Q. केंद्रीय बजट 2026-27 तीन 'कर्तव्यों' को बताता है - आर्थिक विकास को तेज करना, क्षमता निर्माण के माध्यम से लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करना, और संसाधनों तक समान पहुँच सुनिश्चित करना। आलोचनात्मक रूप से जाँच कीजिए कि ये तीनों कर्तव्य भारत के बजटीय दृष्टिकोण में विकास-केंद्रितता से समावेशी और लचीले आर्थिक विकास की ओर बदलाव को कैसे दर्शाते हैं। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • समावेशी और लचीले विकास की ओर परिवर्तन
  • संबद्ध चुनौतियाँ 
  • चुनौतियों से निपटने के लिए आगे की राह। 

उत्तर

केंद्रीय बजट 2026-27 में “तीन कर्तव्यों” (Three Kartavyas) को पेश किया गया है, जिनमें आर्थिक विकास को गति देना, क्षमता निर्माण के माध्यम से आकांक्षाओं को पूरा करना, और संसाधनों तक समान पहुँच सुनिश्चित करना शामिल है। यह ढाँचा एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का प्रतीक है, जो केवल GDP विस्तार पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय एक बहुआयामी दृष्टिकोण की ओर संक्रमण कर रहा है। यह अनिश्चित वैश्विक परिदृश्य में समावेशी भागीदारी और दीर्घकालिक आर्थिक लचीलेपन को प्राथमिकता देता है।

समावेशी और लचीले विकास की ओर परिवर्तन

  • उत्पादकता-आधारित लचीला विकास: पहला कर्तव्य अल्पकालिक राजकोषीय प्रोत्साहनों के बजाय संरचनात्मक उत्पादकता और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाने पर बल देता है
    • उदाहरण: ISM 2.0 और बायोफार्मा शक्ति योजना (₹10,000 करोड़) का शुभारंभ हाई-टेक आपूर्ति शृंखलाओं में आत्मनिर्भरता विकसित करने के उद्देश्य से किया गया है।
  • मानव-केंद्रित क्षमता निर्माण: दूसरा कर्तव्य शिक्षा को सीधे उद्यम से जोड़कर नागरिकों को निष्क्रिय लाभार्थियों के बजाय “सक्रिय भागीदारों” के रूप में स्थापित करता है।
    • उदाहरण: एक उच्च-स्तरीय ‘शिक्षा से रोजगार और उद्यम’ स्थायी समिति की स्थापना का लक्ष्य वर्ष 2047 तक सेवाओं में 10% वैश्विक हिस्सेदारी हासिल करना है।
  • लक्षित संसाधन समानता : तीसरा कर्तव्य ‘सबका साथ, सबका विकास’ के अनुरूप है, जो सामान्य कल्याण से आगे बढ़कर यह सुनिश्चित करता है कि “अंतिम मील” तक विकास के साधनों की ठोस पहुँच हो।
    • उदाहरण: ‘भारत-विस्तार’ (Bharat-VISTAAR) AI प्लेटफॉर्म छोटे और सीमांत किसानों को अनुकूलित उत्पादकता सलाह प्रदान करने के लिए एग्रीस्टैक डेटा को एकीकृत करता है।
  • सामाजिक संयोजक के रूप में बुनियादी ढाँचा: “मेगा-प्रोजेक्ट्स” से “ग्रोथ कनेक्टर्स” में परिवर्तन, जो क्षेत्रीय असमानताओं और लॉजिस्टिक्स लागत को कम करते हैं।
    • उदाहरण: सात हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर (जैसे- हैदराबाद-बंगलूरू) का प्रस्ताव टियर-II शहरों को आर्थिक केंद्रों में बदलने का प्रयास करता है।

संबंधित चुनौतियाँ

  • कार्यान्वयन की बाधाएँ : व्यापक “कर्तव्यों” को जमीनी स्तर के परिणामों में बदलने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच निर्बाध समन्वय की आवश्यकता होती है, जो अक्सर राजनीतिक टकराव का सामना करता है।
  • निजी निवेश में सुस्ती: ₹12.2 लाख करोड़ के रिकॉर्ड पूँजीगत व्यय (Capex) के बावजूद, निजी उपभोग धीमी बनी हुई है। यह सार्वजनिक व्यय के “क्राउडिंग-इन” प्रभाव को सीमित कर सकता है।
  • कौशल-बाजार का असंतुलन: AI जैसे तीव्र तकनीकी परिवर्तन “रोजगारहीन वृद्धि” का जोखिम उत्पन्न करते हैं। यदि क्षमता निर्माण उद्योग-आधारित अनुसंधान के साथ तालमेल नहीं रखता है (जैसा कि KPMG 2026 ने नोट किया है), तो यह समस्या बढ़ सकती है।
  • राजकोषीय समेकन का दबाव : ‘रेयर अर्थ कॉरिडोर जैसी महत्त्वाकांक्षी नई योजनाओं को वित्तपोषित करते हुए 4.3% राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को बनाए रखना, अन्य सामाजिक क्षेत्रों में खर्च को कम कर सकता है।

चुनौतियों से निपटने के लिए आगे की राह 

  • परिणाम-आधारित वित्तपोषण : स्थानीय स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ‘सिटी इकोनॉमिक रीजन’ (CER) योजना की तर्ज पर “सुधार-सह-परिणाम” तंत्र को लागू करना।
    • उदाहरण: प्रति CER ₹5,000 करोड़ का आवंटन विशिष्ट विकास लक्ष्यों को पूरा करने पर निर्भर है।
  • डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे का लाभ उठाना: MSMEs को औपचारिक बनाने और उन्हें कम लागत वाले ऋण तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए ONDC और TReDS जैसे उपकरणों  का विस्तार करना।
  • संघीय सहयोग को मजबूत करना: राज्यों को राष्ट्रीय “कर्तव्य” रोडमैप के साथ चलने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु 16वें वित्त आयोग के ढाँचे का उपयोग करना।
  • रणनीतिक वैश्विक एकीकरण: घरेलू अर्थव्यवस्था को भू-आर्थिक अस्थिरता से बचाने के लिए महत्त्वपूर्ण खनिजों और ऊर्जा में आयात निर्भरता को कम करना।

निष्कर्ष

बजट 2026-27 एक “विश्वसनीय प्रयास” है, जो अल्पकालिक राजकोषीय दिखावे के बजाय दीर्घकालिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को प्राथमिकता देता है। केवल वृद्धि-केंद्रित मॉडल से हटकर कर्तव्य-संचालित ढाँचे की ओर बढ़ते हुए, भारत एक संरचनात्मक रूप से मजबूत अर्थव्यवस्था की नींव रख रहा है। अंततः, इस परिवर्तन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या इस मंशा को आम आदमी के लिए प्रदर्शन-आधारित परिणामों में बदला जा सकता है या नहीं।

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