Q. पर्यटन की अपार संभावनाओं के बावजूद, भारत वैश्विक स्तर पर पिछड़ रहा है। नियामक बाधाओं के कारण पर्यटन विकास में आने वाली बाधाओं का विश्लेषण कीजिए और प्रतिस्पर्द्धात्मकता में सुधार के लिए सुधारों का सुझाव दीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • विकास को बाधित करने वाली नियामक बाधाएँ
  • प्रतिस्पर्द्धा में सुधार लाने हेतु उपाय।

उत्तर

भारत का पर्यटन क्षेत्र, अपनी विविध विरासत के बावजूद, वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता में अपने अपेक्षाकृत छोटे समकक्ष देशों की तुलना में काफी नीचे स्थान रखता है। विश्व आर्थिक मंच के यात्रा एवं पर्यटन विकास सूचकांक के अनुसार, भारत के पास प्रचुर प्राकृतिक संसाधन हैं, किंतु कमजोर सेवा अवसंरचना और नियामकीय अक्षमताओं के कारण इसकी वैश्विक हिस्सेदारी सीमित बनी हुई है।

विकास को बाधित करने वाली नियामकीय बाधाएँ

  • जटिल कर संरचनाएँ: वस्तु एवं सेवा कर के अंतर्गत उच्च तथा बहु-स्तरीय कर, विशेषकर लक्जरी होटलों पर, भारत को अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के लिए महँगा गंतव्य बनाते हैं।
    • उदाहरण: भारत में उच्च श्रेणी के होटलों पर कर 18–28 प्रतिशत तक पहुँच सकता है, जबकि थाईलैंड जैसे प्रतिस्पर्द्धी बाजारों में यह मात्र 5–10 प्रतिशत है।
  • पुरानी लाइसेंसिंग व्यवस्थाएँ: पर्यटन व्यवसायों को तथाकथित “परमिट राज” का सामना करना पड़ता है, जहाँ विभिन्न विभागों से अनेक अनुमतियाँ लेनी होती हैं, जिससे परियोजनाओं में देरी और संचालन लागत बढ़ जाती है।
    • उदाहरण: भारत में एक सामान्य होटल परियोजना के लिए 100 से अधिक अनुमतियाँ आवश्यक होती हैं, जबकि सिंगापुर में यह संख्या 10 से भी कम है।
  • वीजा और प्रवेश संबंधी बाधाएँ: ई-वीजा नीतियों में बार-बार परिवर्तन और उच्च पारस्परिक शुल्क, आकस्मिक यात्रियों तथा दूरस्थ देशों से आने वाले पर्यटकों को हतोत्साहित करते हैं।
    • उदाहरण: प्रमुख बाजारों के लिए वीजा प्रक्रिया में प्रशासनिक देरी के कारण अतीत में पर्यटक प्रवाह दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की ओर मुड़ गया है।
  • अवसंरचना प्रशासन में खामियाँ: केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के बीच अपर्याप्त निगरानी के कारण स्थल संपर्क, स्वच्छता और रखरखाव के मानकों में कमी रहती है।
    • उदाहरण: “अंतिम-मील” परिवहन के लिए एकीकृत विनियमों के अभाव में पर्यटक अक्सर अनियंत्रित और असुरक्षित स्थानीय परिवहन पर निर्भर रहते हैं।

प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाने हेतु सुधार

  • उद्योग का दर्जा प्रदान करना: पर्यटन को देशभर में “उद्योग” के रूप में मान्यता देकर व्यवसायों को सस्ती ऋण सुविधा, रियायती उपयोगिताएँ और कर प्रोत्साहन उपलब्ध कराना।
  • एकल खिड़की स्वीकृति प्रणाली: आतिथ्य और साहसिक पर्यटन परियोजनाओं के लिए डिजिटल तथा समयबद्ध स्वीकृति व्यवस्था लागू करना।
    • उदाहरण: एक “राष्ट्रीय पर्यटन बोर्ड” को नोडल एजेंसी बनाकर नौकरशाही खंडों को दरकिनार किया जा सकता है।
  • वस्तु एवं सेवा कर दरों का युक्तीकरण: आतिथ्य क्षेत्र में कर दरों को मानकीकृत कर 12 प्रतिशत तक लाना, ताकि वैश्विक पर्यटन केंद्रों के अनुरूप प्रतिस्पर्द्धा सुनिश्चित हो।
    • उदाहरण: “एक राष्ट्र, एक पर्यटन कर” की अवधारणा से टूर ऑपरेटरों के लिए लागत संरचना सरल होगी।
  • कौशल विकास का एकीकरण: विशेष “पर्यटन कैडर” का निर्माण और ‘हुनर से रोजगार’ योजना के अंतर्गत स्थानीय गाइडों का प्रमाणन कर सेवा गुणवत्ता में सुधार।
    • उदाहरण: ‘देखो अपना देश’ पहल का उद्देश्य बेहतर प्रशिक्षित अग्रिम पंक्ति कर्मियों के माध्यम से आगंतुक अनुभव को सुदृढ़ करना है।

निष्कर्ष

“भारत की पर्यटन क्षमता को पूर्ण रूप से साकार करने के लिए ‘प्रतिबंधात्मक’ के स्थान पर ‘सहायक’ नियामकीय दृष्टिकोण की ओर संक्रमण अनिवार्य है। समग्र-सरकार दृष्टिकोण को अपनाकर तथा G-20 पर्यटन ट्रैक से प्राप्त गति का लाभ उठाते हुए भारत अपनी पर्यटन अवसंरचना और ब्रांडिंग का आधुनिकीकरण कर सकता है। इससे पर्यटन क्षेत्र, सांस्कृतिक अखंडता को संरक्षित रखते हुए, पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य की प्राप्ति में एक प्रमुख चालक सिद्ध हो सकता है।”

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