प्रश्न की मुख्य माँग
- हरित क्रांति की प्रमुख उपलब्धियों का परीक्षण कीजिए।
- भारत की हरित क्रांति से जुड़ी चुनौतियों का उल्लेख कीजिए।
- प्रत्यास्थता और संधारणीयता सुनिश्चित करने के लिए कृषि परिवर्तन के अगले चरण के लिए एक रोडमैप सुझाइये।
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उत्तर
परिचय
1960 के दशक के मध्य में एम.एस. स्वामीनाथन के नेतृत्व में शुरू की गई भारत की हरित क्रांति ने अमेरिकी खाद्य सहायता पर निर्भर एक ‘शिप-टू-माउथ’ अर्थव्यवस्था को दुनिया के दूसरे सबसे बड़े खाद्य उत्पादक में परिवर्तित कर दिया। इसने खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता तो सुनिश्चित की, लेकिन कई दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय चुनौतियों को भी जन्म दिया।
मुख्य भाग
हरित क्रांति की प्रमुख उपलब्धियाँ
- खाद्य निर्भरता का उन्मूलन: इसने PL-480 आधारित खाद्य सहायता को घरेलू खाद्यान्न आत्मनिर्भरता से प्रतिस्थापित कर दिया।
उदाहरण: अमेरिकी सहायता के तहत गेहूँ के आयात को घरेलू उत्पादन द्वारा प्रतिस्थापित किया गया, जो 12 मिलियन टन (1960 के दशक) से बढ़कर 76 मिलियन टन (1990 के दशक) हो गया।
- उत्पादकता में वृद्धि: उच्च उपज देने वाली किस्मों और सिंचाई प्रणालियों को अपनाने से उपज में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
उदाहरण: चावल की पैदावार 2 टन/हेक्टेयर (1960 के दशक) से बढ़कर 6 टन/हेक्टेयर (1990 के दशक) हो गई, गेहूँ की पैदावार में भी कई गुना वृद्धि देखी गई।
- रणनीतिक क्षेत्रीय फोकस: लक्षित संसाधन परिनियोजन के माध्यम से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश, कृषि केंद्र बन गए।
- आयातक से निर्यातक की ओर बदलाव: भारत खाद्य आयातक से शुद्ध निर्यातक की ओर परिवर्तित हो गया है।
उदाहरण: 1980 के दशक के अंत तक भारत आत्मनिर्भर हो गया और अब 52 बिलियन डॉलर से अधिक मूल्य की कृषि वस्तुओं का निर्यात करता है।
- किसानों के साथ वैज्ञानिक साझेदारी: अनुसंधान और क्षेत्र-स्तरीय कार्यान्वयन के एकीकरण से स्वीकृति और दक्षता में वृद्धि हुई।
उदाहरण: वैज्ञानिकों और किसानों द्वारा संयुक्त रूप से विकसित की गई रतुआ प्रतिरोधी (Rust Resistant) गेहूँ की किस्में, एक सहभागी मॉडल का प्रतीक हैं।
- कूटनीतिक शक्ति के रूप में कृषि: कृषि एक राष्ट्रीय कमजोरी से वैश्विक खाद्य कूटनीति के एक उपकरण के रूप में विकसित हुई है।
उदाहरण: भारत अब अमेरिका जैसे देशों के साथ टैरिफ पर समझौते कर रहा है, जो कभी उसका खाद्य दाता हुआ करता था।
हरित क्रांति द्वारा उत्पन्न चुनौतियाँ
- क्षेत्रीय असंतुलन: विकास चुनिंदा राज्यों में ही केंद्रित रहा, अन्य क्षेत्र पीछे रह गए।
उदाहरण: पंजाब-हरियाणा की तुलना में पूर्वी और मध्य भारत को सीमित लाभ मिला।
- संसाधनों का ह्रास: जल और रासायनिक पदार्थों के अत्यधिक उपयोग से भूमि और जल स्तर में गिरावट आई।
उदाहरण: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की निगरानी समिति ने हाल ही में घोषणा की है कि वर्ष 2039 तक पंजाब का भू-जल स्तर 300 मीटर से नीचे चला जाएगा।
- लघु-धारकों की भेद्यता: अधिकांश खेत कम इनपुट, कम उत्पादन और जोखिम-प्रवण बने रहे।
उदाहरण: 80% से अधिक भारतीय खेत अभी भी लघुधारक मिश्रित फसल प्रणाली पर आधारित हैं, जिनमें न्यूनतम सुरक्षा प्रावधान हैं।
- उपेक्षित फसल विविधता: चावल और गेहूँ पर ध्यान केंद्रित करने से एकल फसल और आहार असंतुलन उत्पन्न हुआ।
उदाहरण: उच्च उपज किस्म कार्यक्रम (HYVP) को केवल पाँच फसलों जैसे गेहूँ, चावल, ज्वार, बाजरा और मक्का तक सीमित कर दिया गया था।
- सामाजिक-आर्थिक असमानता: लाभ बड़े भूमिधारकों तक सीमित रहे, जिससे बटाईदार और भूमिहीन किसान हाशिये पर चले गए।
उदाहरण: तकनीकी पहुँच और सब्सिडी का लाभ अधिकांशतः प्रभुत्वशाली कृषि अभिजात वर्ग को ही प्राप्त हुआ।
- निर्यात सुभेद्यता: वैश्विक बाजारों में एकीकरण से किसानों को संरक्षणवादी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
उदाहरण: वर्ष 2025 में अमेरिकी टैरिफ से ओडिशा के 170 मिलियन डॉलर के झींगा निर्यात और अन्य लघु-स्तरीय वस्तु उत्पादकों को खतरा है।
अगले कृषि परिवर्तन का रोडमैप
- अनाज से परे विविधीकरण: पोषण और पारिस्थितिकी संतुलन के लिए दालों, तिलहन और मोटे अनाजों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
उदाहरण: संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित ‘अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष, 2023’ के तहत मोटे अनाज का पुनरुत्थान इस दृष्टि के अनुरूप है।
- लघुधारकों को सशक्त बनाना: लघु उत्पादकों के लिए बाजार पहुँच, जोखिम बीमा और बुनियादी ढाँचा उपलब्ध कराना चाहिए।
उदाहरण: कृषि में राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (NeGP-A) जैसी पहलों के साथ बेहतर रसद और इनपुट समर्थन के साथ 80% से अधिक लघु किसानों को लक्षित करना चाहिए।
- कृषि-पारिस्थितिकी नवाचार: विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के अनुरूप कम इनपुट वाले सतत् मॉडलों को बढ़ावा देना चाहिए।
उदाहरण: आधुनिक कीट और जल प्रबंधन के साथ पारंपरिक मिश्रित खेती को प्रोत्साहित करना चाहिए।
- सुदृढ़ व्यापार रणनीति: छोटे किसानों को प्रतिकूल प्रभावों से बचाते हुए निर्यात क्षमता का निर्माण करना चाहिए।
उदाहरण: अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिए बहु-देशीय बाजार पहुँच रणनीतियाँ अपनानी चाहिए।
- किसान-वैज्ञानिक साझेदारी 2.0: विस्तार सेवाओं के माध्यम से सहभागी अनुसंधान और स्थानीय नवाचार का विस्तार करना चाहिए।
उदाहरण: संस्थागत विज्ञान के साथ जमीनी स्तर पर नवाचार को जोड़कर हरित क्रांति की सफलता को दोहराना चाहिए।
- जलवायु-उत्तरदायी कृषि: जलवायु अनिश्चितताओं के अनुरूप फसल प्रतिरूपों और प्रौद्योगिकी को अनुकूलित करना चाहिए।
- सतत् इनपुट उपयोग: रासायनिक इनपुट को नियंत्रित करना और मृदा स्वास्थ्य व जल पुनर्भरण में निवेश करना चाहिए।
उदाहरण: अति-कृषि वाले हरित क्रांति क्षेत्रों में जैविक आदानों और फसल चक्र को बढ़ावा देना चाहिए।
निष्कर्ष
हरित क्रांति भारत के खाद्य असुरक्षा से वैश्विक खाद्य नेतृत्व की ओर परिवर्तन का एक निर्णायक अध्याय थी। हालाँकि, लघु किसानों की वर्तमान सुभेद्यताओं और निर्यात पर निर्भरता एक नई क्रांति की आवश्यकता का संकेत देती है, जो समावेशिता, संधारणीयता और प्रत्यास्थता पर आधारित हो। भारत में हरित क्रांति के जनक डॉ. एमएस स्वामीनाथन ने ‘एवरग्रीन क्रांति’ की आवश्यकता पर बल दिया था।