Q. हाल ही में, असम में रेलवे ट्रैक पार करने के प्रयास में 7 हाथियों की मृत्यु हो गई। ट्रेन दुर्घटनाओं के कारण बार-बार होने वाली हाथियों की मृत्यु के कारणों का विश्लेषण कीजिए और रेलवे ट्रैक के किनारे वन्यजीवों की मृत्यु को रोकने के लिए आवश्यक उपायों का सुझाव दीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • हाथियों की बार-बार होने वाली मृत्यु के कारण
  • वन्यजीवों की मृत्यु को रोकने के लिए आवश्यक उपाय।

उत्तर

दिसंबर 2025 में एक हृदयविदारक घटना में असम के होजाई जिले में सैरांग–नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस की चपेट में आने से तीन वयस्क और चार शावकों सहित सात हाथियों की मृत्यु हो गई। इस टक्कर में इंजन तथा पाँच डिब्बे पटरी से उतर गए। यह दुर्घटना भारत के “राष्ट्रीय धरोहर पशु” के लिए रैखिक अवसंरचना से उत्पन्न सतत् खतरे को रेखांकित करती है।

हाथियों की बार-बार होने वाली मौतों के कारण

  • विखंडित प्रवासन गलियारे: रेलवे लाइनें प्रायः पारंपरिक प्रवासी मार्गों को काट देती हैं, जिससे भोजन और जल की तलाश में वन-खंडों के बीच जाते समय झुंडों को पटरियाँ पार करनी पड़ती हैं।
    • उदाहरण: होजाई दुर्घटना उस क्षेत्र में हुई, जहाँ झुंड कंदाली पहाड़ की पहाड़ियों और मैदानों के बीच अक्सर आवागमन करते हैं, किंतु यह क्षेत्र अधिसूचित गलियारा नहीं था।
  • उच्च गति संचालन: पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में भी ट्रेनें सुरक्षित सीमा से अधिक गति पर चलती हैं, जिससे झुंड के अचानक सामने आने पर समय रहते आपात ब्रेक लगाना संभव नहीं हो पाता।
  • कम दृश्यता की परिस्थितियाँ: अधिकांश दुर्घटनाएँ रात्रि या तड़के होती हैं, जब कोहरा, भारी वर्षा या घनी वनस्पतियाँ चालक की दृष्टि को अत्यंत सीमित कर देती है।
    • उदाहरण: वन अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2025 की होजाई त्रासदी में घना कोहरा एक प्रमुख कारक था, जिसके कारण चालक लगभग 100 हाथियों के झुंड को समय रहते नहीं देख सका।
  • पटरियों की ओर आकर्षण: यात्रियों द्वारा फेंका गया खाद्य अपशिष्ट तथा पटरियों के समीप पकती फसलें (जैसे धान) विशेषकर कटाई के मौसम में हाथियों को जोखिम क्षेत्र की ओर आकर्षित करती हैं।
  • संचार एवं समन्वय की कमी: झुंडों की निगरानी कर रही वन विभाग की टीमों और रेलवे नियंत्रण कक्षों के बीच वास्तविक समय की सूचना साझा करने में अक्सर विलंब होता है।

वन्यजीव मृत्यु रोकने हेतु आवश्यक उपाय

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पहचान प्रणालियाँ: कंपन-आधारित ध्वनिक संवेदन तकनीक से हाथियों की गतिविधि पहचान कर लगभग 500 मीटर पहले चालक को चेतावनी देने वाली घुसपैठ पहचान प्रणाली का विस्तार।
    • उदाहरण: भारतीय रेल ने हाल ही में इस प्रणाली को नेटवर्क में 1,122 मार्ग किलोमीटर तक विस्तारित करने हेतु निविदाएँ प्रदान की हैं।
  • वैज्ञानिक पारगमन अवसंरचना: पशु व्यवहार अध्ययनों पर आधारित सुरक्षित अंडरपास, ओवरपास और मिट्टी के रैंप का निर्माण।
    • उदाहरण: पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने मृत्यु दर को 90% तक घटाने हेतु 77 उच्च-प्राथमिकता रेल खंडों की पहचान की है।
  • कठोर गति विनियमन: सभी संवेदनशील आवासों में, चाहे वे आधिकारिक रूप से अधिसूचित हों या नहीं, 30–50 किलोमीटर प्रति घंटा की स्थायी गति सीमा का कड़ाई से पालन।
  • वनस्पति एवं अपशिष्ट प्रबंधन: पटरियों के किनारे खाद्य वनस्पति और फलदार वृक्षों की नियमित कटाई तथा यात्रियों के लिए शून्य कचरा नीति का सख्त अनुपालन।
    • उदाहरण: भारतीय रेल ने पैंट्री कार कर्मियों को वन्यजीवों को आकर्षित करने वाले खाद्य अपशिष्ट के निपटान से रोकने संबंधी परामर्श जारी किए हैं।
  • ध्वनिक प्रतिकारक उपकरण: योजना मधुमक्खी का विस्तार, जिसमें मधुमक्खियों की ध्वनि प्रसारित कर हाथियों को पटरियों से दूर रखा जाता है।
  • वास्तविक समय निगरानी का एकीकरण: वन विभाग और रेलवे के बीच 24×7 संयुक्त नियंत्रण कक्ष स्थापित कर कॉलर आईडी लगे हाथियों के जीपीएस आँकड़ों और गश्ती सूचनाओं का साझा उपयोग।

निष्कर्ष

एक ही घटना में सात हाथियों की क्षति यह स्मरण कराती है कि संरक्षण को अवसंरचना के बाद का विषय नहीं बनाया जा सकता। दुर्घटना- पश्चात् जाँच से आगे बढ़ते हुए भारत को पारिस्थितिकी-प्रथम अभियांत्रिकी दृष्टिकोण अपनाना होगा। केवल कानूनी रूप से अधिसूचित गलियारों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता संचालित सुरक्षा प्रणालियों के राष्ट्रव्यापी विस्तार से ही हमारे वन्यजीवों के लिए सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित किया जा सकता है।

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