।
    • उदाहरण: अनुच्छेद-25 बहुल समाजों में धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है।
  • राज्य-सत्ता का न्यायसंगत और आनुपातिक प्रयोग: शक्ति का उद्देश्य अधिकारों की रक्षा होना चाहिए, उनका उल्लंघन नहीं।
    • उदाहरण: आपात-अधिकारों की कठोर न्यायिक समीक्षा उत्तरदायित्व सुनिश्चित करती है।
  • उत्पीड़न के विरुद्ध कमजोरों का सशक्तीकरण: “निडर रहो” अन्याय के विरुद्ध निर्भय होकर बोलने के लिए प्रेरित करता है।
    • उदाहरण: गवाह संरक्षण कार्यक्रम पीड़ितों को आगे आने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
  • अहिंसक विवाद-निवारण: यह संदेश शक्ति होने पर भी संयम और लोकतांत्रिक संवाद को बढ़ावा देता है।

वर्तमान संदर्भ में इस सिद्धांत को लागू करने की चुनौतियाँ

  • निगरानी और डिजिटल नियंत्रण का विस्तार: प्रौद्योगिकी आधारित निगरानी नागरिकों में भय का वातावरण बना सकती है।
    • उदाहरण: पेगासस-प्रकार के जासूसी विवाद निजता के लिए खतरा उत्पन्न करते हैं।
  • बहुसंख्यकवाद का उदय: अल्पसंख्यकों में सांस्कृतिक दबाव या जबरन समावेशन का भय  बढ़ सकता है।
    • उदाहरण: धार्मिक परिवर्तन संबंधी बहसें सामाजिक असुरक्षा को बढ़ाती हैं।
  • अधिनायकवादी पुलिसिंग और अत्यधिक प्रवर्तन: भय-आधारित सुरक्षा मॉडल अधिकारों और शांतिपूर्ण असहमति को कमजोर करते हैं।
    • उदाहरण: वर्ष 2019–2020 शाहीन बाग जैसे प्रदर्शनों के कड़े दमन से लोकतांत्रिक भागीदारी प्रभावित होती है।
  • घृणास्पद भाषण और ऑनलाइन उत्पीड़न: गैर-राज्यीय तत्त्व भय फैलाकर सौहार्द के सिद्धांत को कमजोर करते हैं।
    • उदाहरण: लक्षित डिजिटल उत्पीड़न अनेक कार्यकर्ताओं को ऑनलाइन मंचों से दूर कर देता है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम नागरिक स्वतंत्रता: सरकारें सुरक्षा के नाम पर प्रतिबंधों को उचित ठहराती हैं, जिससे स्वतंत्रता प्रभावित होती है।
    • उदाहरण: व्यापक आतंक-निरोधी प्रावधान जमानत और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित करते हैं।

निष्कर्ष

इस सिद्धांत का वास्तविक पालन तभी संभव है, जब राज्य उत्तरदायी शासन, नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा और अन्याय पर प्रश्न उठाने की क्षमता को सुनिश्चित करे। सहिष्णुता, मानवीय पुलिसिंग और अधिकार-आधारित नीति-निर्माण को बढ़ावा देकर ऐसा समाज निर्मित किया जा सकता है, जहाँ सत्ता का संतुलन करुणा से हो।

Examine how Guru Tegh Bahadur’s principle of ‘fear none, frighten none’ can be interpreted in discussions on human rights and the limits of state power in modern political systems. in hindi

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