प्रश्न की मुख्य माँग
- सामाजिक सुरक्षा पर प्रभाव
- श्रमिक अधिकारों पर प्रभाव
- संबंधित चुनौतियाँ
- सुझाए गए सुधार।
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उत्तर
ASHA (अधिकारिक सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता) और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भारत में स्वास्थ्य और पोषण सेवा वितरण की रीढ़ हैं। हालाँकि , उन्हें ‘स्वयंसेवक’ या ‘योजना कार्यकर्ता’ के रूप में वर्गीकृत किया जाना, बजाय नियमित कर्मचारी के, एक कानूनी बाधा उत्पन्न करता है, जो उन्हें मूल श्रमिक सुरक्षा से वंचित रखता है। इसके परिणामस्वरूप, औपचारिक श्रम का काम उन्हें असामाजिक, लिंग-आधारित “देखभाल-सेवा” ढाँचे के माध्यम से कराया जाता है।
सामाजिक सुरक्षा पर प्रभाव
‘स्वयंसेवक’ की स्थिति राज्य को नियोक्ता-कर्मचारी सामाजिक अनुबंध को दरकिनार करने की अनुमति देती है, जिससे इन कर्मियों को आर्थिक असुरक्षा का सामना करना पड़ सकता है।
- लाभों से वंचित: चूँकि इन्हें स्थापित कानूनों के तहत “कर्मचारी” नहीं माना जाता, इसलिए ये आमतौर पर भविष्य निधि (EPF) और कर्मचारी राज्य बीमा (ESIC) के लिए पात्र नहीं होती हैं।
- अल्प वेतन: नियमित वेतन के बजाय, इन्हें अक्सर “पुरस्कार” या “मानदेय” के रूप में भुगतान किया जाता है, जो ₹2,000–₹4,000/माह जितना कम होता है, जो किसी भी कानूनी न्यूनतम वेतन से बहुत कम है।
- उदाहरण: इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका के बावजूद, आशा (ASHA) मानदेय में केंद्र का मुख्य योगदान वर्ष 2018 के बाद से लगभग स्थिर बना हुआ है।
- अस्थायी/तदर्थ कल्याण: इन कार्यकर्ताओं और इनके परिवार संगठित पेंशन या सेवानिवृत्ति सुरक्षा के बजाय PMJJBY या PMSBY जैसी अस्थायी योजनाओं पर निर्भर रहते हैं।
- उदाहरण: हाल ही में आशा कार्यकर्ताओं को आयुष्मान भारत (AB-PMJAY) के तहत शामिल किया गया, किंतु यह केवल स्वास्थ्य बीमा कवर है, न कि समग्र सामाजिक सुरक्षा जाल।
श्रमिक अधिकारों पर प्रभाव
औपचारिक मान्यता की कमी कार्यस्थल में उनकी मोलभाव संबंधी बातचीत करने की शक्ति और मूलभूत अधिकारों को कमजोर कर देती है।
- न्यूनतम वेतन से वंचित: “मानद कार्यकर्ता” के रूप में वर्गीकृत होने के कारण, ये न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 के तहत शामिल नहीं हैं।
- भूमिका अधिभार: “स्वयंसेवकों” को अक्सर मुख्य कार्यों के अलावा चुनावी कर्तव्य या सर्वेक्षण जैसी असंबंधित जिम्मेदारियाँ दी जाती हैं और इसके लिए अतिरिक्त वेतन नहीं मिलता, जिससे उनकी पेशेवर पहचान कमजोर हो जाती है।
- उदाहरण: वर्ष 2026 में, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) कर्तव्यों में शामिल किए जाने के खिलाफ विरोध किया तथा यह तर्क दिया कि इससे बच्चों की सुरक्षा प्रभावित होती है।
- सीमित सामूहिक सौदेबाजी: यद्यपि ये यूनियन बनाते हैं, किंतु उनकी नियमितीकरण की माँगों को अक्सर अनसुना कर दिया जाता है क्योंकि ये “नागरिक पदों” पर नहीं होते हैं।
- उदाहरण: वर्ष 1996 के अमीरबी वाद (सर्वोच्च न्यायालय) में यह निर्णय दिया गया कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता सरकारी कर्मचारी नहीं हैं और इस पूर्ववर्ती निर्णय का उपयोग आज भी उन्हें समानता से वंचित करने के लिए किया जाता है।
संबद्ध चुनौतियाँ
- लैंगिक अवमूल्यन: इन कार्यकर्ताओं में 95% से अधिक महिलाएँ हैं; उनके काम को “स्वयंसेवी” मानना यह दर्शाता है कि देखभाल का कार्य बिना वेतन या न्यून वेतन वाला होना चाहिए, जो एक पितृसत्तात्मक पक्षपात को दर्शाता है।
- राजकोषीय संघवाद में कमियाँ: असमानताएँ मौजूद हैं क्योंकि संपन्न राज्य (जैसे केरल) मानदेय में बढोतरी करते हैं, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर राज्य (जैसे बिहार) ऐसा नहीं कर पाते, जिससे अनुच्छेद-14 (समानता) का उल्लंघन होता है।
- असुरक्षित कॅरियर पाथ: यहाँ पदोन्नति की सीढ़ी या संगठित वरिष्ठता-आधारित वेतन वृद्धि पूरी तरह अनुपस्थित है।
सुझाए गए सुधार
- वैधानिक पुनर्वर्गीकरण: सामाजिक सुरक्षा संहिता में संशोधन कर योजना कार्यकर्ताओं को “वैधानिक कर्मचारी” के रूप में मान्यता देना, ताकि उन्हें न्यूनतम वेतन और पेंशन का अधिकार प्राप्त हो सकें।
- नियत वेतन मॉडल: “प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन” प्रणाली से स्थिर मासिक वेतन (अनुशंसित ₹15,000+) पर संक्रमण करना, ताकि सम्मानजनक जीवनयापन सुनिश्चित हो।
- न्यायिक संरेखण: मनिबेन मगनभाई भरिया (2022) के निर्णय को सार्वभौमिक रूप से लागू करना, जिससे सभी कार्यकर्ताओं को ग्रेच्युटी/ आनुतोषिक और सेवानिवृत्ति लाभ मिल सकें।
- संस्थागत शिकायत निवारण: कार्यभार प्रबंधन और यौन उत्पीड़न (SHe-Box) के लिए फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं हेतु समर्पित पोर्टल स्थापित करना।
- चरणबद्ध नियमितीकरण: दीर्घकालीन सेवा देने वाली कार्यकर्ताओं को स्थायी राज्य स्वास्थ्य या शिक्षा कैडरों में शामिल करने के लिए रोडमैप तैयार करना।
निष्कर्ष
भारत अपनी मानव विकास की योजनाएँ एक शोषित कार्यबल पर नहीं बना सकता है। आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को औपचारिक कर्मचारी के रूप में मान्यता देना केवल वित्तीय निर्णय नहीं, बल्कि अनुच्छेद-47 (जनस्वास्थ्य) और अनुच्छेद-21 (सम्मान का अधिकार) के तहत नैतिक और संवैधानिक आवश्यकता है। सभी का कल्याण तब ही संभव है, जब जो इसे प्रदान करते हैं, वे स्वयं सुरक्षित और सम्मानित हों।
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