Q. भारत में आर्द्रभूमि न केवल पारिस्थितिक संपत्ति हैं बल्कि पारंपरिक ज्ञान के भंडार भी हैं, फिर भी मौजूदा नीतिगत ढाँचे के बावजूद ये तेजी से क्षय का सामना कर रही हैं। भारत में आर्द्रभूमि संरक्षण में मुख्य चुनौतियों की जाँच कीजिए और चर्चा कीजिए कि पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक और संस्थागत दृष्टिकोणों के साथ एकीकृत करके उनकी सतत प्रबंधन सुनिश्चित कैसे किया जा सकता है। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • आर्द्रभूमि संरक्षण में प्रमुख चुनौतियाँ।
  • पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ एकीकृत करना।
  • पारंपरिक ज्ञान को संस्थागत दृष्टिकोणों के साथ एकीकृत करना।

उत्तर

भारत में आर्द्रभूमि, जो इसके भूभाग का लगभग 4.6% कवर करती है, महत्त्वपूर्ण “जल-सामाजिक” परिदृश्य हैं। ये पारिस्थितिक संपत्ति और पारंपरिक ज्ञान के भंडार, दोनों के रूप में कार्य करते हैं। आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के बावजूद, ये पारिस्थितिक तंत्र तेजी से क्षरण का सामना कर रहे हैं और पिछले तीन दशकों में इन्होंने अपने क्षेत्र का लगभग 30% हिस्सा खो दिया है। विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2026 का विषय, “आर्द्रभूमि और पारंपरिक ज्ञान”,आर्द्रभूमियों के क्षरण रोकने हेतु पारंपरिक संरक्षण और आधुनिक संस्थागत तंत्र के समन्वय की आवश्यकता को उजागर करता है। 

आर्द्रभूमि संरक्षण में प्रमुख चुनौतियाँ 

  • संस्थागत और विधिक अंतराल: कई विभागों (जल, शहरी, पर्यावरण) में खंडित शासन के कारण अधिसूचना में देरी होती है। मार्च 2025 तक, 2 लाख से अधिक आर्द्रभूमियों में से केवल 102 को ही आधिकारिक तौर पर अधिसूचित किया गया था।
  • ‘अनुर्वर भूमि’ की धारणा: आर्थिक और राजस्व अभिलेख अक्सर आर्द्रभूमि को “अनुर्वर भूमि” के रूप में गलत वर्गीकृत करते हैं, जिससे रियल एस्टेट और बुनियादी ढाँचे के लिए उनका रूपांतरण आसान हो जाता है।
    • उदाहरण: चेन्नई में पल्लिकरानाई दलदल (Pallikaranai marsh) का शहरी “कंक्रीट के विस्तार” और बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के कारण लगभग 90% तक क्षरण हो गया है।
  • जल विज्ञान संबंधी व्यवधान: बाँध, तटबंध और रेत खनन प्राकृतिक फीडर चैनलों को अवरुद्ध करते हैं, जिससे जल निकायों का “स्थलीकरण” हो जाता है अर्थात् वे भूमि में परिवर्तित होने लगते हैं।
    • उदाहरण: कश्मीर में वुलर झील में भारी गाद जमा होने और इसके प्राकृतिक इनलेट्स के अवरुद्ध होने के कारण जल धारण क्षमता में भारी गिरावट आई है।
  • प्रदूषण और सुपोषण : अनुपचारित सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट आर्द्रभूमि को “पोषक तत्त्वों के सिंक” में परिवर्तित कर देते हैं, जिससे ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और जैव विविधता समाप्त होने लगती है।
    • उदाहरण: बंगलूरू की बेलंदूर झील (Bellandur Lake) अक्सर जहरीले झाग और आग की घटनाओं का सामना करती है, जो शहरी बहिःस्राव प्रबंधन की विफलता को उजागर करता है।
  • आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ : जलकुंभी (Water Hyacinth) और अफ्रीकी कैटफिश जैसी प्रजातियाँ देशी वनस्पतियों और जीवों पर हावी हो जाती हैं, जिससे नाजुक पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ जाता है।

पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ एकीकृत करना

  • कैस्केडिंग सिस्टम को पुनर्जीवित करना: आधुनिक जल विज्ञान उन पारंपरिक ‘टैंक’ प्रणालियों को बड़े पैमाने पर अपनाने में सक्षम है, जो जल प्रबंधन के लिए गुरुत्वाकर्षण और भू-आकृति (terrain) का प्रभावी उपयोग करती हैं।”
    • उदाहरण: GIS-आधारित मानचित्रण का उपयोग करके तमिलनाडु के ‘कुलम’ (टैंक) नेटवर्क को पुनर्जीवित किया गया, बाढ़ से बचाव के लिए प्राचीन फीडर चैनलों की सटीक बहाली सुनिश्चित करता है।
  • पुनर्स्थापन में बायोमिमिक्री: आर्द्रभूमि के स्वास्थ्य की निगरानी के लिए रिमोट सेंसिंग के साथ-साथ पारंपरिक जैविक संकेतकों (जैसे, विशिष्ट जलीय पौधे) का उपयोग करना।
  • कृषि-पारिस्थितिकी बफर्स: नाइट्रोजन-लोडिंग और शैवाल प्रस्फुटन को रोकने के लिए, जलग्रहण क्षेत्रों में पारंपरिक जैविक कृषि को मृदा स्वास्थ्य कार्ड के साथ जोड़ना।
    • उदाहरण: केरल में ‘कोले वेटलैंड्स’ समुद्र तल से नीचे की एक अनूठी कृषि तकनीक का उपयोग करते हैं, जो चावल उत्पादन को मौसमी बाढ़ विनियमन के साथ संतुलित करती है।
  • निर्मित आर्द्रभूमि : शहरी सीवेज उपचार के लिए प्रकृति-आधारित समाधान डिजाइन करके, पारंपरिक रूप से गाँव के तालाबों में उपयोग की जाने वाली “प्राकृतिक फिल्टर” अवधारणा को बड़े पैमाने पर लागू करना।

पारंपरिक ज्ञान को संस्थागत दृष्टिकोणों के साथ एकीकृत करना

  • ‘आर्द्रभूमि मित्र’ को संस्थागत बनाना: स्थानीय समुदाय के स्वयंसेवकों को “आर्द्रभूमि के मित्र” के रूप में औपचारिक बनाना, जिससे वे वास्तविक समय की रिपोर्टिंग के लिए गैर-सरकारी निगरानीकर्ताओं के रूप में कार्य कर सकें।
    • उदाहरण: वर्ष 2025 में “सेव वेटलैंड्स अभियान” ने नौकरशाही और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को पाटने के लिए हजारों आर्द्रभूमि मित्रों को नामांकित किया।
  • वेटलैंड सिटी एक्रेडिटेशन: आर्द्रभूमियों को रिक्त भूखंडों के बजाय “सांस्कृतिक विरासत स्थलों” के रूप में मानकर नगरपालिका मास्टर प्लान में एकीकृत करना।
    • उदाहरण: इंदौर और उदयपुर वर्ष 2025 में पारंपरिक झील-प्रबंधन प्रथाओं के साथ क्षेत्रीय कानूनों को संरेखित करके भारत के पहले WCA शहर बन गए।
  • समान लाभ साझाकरण: संरक्षण कानून ऐसे हों कि वे स्थानीय मछली पकड़ने और चराई के अधिकारों को समाप्त न करें, जिससे समुदाय-राज्य संघर्ष घटे।
  • ग्रीन क्रेडिट मुद्रीकरण : ग्रीन क्रेडिट के बदले में पारंपरिक गाद निकालने की विधियों का उपयोग करके आर्द्रभूमियों को बहाल करने के लिए निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करना।

निष्कर्ष

आर्द्रभूमियों का प्रबंधन सीमांत भूखंडों के बजाय एक “राष्ट्रीय सार्वजनिक स्थल” के रूप में किया जाना चाहिए। प्रगति के लिए मार्ग “रणनीतिक संयम” में निहित है, जो यह पहचानता है कि जहाँ तकनीक उपकरण प्रदान करती है, वहीं पारंपरिक ज्ञान स्थिरता के लिए खाका तैयार करता है। आर्द्रभूमियों को महत्त्वपूर्ण शहरी एवं ग्रामीण बुनियादी ढाँचे का दर्जा देकर, भारत ‘विकसित भारत @2047’ के लिए अपनी जल सुरक्षा और जलवायु लचीलेपन को सुनिश्चित कर सकता है।

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