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Q. भारत में वैवाहिक बलात्कार को अभी भी आपराधिक कानून से बाहर रखा गया है, जबकि संविधान में गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता की गारंटी दी गई है। संवैधानिक मूल्यों और भारत के अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के आलोक में वैवाहिक बलात्कार अपवाद को हटाने की आवश्यकता का विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

December 19, 2025

GS Paper IISocial Justice

प्रश्न की मुख्य माँग

  • वैवाहिक दुष्कर्म संबंधी अपवाद को हटाने की आवश्यकता 
  • संबंधित चिंताएँ।

उत्तर

भारत के आपराधिक कानून से वैवाहिक दुष्कर्म को बाहर रखना, विशेष रूप से भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 (पूर्व में IPC की धारा 375) के अपवाद 2 के तहत, औपनिवेशिक काल की एक पुरातन प्रथा के रूप में कायम है। यह एक ऐसी कानूनी भ्रांति उत्पन्न करता है कि विवाह “स्थायी सहमति” है, जो गरिमा, निजता और शारीरिक स्वायत्तता की संवैधानिक गारंटी का मौलिक रूप से उल्लंघन है।

अपवाद हटाने की आवश्यकता

  • शारीरिक स्वायत्तता का संरक्षण: अनुच्छेद-21 के अंतर्गत संवैधानिक मूल्य यह निर्देशित करते हैं कि विवाह के पश्चात् भी महिला अपने शरीर पर अधिकार नहीं खोती।
    • उदाहरण: दिल्ली उच्च न्यायालय के विभाजित निर्णय (वर्ष 2022) में न्यायमूर्ति राजीव शकधर ने कहा कि सहमति वापस लेने का अधिकार महिला के मौलिक अधिकारों का अभिन्न अंग है।
  • समान संरक्षण का सिद्धांत: यह अपवाद विवाहित और अविवाहित महिलाओं के बीच मनमाना वर्गीकरण करता है, जो अनुच्छेद-14 के अंतर्गत समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
    • उदाहरण: यह “समझने योग्य अंतर” महिलाओं को यौन हिंसा से बचाने के उद्देश्य के साथ तार्किक रूप से जुड़ा हुआ नहीं है।
  • अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्व: वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध घोषित करने से भारत का इनकार, महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार की हिंसा के उन्मूलन का निर्देश देने वाली अंतरराष्ट्रीय संधियों—विशेषकर महिलाओं के प्रति भेदभाव उन्मूलन संधि—के प्रति उसकी प्रतिबद्धताओं के विपरीत है।
    • उदाहरण: संयुक्त राष्ट्र की महिलाओं के प्रति भेदभाव उन्मूलन समिति ने बार-बार भारत से वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध घोषित करने का आग्रह किया है।
  • स्वायत्तता का क्षरण: वैवाहिक असामंजस्य को वैध बनाना इस पितृसत्तात्मक धारणा को मजबूत करता है कि पत्नी पति की “संपत्ति” है, जो आधुनिक न्यायशास्त्र के विपरीत है।
    • उदाहरण: न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति (वर्ष 2013) ने लैंगिक न्याय के अनुरूप कानूनों को ढालने हेतु इस अपवाद को हटाने की प्रबल सिफारिश की थी।

संबद्ध चिंताएँ

  • वैवाहिक संस्था की स्थिरता: आलोचकों का तर्क है कि वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध घोषित करने से विवाह जैसी “पवित्र” संस्था के विघटन और तलाक़ की दर में वृद्धि हो सकती है।
    • उदाहरण: केंद्र सरकार के प्रारंभिक शपथ-पत्र में आशंका व्यक्त की गई कि यह प्रावधान पतियों के विरुद्ध “उत्पीड़न का उपकरण” बन सकता है।
  • साक्ष्य संबंधी चुनौतियाँ: एक शयनकक्ष की निजता के भीतर सहमति के अभाव को साबित करना न्यायपालिका के लिए महत्त्वपूर्ण बाधाएँ प्रस्तुत कर सकता है।
  • वाद-विवाद में दुरुपयोग: आशंका है कि तलाक या भरण-पोषण संबंधी कार्यवाही में इस प्रावधान का दुरुपयोग अनुचित लाभ प्राप्त करने के लिए किया जा सकता है।
  • प्रशासनिक तत्परता: वर्तमान में पुलिस और न्यायपालिका के पास घरेलू परिवेश में यौन अपराधों की जाँच हेतु आवश्यक संवेदनशीलता और विशेष प्रशिक्षण का अभाव है।

निष्कर्ष

एक जीवंत लोकतंत्र के लिए “स्थिति-आधारित” से “सहमति-आधारित” न्यायशास्त्र की ओर संक्रमण अपरिहार्य है। भारत को मध्यम मार्ग अपनाते हुए कृत्य को अपराध घोषित करना चाहिए, साथ ही झूठी शिकायतों के विरुद्ध कठोर सुरक्षा उपाय भी लागू करने चाहिए। घरेलू हिंसा अधिनियम को सुदृढ़ करना और पुलिस को संवेदनशील बनाना यह सुनिश्चित करेगा कि “घर की निजता” यौन हिंसा के लिए शरणस्थली न बने।

Marital rape remains excluded from criminal law in India despite constitutional guarantees of dignity and bodily autonomy. Examine the need to remove the marital rape exception in light of constitutional values and India’s international obligations. in hindi

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