Q. उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों के खिलाफ हिंसा और धमकी की हालिया घटनाएं परिसरों के प्रशासन में एक गहरे संकट को उजागर करती हैं। भारत में इस प्रकार की घटनाएं शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया और अकादमिक मूल्यांकन को किस प्रकार प्रभावित करती हैं, इसका विश्लेषण कीजिए। उच्च शिक्षा में गरिमा, सुरक्षा और जवाबदेही को बहाल करने के लिए संस्थागत और नीतिगत स्तर के उपायों का सुझाव दीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया पर प्रभाव
  • शैक्षणिक मूल्यांकन पर प्रभाव
  • परिसर प्रशासन से जुड़ी चुनौतियाँ 
  • पुनर्स्थापना के लिए संस्थागत उपाय 
  • पुनर्स्थापना के लिए नीति-स्तरीय उपाय। 

उत्तर

उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों के खिलाफ हिंसा और डराने-धमकाने की हालिया घटनाएँ परिसर प्रशासन में एक गहरे संकट को दर्शाती हैं। अक्सर अत्यधिक राजनीतीकरण से प्रेरित ये कृत्य, शिक्षा के जीवंत केंद्रों को भय के क्षेत्रों में परिवर्तित कर देते हैं, जिससे शिक्षकों की पेशेवर गरिमा और पूरी व्यवस्था की शैक्षणिक सत्यनिष्ठा कमजोर होती है।

शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया पर प्रभाव

  • बौद्धिक स्वतंत्रता का हनन : हिंसा एक “भय का माहौल” उत्पन्न करती है, जहाँ राजनीतिक विरोध से बचने के लिए शिक्षक विवादास्पद या जटिल विषयों पर चर्चा करने से बचते हैं।
  • छात्र कल्याण से दूरी: धमकी के साए में जीने वाले शिक्षक अक्सर एक यांत्रिक भूमिका तक सीमित हो जाते हैं। वे संकटग्रस्त छात्रों के लिए संरक्षक (Mentors) या रक्षक के रूप में कार्य करना बंद कर देते हैं।
  • संस्थागत प्रतिभा की हानि: बार-बार होने वाली हिंसा “प्रतिभा पलायन” का कारण बनती है, जहाँ शीर्ष स्तर के विद्वान सुरक्षित निजी या अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में चले जाते हैं।
    • उदाहरण: पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्यों के ऐतिहासिक रुझान दिखाते हैं कि हिंसक राजनीतीकरण के कारण शैक्षणिक प्रतिभाओं का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ है, जिससे उबरने में संस्थानों को दशकों लग गए।

शैक्षणिक मूल्यांकन पर प्रभाव

  • निष्पक्ष मूल्यांकन का संकट : डराने-धमकाने की वजह से शिक्षक, छात्रों या छात्र संघों के साथ शारीरिक टकराव से बचने के लिए “डिफेंसिव ग्रेडिंग” अपनाने को मजबूर हो जाते हैं।
  • परीक्षा की अखंडता से समझौता: अक्सर हिंसा का प्रयोग “सरल प्रश्न-पत्रों” की माँग करने या नकल को सुविधाजनक बनाने के लिए एक हथियार के रूप में किया जाता है, जिससे मूल्यांकन प्रणाली की पवित्रता नष्ट हो जाती है।
  • डिग्रियों का अवमूल्यन : जैसे-जैसे मूल्यांकन की गुणवत्ता/कठोरता गिरती है, प्रभावित विश्वविद्यालयों की डिग्रियों का बाजार मूल्य कम हो जाता है। इससे सभी पूर्व छात्रों (Alumni) की दीर्घकालिक संभावनाओं को नुकसान पहुँचता है।

परिसर प्रशासन से जुड़ी चुनौतियाँ 

  • राजनीतिक हस्तक्षेप: बाहरी राजनीतिक संरक्षक अक्सर छात्र नेताओं को अनुशासनात्मक कार्रवाई से बचाते हैं, जिससे “दंड मुक्ति की संस्कृति” (Culture of impunity) को बढ़ावा मिलता है।
  • दोषपूर्ण शिकायत तंत्र : मौजूदा प्रणालियाँ अक्सर धीमी या पक्षपाती होती हैं। इससे उत्पन्न हताशा/निराशा अंततः शारीरिक आक्रामकता का रूप ले लेती है।
  • कानूनी अस्पष्टता : शैक्षणिक कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए किसी विशिष्ट केंद्रीय कानून के अभाव के कारण, परिसर में होने वाली हिंसा पर सख्ती से कानूनी कार्रवाई करना मुश्किल हो जाता है।
    • उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2026 में UGC इक्विटी विनियमों पर लगाई गई रोक ने उन अस्पष्ट परिभाषाओं पर चिंता जताई, जिनसे शिकायत निवारण चैनलों का दुरुपयोग हो सकता था।
  • मानसिक तनाव : संकाय सदस्यों (Faculty members) में बढ़ती चिंता और “डी-ट्रेनिंग” (कौशल/उत्साह में कमी) सीधे उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।

पुनर्स्थापना के लिए संस्थागत उपाय 

  • अनिवार्य आचार संहिता : यूजीसी (UGC) द्वारा अनिवार्य ‘पेशेवर नैतिकता की आचार संहिता’ स्थापित करना, जो शैक्षणिक मूल्यांकन में राजनीतिक हस्तक्षेप को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करती है।
  • मजबूत सुरक्षा ढाँचा : कठोर प्रवेश नियंत्रण, 24/7 सीसीटीवी निगरानी और तनाव कम करने (De-escalation) में प्रशिक्षित विशेष ‘परिसर सुरक्षा दस्तों’ को लागू करना।
  • स्वतंत्र शिकायत निवारण : ऐसे लोकपाल कार्यालय बनाना, जो वित्तीय और प्रशासनिक रूप से विश्वविद्यालय प्रबंधन से स्वतंत्र हों।
  • संघर्ष समाधान प्रशिक्षण: छात्रों और शिक्षकों दोनों के लिए अहिंसक संचार और विवाद समाधान पर अनिवार्य कार्यशालाओं को एकीकृत करना।

पुनर्स्थापना के लिए नीति-स्तरीय उपाय 

  • सुरक्षा के लिए केंद्रीय कानून: स्वास्थ्य कर्मियों की सुरक्षा करने वाले कानूनों की तर्ज पर एक “उच्च शिक्षा संरक्षण अधिनियम” का मसौदा तैयार करना, जो शिक्षकों के खिलाफ हिंसा को गैर-जमानती अपराध बनाता है।
  • यूनियनों को मुख्यधारा की राजनीति से अलग करना: विश्वविद्यालय परिसरों को राष्ट्रीय राजनीतिक लड़ाइयों का अखाड़ा (Proxies) बनने से रोकने के लिए लिंगदोह समिति की सिफारिशों को अक्षरशः लागू करना।
  • वित्तपोषण में जवाबदेही: संस्थागत अनुदानों को UGC या NAAC द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित “सुरक्षा और निष्पक्षता ऑडिट” से जोड़ना।
  • आंतरिक समिति को सशक्त बनाना: आंतरिक समितियों (ICs) की कानूनी शक्तियों को मजबूत करना, ताकि वे प्रशासनिक निर्णय पलटे जाने के डर के बिना धमकियों के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई कर सकें।

निष्कर्ष

जब राजनीतिक उद्देश के लिए शैक्षिक प्रणाली के साथ छेड़छाड़ की जाती है, तो इसकी अंतिम कीमत छात्रों के भविष्य को चुकानी पड़ती है। शिक्षण व्यवसाय की गरिमा को बहाल करने के लिए ‘प्रतिक्रियाशील सुरक्षा’ से ‘सक्रिय प्रशासन’ की ओर परिवर्तन की आवश्यकता है। 

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