Q. विभाजन के बाद की चिंताओं से आकारित भारत की अर्द्ध-संघीय संरचना को अब संरचनात्मक पुनर्व्यवस्था की आवश्यकता है। समकालीन भारत में केंद्र-राज्य संबंधों को पुनर्समायोजित करने की आवश्यकता का परीक्षण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

February 17, 2026

GS Paper IIIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग

  • केंद्र-राज्य संबंधों को पुनर्समायोजित करने की आवश्यकता का उल्लेख कीजिए। 
  • पुनर्समायोजन में चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।

उत्तर

भारत के संविधान ने विभाजनकालीन असुरक्षाओं के संदर्भ में एक केंद्र-उन्मुख अर्द्ध-संघीय व्यवस्था स्थापित की। यद्यपि इस संरचना ने राष्ट्रीय एकता सुनिश्चित की, परंतु वर्तमान राजनीतिक परिपक्वता, आर्थिक जटिलता तथा क्षेत्रीय विविधता के परिप्रेक्ष्य में पुनर्संतुलन की आवश्यकता स्पष्ट है। एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ में संघवाद को संविधान की मूल संरचना का अंग स्वीकार किया गया है, जो संतुलन की पुनर्स्थापना की माँग करता है।

केंद्र–राज्य संबंधों के पुनर्समायोजन की आवश्यकता

  • विधायी संतुलन की पुनर्स्थापना: समवर्ती सूची के विषयों पर संघ का व्यापक विधायी हस्तक्षेप राज्यों की स्वायत्तता को सीमित करता है।
    उदा: 2020 के केंद्रीय कृषि कानूनों ने संघीय चिंताओं को जन्म दिया।
  • राजकोषीय केंद्रीकरण का सुधार: उपकरों एवं अधिभारों की बढ़ती हिस्सेदारी से राज्यों के लिए विभाज्य कर-कोष (divisible pool) में कमी आती है।
    उदा: 15वें वित्त आयोग ने गैर-विभाज्य उपकरों में वृद्धि पर चिंता व्यक्त की।
  • शर्तबद्ध हस्तांतरण में कमी: केंद्रीय प्रायोजित योजनाएँ कठोर प्रारूप लागू करती हैं, जिससे राज्यों की स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप लचीलापन घटता है।
    उदा: PMAY और NHM के अंतर्गत राज्यों द्वारा अधिक लचीलापन की माँग।
  • संस्थागत संघवाद को सुदृढ़ करना: अंतर-राज्य परिषद जैसे निकाय अभी भी कम उपयोग में लाए जाते हैं।
    उदा: सरकारिया आयोग ने इसकी नियमित सक्रियता की अनुशंसा की।
  • नीतिगत नवाचार को प्रोत्साहन: विकेंद्रीकरण से प्रयोगधर्मिता और नीतिगत प्रसार को बढ़ावा मिलता है।
    उदा: तमिलनाडु की मध्यान्ह भोजन योजना ने राष्ट्रीय मिड-डे मिल कार्यक्रम को प्रेरित किया।

पुनर्समायोजन की चुनौतियाँ

  • राष्ट्रीय एकता की चिंताएँ: अधिक स्वायत्तता से क्षेत्रीयतावाद को बढ़ावा मिलने का भय।
  • राजकोषीय असंतुलन: ऊर्ध्वाधर एवं क्षैतिज असंतुलन राजस्व वितरण को जटिल बनाते हैं।
    उदा: GST क्षतिपूर्ति को लेकर केंद्र और राज्यों के मध्य विवाद।
  • राजनीतिक केंद्रीकरण: राष्ट्रीय दलों का प्रभुत्व सहकारी संघवाद की भावना को कमजोर कर सकता है।
    उदा: राज्य राजनीति में राज्यपालों के कथित पक्षपातपूर्ण उपयोग के आरोप।
  • प्रशासनिक क्षमता में विविधता: कुछ राज्य संस्थागत क्षमता के मामले में अपेक्षाकृत कमजोर रह जाते हैं।
    उदा: पुंछी आयोग ने शासन-मानकों में असमानताओं को  रेखांकित किया।
  • न्यायिक एवं विधायी अतिव्यापन: समवर्ती विषयों में संघीय शक्तियों की व्यापक व्याख्या।
    उदा: केंद्रीय विनियमों द्वारा राज्य के व्यापक कानूनों का अतिक्रमण।

निष्कर्ष

पुनर्मूल्यांकन के लिए ‘प्रतिस्पर्धी’ के बजाय ‘सहकारी’ संघवाद की आवश्यकता है। अंतर-राज्य परिषद को पुनर्जीवित करना, उपकरों (cesses) को तर्कसंगत बनाना, राजकोषीय लचीलापन प्रदान करना, विधायी क्षेत्रों का सम्मान करना और समवर्ती विषयों में परामर्श को संस्थागत बनाना ही संघ को सही आकार दे सकता है। एक मजबूत भारत का आधार स्वायत्त और जवाबदेह राज्य होने चाहिए, जो ‘संरक्षण’ से नहीं बल्कि ‘विश्वास’ से बंधे हों।

India’s quasi-federal structure, shaped by post-Partition anxieties, now requires a structural reset. Examine the need to recalibrate Centre–State relations in contemporary India. in hindi

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